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उत्तराखंड: उर्मिल ने दून में पढ़ा था रंगकर्म का ककहरा, रामलीला में अभिनय से शुरू हुआ सफर पहुंचा आकाशवाणी तक

Thu, 22 Jul 2021 03:16 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal संदीप थपलियाल, अमर उजाला, श्रीनगर
संदीप थपलियाल, अमर उजाला, श्रीनगर Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 22 Jul 2021 03:16 PM IST
सार

नाटक और रेडियो की दुनिया में लंबे समय तक राज करने वाले 79 वर्षीय डॉ. उर्मिल कुमार थपलियाल का 20 जुलाई 2021 की शाम 5.30 बजे लखनऊ स्थित अपने आवास में स्वर्गवास हो गया।

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uttarakhand news: Urmil Kumar Thapliyal learned theatre in dehradun
उर्मिल कुमार थपलियाल (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मूल रूप से पौड़ी जिले के एकेश्वर ब्लॉक के खैड़ गांव निवासी विख्यात रंगकर्मी, नाटककार, लेखक, समीक्षक और व्यंग्यकार डॉ. उर्मिल थपलियाल का देहावसान साहित्य व रंगमंच की दुनिया के लिए गहरा आघात है।

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उन्होंने रंगकर्म का ककहरा देहरादून की रामलीला में अभिनय के दौरान पढ़ा था। 80-90 के दशक में आकाशवाणी लखनऊ केंद्र से खनकती आवाज में समाचार सुनाने वाले उर्मिल ने प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के साथ ही कई नाटकों का निर्देशन किया। उन्होंने यश भारती अवार्ड और संगीत नाट्य अकादमी अवार्ड समेत कई पुरस्कार हासिल किए। वे रंगमंच और साहित्य के क्षेत्र में उर्मिल कुमार थपलियाल व आकाशवाणी में सोहन लाल थपलियाल के नाम से प्रसिद्ध रहे।  
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नाटक और रेडियो की दुनिया में लंबे समय तक राज करने वाले 79 वर्षीय डॉ. उर्मिल कुमार थपलियाल का 20 जुलाई 2021 की शाम 5.30 बजे लखनऊ स्थित अपने आवास में स्वर्गवास हो गया। वे कैंसर से पीड़ित थे। चौंदकोट (एकेश्वर) के खैड़ गांव में प्रथम गढ़वाली बोली के साहित्यकार भवानी दत्त थपलियाल और ब्रिटिश काल में स्वार्ड ऑफ ऑनर (जंग-ए-बहादुर खिल्लत) से सम्मानित सूबेदार तोताराम थपलियाल के परिवार के सदस्य गुणानंद थपलियाल के घर में उर्मिल का जन्म हुआ था।
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उर्मिल के निधन पर शोक जताया

उर्मिल के रिश्तेदार रिटायर्ड बीडीओ कमल किशोर थपलियाल ने बताया कि उर्मिल के जन्म के कुछ साल बाद उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। पिता के भी स्वर्गवास होने के बाद उनकी बुआ अपने साथ फालतू लाइन देहरादून ले गईं। वहां उनकी पढ़ाई लिखाई हुई। यहां चुक्खूवाला में वे रामलीला में अभिनय करने लगे। यहीं से उनका आकाशवाणी में जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।  

आकाशवाणी में सेवा के दौरान उनके नजदीकी सेवानिवृत्त आकाशवाणी अधिकारी पार्थसारथी थपलियाल बताते हैं कि लखनऊ जाकर उर्मिल रंगमंच से जुड़ गए। उत्तर प्रदेश की प्रमुख नाट्य विद्या नौटंकी को नया रूप देने और लोकप्रिय बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।

वे अपने नाटकों और नौटंकी के कारण विश्वविख्यात थे। वे हिंदी, अवधी और गढ़वाली नाटकों के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे। डा. उर्मिल ने अनेक नाटक लिखे। उनकी लिखी नौटंकी ‘हरिश चन्नर की लड़ाई’ देश में विभिन्न स्थानों पर मंचित हुई। 

साहित्यकार व व्यंगकार डा. उर्मिल कुमार थपलियाल के देहावसान पर प्रो. उमा मैठाणी, प्रो. डीआर पुरोहित, महेश गिरि, आरती पुंडीर, जयकृष्ण पैन्यूली, नीरज नैथानी, कमल रावत, देवेंद्र उनियाल और मदन मोहन उंगवाल आदि ने शोक जताया है।

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