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देवभूमि में हो रहा संस्कृत का 'तिरस्कार'

Mon, 03 Nov 2014 01:58 PM IST
योगेंद्र सिंह/ अमर उजाला, हरिद्वार
योगेंद्र सिंह/ अमर उजाला, हरिद्वार Updated Mon, 03 Nov 2014 01:58 PM IST
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uttarakhand sanskrit university haridwar.

उत्तराखंड को देवभूमि की संज्ञा, संस्कृत को दूसरी राजभाषा का तमगा, कुंभनगरी हरिद्वार में स्थापित होने के बाद भी संस्कृत विश्वविद्यालय उपेक्षा की अपसंस्कृति का शिकार है।

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खुद राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी भी बारंबार संस्कृत की महिमा का बखान करते नहीं थकते फिर भी संस्कृत विश्वविद्यालय की व्यवस्थाएं पटरी से उतरी हुई हैं। राज्य में इकलौते संस्थानों की कड़ी में पेश है संस्कृत विवि का हाल।
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नौ साल में संस्कृत विवि की हालत में नहीं सुधार

न पर्याप्त शिक्षक, न कर्मचारी, न भवन, न फर्नीचर, न ही अन्य संसाधन, यह हाल है हरिद्वार स्थित उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय का। सुविधाओं के लिए तरसते इस विश्वविद्यालय में छात्र संख्या भी संतोषजनक नहीं है। रही-सही कसर स्टॉफ के आपसी झगड़े ने पूरी कर दी है।

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2005 में की गई थी विश्वविद्यालय की स्थापना

uttarakhand sanskrit university haridwar.

प्रदेश में संस्कृत के प्रचार और प्रसार के लिए उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना 2005 में की गई थी। आरंभ से ही विवि उपेक्षा का शिकार रहा। कई सालों तक विश्वविद्यालय के पास भवन तक नहीं था।

विश्वविद्यालय की अकादमिक और प्रशासनिक गतिविधियों का संचालन संस्कृत अकादमी की बिल्डिंग से हुआ। तीन साल पहले विश्वविद्यालय का अकादमिक भवन बनकर तैयार हुआ। यहीं से कक्षाएं संचालित होती हैं, यहीं से प्रशासनिक कार्य भी होते हैं।

विश्वविद्यालय में प्रशासनिक भवन, छात्रावास, क्रीड़ास्थल और यहां तक की छात्र छात्राओं के बैठने के लिए फर्नीचर तक नहीं है। विश्वविद्यालय के समस्त विभाग सहायक शिक्षण सामग्री की कमी से जूझ रहे हैं।

विभागों में ब्लैक बोर्ड तक का टोटा बना हुआ है। विश्वविद्यालय परिसर में महज 360 छात्र हैं। भाषा विज्ञान, वेद, ज्योतिष और पत्रकारिता आदि पाठयक्रमों के प्रथम और द्वितीय वर्षों में छात्र संख्या एक, दो या तीन तक सिमट गई हैं।

विवि के वर्तमान कुलपति डॉ. महावीर अग्रवाल ने पीएचडी, एमलिब, वेद और दर्शन सहित कुछ नए पाठ्यक्रम शुरू कराए हैं लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

कई विभागों में स्थायी शिक्षक ही नहीं

uttarakhand sanskrit university haridwar.

विश्वविद्यालय 10 असिस्टेंट प्रोफेसर और एक प्रोफेसर के सहारे चल रहा है। कई विभागों में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है।

अधिकांश विभाग अतिथि प्रवक्ताओं के भरोसे हैं। स्थायी रजिस्ट्र्रार, सहायक रजिस्ट्रार, प्रशासनिक अधिकारी तक नहीं हैं। प्रशासनिक अधिकारियों की कमी के चलते यहां के शिक्षक रजिस्ट्रार, सहायक रजिस्ट्रार और अन्य पदों पर काबिज होने को अपना लक्ष्य मानते हैं।

शासन की उपेक्षा सबसे बड़ा कारण
विवि की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण इसकी उपेक्षा है। मांगे जाने के बावजूद शिक्षकों और अन्य पदों पर नियुक्ति के लिए शासन ने अनुमति नहीं दी। विवि के भवनों के निर्माण के लिए बजट नहीं मिल पाया है। कुलसचिव और सहायक कुलसचिव जैसे पदों स्थायी नियुक्तियां नहीं हैं।

शासन की ओर से नियुक्तियों पर रोक लगी है। शिक्षकों और अन्य स्टाफ की कमी है। भवन निर्माण के लिए भी शासन से बजट नहीं मिल पाया है। यह समस्याएं शासन स्तर से ही हल हो सकती हैं।
- प्रो. महावीर अग्रवाल, कुलपति, उत्तराखंड संस्कृत विवि

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