मोदीजी, अंग्रेजों के जमाने की है उत्तराखंड पुलिस
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही स्मार्ट पुलिस बनाने की बात कर रहे हो पर उत्तराखंड में पुलिस सुधार की हकीकत कैग रिपोर्ट भी बयां कर रही है। कैग के आडिट से साफ जाहिर हो रहा है कि पुलिस के पास उपकरण और वाहनों की भारी कमी है।
पैसे होते हुए भी पुलिस आधुनिकीकरण को अंजाम नहीं दिया जा रहा है। हल्द्वानी का मामला सामने आने के बाद सरकार ने 18 नए थाने खोलने और 150 नए पद स्वीकृत भी किए हैं पर यह पुलिस सुधार के मामले में नाकाफी दिख रहा है।
गुवाहाटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा कि पुलिस को सख्त, आधुनिक, सजग, विश्वसनीय और तकनीक में दक्ष होना चाहिए। पुलिस सुधार के तहत गृह मंत्रालय भी पीएम के इस विजन पर काम कर रहा है।
उत्तराखंड के हल्द्वानी में बच्ची के हत्याकांड के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी पुलिस को कठघरे में खड़ा किया था। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अधिकारियों की बैठक में पूछा था कि पुलिस का खुफिया तंत्र कहां गया। अब 18 नऐ थानों को खोलने का आदेश जारी किया गया है।
उपकरण और वाहनों की भारी कमी
सरकार ने डेढ़ सौ पद स्वीकृत किए हैं। कैग रिपोर्ट के आधार पर देखें तो अभी और बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। आडिट रिपोर्ट के मुताबिक राज्य गठन के समय से ही पुलिस बल के आधुनिकीकरण का स्टेट प्लान नहीं बनाया गया।
इसके लिए राज्य स्तरीय अधिकार प्राप्त समिति का गठन ही जनवरी 2011 में किया गया। हालांकि सहायक राज्य योजना हर साल बनाई जानी थी पर यह सिर्फ 2011-2016 तक के लिए बनाई गई। इस योजना को भी कैग ने अपर्याप्त बताया।
हद तो यह हुई कि उपकरणों की खरीद 2012-13 में की ही नहीं गई। इससे 582 करोड़ रुपए का उपयोग ही नहीं हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस के पास गाड़ियों की भारी कमी है। 2090 की कुल जरूरत की तुलना में पुलिस के पास केवल 1306 गाड़ियां हैं।
पिछले पांच साल में 2.33 करोड़ रुपए का उपयोग ही नहीं किया गया और पुलिस 61 प्रतिशत एचएफ सेट और 58 प्रतिशत वीएचएफ की कमी है। 14 प्रतिशत हथियार पुलिस के पास 1947 से पहले के हैं।
भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा के लिए पुलिस को 3.37 करोड़ रुपए मिले। इसमें से 2.13 करोड़ रुपए में अन्य जिलों केलिए वाहन और उपकरण खरीद लिए गए।
डीजीपी गुवाहाटी में, गृह विभाग बेखबर
मुख्यमंत्री ने चार दिन पहले प्रमुख सचिव गृह से लेकर डीजीपी और डीएम से लेकर एसएसपी तक सभी की क्लास ली। कई सबक सिखाए और समन्वय को सर्वोच्च प्राथमिकता देने को कहा। लेकिन उसी दिन समन्वय तार-तार होता दिखा।
पिछले तीन दिन से प्रदेश के डीजीपी गुवाहाटी में है लेकिन शासन में गृह विभाग उनकी इस यात्रा से पूरी तरह अनभिज्ञ है। सरकार की थोड़ी बहुत लाज तब बची जब मुख्य सचिव ने बताया कि डीजीपी ने जाने से पहले उन्हें सूचित किया था। इससे साबित होता है कि प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी के बीच वास्तव में कहीं ना कहीं संवादहीनता है।
विगत 27 नवम्बर को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सूबे के अफसरों की बैठक में कानून व्यवस्था के अलावा जिस बिन्दु सर्वाधिक महत्व दिया वह था समन्वय। उन्होंने कहा भी कि प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी के बीच बेहतर समन्वय नहीं है।
जिलों में डीएम व एसएसपी के बीच भी समन्वय नहीं, जिसका असर प्रशासन पर पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी संयुक्त बैठकें कर लॉ एंड ऑर्डर को देखें। लेकिन उसी शाम डीजीपी बीएस सिद्धू गुवाहाटी के लिए रवाना हो गए और गृह विभाग को कोई सूचना तक नहीं।
प्रमुख सचिव गृह एमएच खान ने कहा कि उन्हें डीजीपी की गुवाहाटी डीजीपी व आईजी कॉन्फ्रेंस में जाने की ना तो सूचना है और ना ही उनके स्तर से अनुमति दी गई है। हालांकि मुख्य सचिव एन रविशंकर ने कहा कि डीजीपी ने जाने से पहले उन्हें सूचित किया था।
मतलब साफ है कि अभी भी गृह विभाग और पीएचक्यू के बीच कोई समन्वय नहीं है। एक आईएएस ने तो कहा कि जब ऊपर ही ठीक नहीं है तो निचले स्तर पर सिस्टम ठीक होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।