उत्तराखंड: प्रतिमाह औसतन पांच से सात लोगों की जान ले रहे वन्यजीव, प्रयास साबित हो रहे नाकाफी
पर्यावरणीय असंतुलन और मानवीय हस्तक्षेप से वन्यजीवों का व्यवहार बदल रहा है। प्रदेश में भालू और सांप के हमले बढ़े है, इस साल 85 लोगों को घायल किया है। वर्ष 2021 में सितंबर तक 44 लोगों की मौत हुई और 150 से अधिक घायल हुए। वर्ष 2020 में 58 लोग वन्यजीवों का शिकार बने, 250 से अधिक लोग घायल हुए।
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प्रदेश में पर्यावरणीय असंतुलन और मानवीय हस्तक्षेप की बढ़ती गतिविधियों के कारण मानव-वन्यजीवों के बीच लगातार टकराव बढ़ रहा है। इससे प्रतिमाह औसतन पांच से सात लोगों की जान जा रही है। वन विभाग की ओर से इस संघर्ष को कम करने के लिए वृहद स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन यह नाकाफी साबित हो रहे हैं। वर्ष 2021 में ही सितंबर तक 44 लोग वन्यजीवों के हमले में अपनी जान गवां चुके हैं, जबकि डेढ़ सौ के करीब लोग घायल हुए हैं।
भालुओं के हमलों में सर्वाधिक वृद्धि
प्रदेश में गुलदार के बढ़ते हमलों के बीच पिछले कुछ समय से भालुओं के हमलों में सर्वाधिक वृद्धि हुई है। छह नवंबर शनिवार को कर्णप्रयाग के नौली गांव में भालू के हमले में 60 वर्षीय महिला की मौत का पहला मामला रिपोर्ट किया गया है, लेकिन इससे पहले इसी साल सितंबर तक भालू 33 से अधिक लोगों पर हमला कर उन्हें घायल कर चुका है। इसके अलावा सांपों के काटने के मामलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है। सितंबर तक सांप के काटने से 14 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 52 लोग घायल हुए हैं। इसी तरह से गुलदार के हमलों में 18 लोगों की मौत और 43 लोग घायल हुए हैं।
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हाथी के हमले में आठ लोगों की मौत, जबकि आठ लोग घायल हुए हैं। वहीं बाघ के हमले में दो लोगों की मौत और चार लोग घायल हुए हैं। जंगली सूअर के हमले में एक व्यक्ति की मौत, जबकि आठ लोग घायल हुए हैं। मानव-वन्यजीवों के इस संघर्ष में अब तक 82 से अधिक वन्यजीवों की भी जान गई है। इनमें 65 गुलदार, 11 हाथी और छह बाघ शामिल हैं। बीते वर्ष 2020 की बात करें तो वन्यजीवों के हमले में कुल 58 लोगों की जान गई और 250 से अधिक लोग घायल हुए।
कई मोर्चो पर नई रणनीति के साथ कर रहे काम : सुहाग
मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए वन विभाग कई मोर्चो पर नई रणनीति के साथ काम कर रहा है। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जेएस सुहाग का कहना है कि वन विभाग ने इसके लिए रैपिड रिस्पांस टीम का गठन किया है। इसके अलावा वन क्षेत्रों के नजदीक रहने वाली आबादी में विलेज रिस्पांस टीम का गठन किया है। जिन्हें ट्रेनिंग देने के साथ उन्नत उपकरण मुहैया कराए गए हैं। इसके अलावा झाड़ियों का उनमूलन कर स्थानीय घास का रोपण किया जा रहा है, जो वन्यजीवों के छुपने के लिए मुफीद होती हैं।
इसके अलावा एनीडेर सेंसर सिस्टम लगाया जा रहा है, जो रात में जंगली जानवर को पहचान कर तेज आवाज कर उसे भगा देता है। इसके अलावा फॉक्स लाइट सिस्टम भी प्रयोग के तौर पर लगाया जा रहा है, सोलर लाइट से चलने वाला यह सिस्टम अपनी रंग बदलती रोशनी से जानवरों को आबादी क्षेत्र में घुसने से रोकता है। इसकी लाइट एक किमी दूर तक वार करती है। इसके अलावा जंगलों में फलदार पौधों का रोपण, जलाशयों का निर्माण, जानवरों को रेडियो कॉलर लगाने जैसे तमाम दूसरे उपाय भी किए जा रहे हैं।
पर्यावरणीय असंतुलन से भालुओं के व्यवहार में हो रहा परिवर्तन : सत्य
कहीं बारिश अधिक हो रही है तो कहीं कम। कभी बर्फ बहुत अधिक गिर रही है तो कभी बहुत कम। पर्यावरण में आए इस बदलाव के कारण हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले भालुओं के व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के एक शोध के बाद पता चला है कि सर्दियों में पूरे चार माह तक चिर निंद्रा में रहने वाले भालू अब वर्षभर जाग रहे हैं। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. सत्य कुमार का कहना है कि पर्यावरणीय असंतुलन के अलावा इसकी एक वजह मानवीय गतिविधियां भी हैं।
मानव कस्बों से चार-पांच किमी की दूरी पर बने डंपिंग जोन भालुओं को अब वर्षभर खाना उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने अपने प्राकृतिक वास का छोड़कर इन्हीं डंपिंग जोन के आसपास अपने रहने की जगह भी ढूंढ ली हैं। दिन में तो इन डंपिंग जोन में केवल बंदर और लंगूर दिखाई देते हैं, जबकि रात के समय भालू और तेंदुए जैसे जानवर भी सक्रिय हो जाते हैं। इसके वासस्थल आबादी के करीब होने के कारण भी मानव के साथ इनका संघर्ष बढ़ा है।
जंगल के आसपास के आबादी वाले क्षेत्रों में पिछले 20 से 30 सालों में मानव बस्तियों से हुए पलायन के बाद यहां जंगली जानवरों की गतिविधियां बढ़ गई हैं। मानव कम होने से आसपास अस्थायी वन क्षेत्र का विस्तार हुआ है। जिससे जानवरों को छिपने की जगह मिल रही है। हमारी रैपिड रिस्पांस टीम टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी में बेहतर काम कर रही हैं। लोगों को सॉलिड वेस्ट का बेहतर ढंग से निस्तारण करने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है।
- राजीव भरतरी, प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ), वन विभाग
हिमालयी भालू और हिमालय तेंदुए आमतौर पर सीमांत क्षेत्रों के स्नो जोन में विचरण करते हैं। इनके व्यवहार के दो कारण हो सकते हैं। एक तो फूड चेन का कमजोर पड़ना और दूसरा मानव की ओर से फेंके गए खाने की इन्हें आदत पड़ना, स्नो लैपर्ड की बढ़ती संख्या बताती है कि इन्हें खाने की कमी नहीं है। इनके मुंह पर मानव भोजन का स्वाद लग चुका है। जो इन्हें मानवीय बस्तियों की ओर खींच रहा है।
- अनिल शर्मा, वन्यजीव सलाहकार बोर्ड के पूर्व सदस्य