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उत्तराखंड: समय पर जागता पीसीबी तो उद्योगों पर खड़ा नहीं होता संकट, एक्ट में छह सालों में किए गए पांच संशोधन

Sun, 11 Dec 2022 05:11 PM IST
अलका त्यागी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 11 Dec 2022 05:11 PM IST
सार

अब 20 दिसंबर को जब उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूकेपीसीबी), गढ़वाल, कुमाऊं कमिश्नर को इस मामले में हाईकोर्ट में जवाब देना है, तब आनन-फानन में 1724 कंपनियों की एनओसी रद्द कर दी गई।

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Uttarakhand: PCB Ignorance make crisis on industries
- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

केंद्र सरकार की ओर से प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन अधिनियम 2016 लागू होने के छह साल बाद तक इसमें पांच बार संशोधन किए गए। हर बार संशोधनों में नियमों में छूट दी गई, ताकि कंपनियां एक्ट के तहत पंजीकरण कराएं और पीसीबी को भी इसे लागू कराने में आसानी हो, लेकिन इस बीच न तो कंपनियों ने ही रुचि दिखाई और न ही उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इसे सख्ती से लागू करा पाया। 

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अब 20 दिसंबर को जब उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूकेपीसीबी), गढ़वाल, कुमाऊं कमिश्नर को इस मामले में हाईकोर्ट में जवाब देना है, तब आनन-फानन में 1724 कंपनियों की एनओसी रद्द कर दी गई। अब जब कंपनियां बारीकी से इसे समझने की कोशिश कर रही हैं, तब पता चल रहा है कि इसे लागू करना इतना भी मुश्किल नहीं था। केंद्र सरकार ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन अधिनियम को 18 मार्च 2016 को अधिसूचित किया था। इसके बाद इसमें समय-समय पर संशोधन हुए। पहली बार 27 मार्च 2018, दूसरी बार 12 अगस्त 2021, तीसरी बार 22 सितंबर 2021, चौथी बार 16 फरवरी 2022 और पांचवीं बार छह जुलाई 2022 को संशोधन किया गया। 
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फरवरी 2022 में हुए संशोधन में नियमों में छूट दी गई। कंपनियों से कहा गया कि यदि वह पूरा प्लान एक साथ लागू नहीं कर सकती तो इसे टुकड़ों में लागू करें। इसके अलावा छह जुलाई 2022 में हुए संशोधन में उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिकों को शूड्यूल-2 में प्लास्टिक पैकेजिंग के तहत ईपीआर प्लान लागू करने को कहा गया। इसके अगले ही दिन सात जुलाई को हाईकोर्ट ने प्लान लागू नहीं करने वाली कंपनियों पर कार्रवाई के आदेश पारित कर दिए। 

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अपना कूड़ा अपनी जेब में 
वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने गजट नोटिफिकेशन कर पूरे देश में अधिनियम में ईपीआर (विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व) को लागू किया था। आसान शब्दों में कहें तो यह नियम अपना कूड़ा अपनी जेब में रखने के लिए प्रेरित करता है। मतलब जो कोई कंपनी किसी भी स्तर पर प्लास्टिक कूड़े को जनरेट करेगी, उसे इसके निपटारे की भी व्यवस्था करनी पड़ेगी। इसमें कंपनियों को यह भी छूट दी गई थी कि वह अपना कूड़ा खुद उठाएं या भुगतान कर दूसरी एजेंसियों की सेवाएं लें।

एसडीसी ने तैयार किया है 99 पेज का दस्तावेज 
उत्तराखंड में चल रहे ईपीआर संकट को देखते हुए एसडीसी संस्था ने इसके हितधारकों के लिए 99 पेज का एक दस्तावेज तैयार किया है। इसमें अभी तक किए गए सभी संशोधनों को विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया गया है। संस्था के अध्यक्ष अनूप नौटियाल ने बताया कि हमने इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की साइट से संशोधन की प्रतियों को उठाया गया है, जो ईपीआर के मामले में उत्तराखंड में सभी उत्पादकों, आयातकों, ब्रांड मालिकों और प्लास्टिक वेस्ट प्रोसेसर के लिए अधिक जागरूकता और समझ पैदा करने में सहायता प्रदान करेगा।

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