उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानीः कहीं पनिशमेंट पोस्टिंग का पर्याय न बन जाए भराड़ीसैंण
- ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा के बाद अब बुनियादी ढांचे के विकास का दबाव
- राजधानी मुद्दे के मूल में पहाड़ का विकास, पहाड़ के नजरिए से
- जिस सवाल को प्रदेश सरकार केंद्र से पूंछ रही, गैरसैंण का वही सवाल है केंद्र से
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राज्य आंदोलन के दौरान एक सपना देखा गया था। यह सपना था पनिशमेंट पोस्टिंग के रूप में जाने वाले पहाड़ को एक ऐसी जगह के रूप में बदलना जो विकास का पर्याय बन जाए। यह विकास पहाड़ की नजर से हो और यही वजह रही कि आंदोलन के केंद्र में गैरसैंण को राजधानी बनाना रहा।
अब गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होने के बाद शुक्रवार को भराड़ीसैंण में बर्फबारी के बीच एक चुनौती साफ सामने आई। यह चुनौती है गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में जल्द विकसित करने की। यदि ऐसा न किया गया तो भराड़ीसैंण जल्द ही पनिशमेंट पोस्टिंग का पर्याय बन जाएगा।
गैरसैंण को राजधानी घोषित करने के विरोध में लगातार यही तर्क दिया भी जाता रहा। यह तर्क है राजधानी लायक जमीन कहां है। राजधानी लायक पानी, रोजगार, स्कूल, अस्पताल, रहने के लिए घर, मॉल, आने जाने के लिए चौड़ी-चौड़ी सड़कें - यह सब कहां हैं। यह भी कहा जाता रहा कि जिन अफसरोें को देहरादून तक में मनोरंजन के साधन नहीं मिल पाते, वे गैरसैंण आएंगे क्या?
मुसीबत ये है कि इन सब सवालों का जवाब ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होने के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास ही है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि समय आने पर सब सामने आ जाएगा। खुद विपक्ष कह रहा है कि बजट मेें कोई व्यवस्था नहीं है, राज्यपाल के भाषण में कोई जिक्र नहीं, आखिर राजधानी जमीन पर उतरेगी कैसे? विपक्ष के इस सवाल में ही गैरसैंण ग्रीष्कालीन राजधानी का भविष्य भी छिपा है। राजधानी का बनना सिर्फ बुनियादी ढांचे को खड़ा कर देना भर भी नहीं है।
गैरसैंण में यह आंदोलन का सवाल फिर उठेगा
राज्य आंदोलन की आंच में तपी गैरसैंण में यह आंदोलन का सवाल फिर उठेगा। यह सवाल है पहाड़ का विकास पहाड़ के नजरिए से। यही सवाल रहा है जिसका सामना सरकार ने मसूरी मेें हिमालयन कान्क्लेव के दौरान किया था। उस समय का मसूरी डिक्लेयरेशन इसका गवाह भी है।
इसी सवाल को प्रदेश सरकार और अन्य हिमालयी राज्य केंद्र सरकार के सामने उठा रहे हैं। गैरसैंण यही सवाल प्रदेश सरकार के सामने उठा रहा है। भराड़ीसैंण में शुक्रवार को हुई बर्फबारी के बाद जिस तरह से लोगों को परेशानी हुई उससे जाहिर है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होेने के बाद बार-बार भराड़ीसैंण आने वाली सरकार अपने इस सपने को धरातल में उतारने में देर हुई तो भराड़ीसैंण पनिशमेंट पोस्टिंग का पर्याय बन सकता है।
भावना में सबसे आगे, बुनियादी ढांचे में पीछे
राजधानी चयन आयोग की रिपोर्ट में भी गैरसैंण को जनभावना में सबसे आगे रखा गया था। आठ साल बाद आई रिपोर्ट में गैरसैंण के लिए बुनियादी ढांचे के विकास को सबसे बड़ी चुनौती बताया गया था। आयोग ने इसके लिए दिल्ली स्कूल और आर्किटेक्चर से अध्ययन कराया था। जनभावना के दबाव को देखते हुए रिपोर्ट में राजधानी के लिए किसी स्थान की स्पष्ट संस्तुति भी नहीं की गई लेकिन सरकार को सुझाव दिया गया था कि सरकार पैसों का प्रबंध करने के बाद ही राजधानी बनाएं।
भराड़ीसैंण में सुविधाओं की भारी कमी
गैरसैंण तो दूर भराड़ीसैंण में ही सत्र के दौरान कई कमियां सामने आईं। पहली चुनौती नेटवर्क की है। इस चुनौती का सामना करने के लिए सरकार को किसी भारी निवेश की जरूरत भी नहीं है। सरकार ने विधानभवन के लिए वाईफाई की व्यवस्था तो की लेकिन क्षेत्र के नेटवर्क की समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया। यही हाल सड़क का भी है। कर्णप्रयाग से मात्र 55 किलोमीटर की दूरी तय करने में दो घंटे का समय लग रहा है।