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उत्तराखंड: पहले घर-परिवार को भूल कर राज्य के लिए लड़े, अब खुद को आंदोलनकारी साबित करने में जुटे
Sat, 20 Nov 2021 01:49 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
रेनू सकलानी, अमर उजाला, देहरादून
रेनू सकलानी, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Sat, 20 Nov 2021 01:49 PM IST
सार
पूर्व में कमेटी सदस्यों द्वारा वैरिफिकेशन किए जाने के बाद आंदोलनकारी के चिन्हीकरण करने पर सहमति बनी थी, लेकिन अब इसे नहीं माना जा रहा है। कहना है कि जब कमेटी सदस्यों के पास अधिकार ही नहीं है, तो फिर ऐसे में कमेटी बनाने का क्या औचित्य है।
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उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राज्य निर्माण की लड़ाई में जो आंदोलनकारी अपना घर-परिवार भूल कर कूद पड़े थे। आज उन्हें स्वयं को आंदोलनकारी साबित करने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। शासनादेश में पूर्व में चिन्हीकरण के पांच मानकों में से पांचवें मानक को हटा दिए जाने से अब आंदोलनकारियों के सामने मुश्किल खड़ी हो गई।
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चिन्हीकरण कमेटी सदस्यों का कहना है कि पूर्व में कमेटी सदस्यों द्वारा वैरिफिकेशन किए जाने के बाद आंदोलनकारी के चिन्हीकरण करने पर सहमति बनी थी, लेकिन अब इसे नहीं माना जा रहा है। कहना है कि जब कमेटी सदस्यों के पास अधिकार ही नहीं है, तो फिर ऐसे में कमेटी बनाने का क्या औचित्य है। कहा कि आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण व उन्हें सुविधाएं दिए जाने की बात करने वाली सरकार महज खानापूर्ति कर रही है। स्थिति यह है कि डीएम की अध्यक्षता में गठित की गई कमेटी की बैठक में डीएम एक बार भी शामिल नहीं हुए है।
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चिन्हीकरण के नाम पर मजाक, कमेटी सदस्य अधिकार विहीन
सरकार केवल ये दिखाना चाहती है कि आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण हो रहा है। ये केवल एक मजाक बनकर रह गया है। चिन्हीकरण कमेटी के सदस्य अधिकार विहीन हैं। न हमारी बात मानी जा रही है। न चिन्हीकरण की प्रक्रिया सही है। जिला प्रशासन की अनदेखी के कारण बैठक दो तीन बार कमेटी का बायकॉट हो चुका है। कई लोगों के नाम रिकॉर्ड में नहीं है, लेकिन वह आंदोलनकारी नहीं है, ये कैसे कहा जा सकता है। इसलिए कमेटी सदस्यों को अधिकार संपन्न बनाया जाना चाहिए।
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- ओमी उनियाल, कमेटी सदस्य और वरिष्ठ आंदोलनकारी
प्रक्रिया सुस्त, बैठकें नहीं सफल
चार बैठकें होने के बावजूद आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण नहीं हो पाया है। जिस तरह से प्रक्रिया चल रही है, वह बहुत सुस्त है। सही मायने में जो आंदोलनकारी है वह तो वंचित रह जाएंगे। आंदोलन का जिन्होंने नेतृत्व किया उनका नाम तो दर्ज है, लेकिन जो आंदोलनकारी रोज जुलूस में आए, उनका चिन्हीकरण कैसे होगा। जिला प्रशासन जिन मानकों के आधार पर चल रही उससे आंदोलनकारी का सही चिन्हीकरण संभव नहीं।
- जय प्रकाश उत्तराखंडी, कमेटी सदस्य और वरिष्ठ आंदोलनकारी
11वीं सूची नहीं हो पाई जारी
11वीं सूची में 369 आंदोलनकारी चिन्हित किए गए थे, लेकिन वह सूची आज तक जारी नहीं पाई है। पूर्व में इस बात पर सहमति बनी थी की चिन्हीकरण के लिए प्रत्येक जिला स्तर पर गठित दस सदस्यीय कमेटी, जिसके नाम की पुष्टि कर देगी उसे आंदोलनकारी माना जाएगा। इस मानक पर ही पूर्व में कई लोगों को चिन्हीकरण हुआ भी है, लेकिन अब इस मानक को नहीं माना जा रहा है। ऐसे में अब छूटे हुए आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण मुश्किल हो गया। एलआईयू या पुलिस के पास आंदोलन में भाग लेने वाले सभी लोगों के नाम दर्ज होना तो संभव नहीं।
- रामलाल खंडूरी, कमेटी सदस्य व आंदोलनकारी
गलत चिन्हीकरण न हो और असली छूटने नहीं चाहिए
कमेटी की बैठक में जिस तरह आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण को लेकर सवाल उठते हैं, उससे बहुत तकलीफ होती है। हम भी यही चाहते हैं कि किसी गलत का चिन्हीकरण न हो, लेकिन सही मायनों में जो आंदोलनकारी हैं, वह छूटने भी नहीं चाहिए। यह उनके साथ अन्याय होगा, लेकिन जिस तरह जिला प्रशासन का रवैया है उससे कमेटी सदस्य भी आहत है।
- उमा शर्मा, कमेटी सदस्य व आंदोलनकारी
कहां फंसा है पेंच
एलआईयू की रिपोर्ट, पुलिस रिकार्ड में नाम, जेल व घायल आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण के मानक रखे गए थे, लेकिन जो आंदोलनकारी इनमें से किसी मानक में नहीं आते उनका चिन्हीकरण कैसे होता। इसके लिए पांचवां मानक रखा गया था। इसके तहत ऐसे अभिलेख जिनसे पता लगता हो कि व्यक्ति ने आंदोलन में भाग लिया हो। डीएम उससे संतुष्ट हो। डीएम अपने विवेक के आधार (वरिष्ठ आंदोलनकारी से पुष्टि कर) पर सहमति दे दें। एलआईयू की रिपोर्ट, पुलिस में नाम दर्ज, जेल, घायल इन मानकों के आधार पर तो चिन्हीकरण हुए, लेकिन छूटे हुए आंदोलनकारी के लिए पांचवां ही विकल्प था, जिसे अब माना ही नहीं जा रहा। कमेटी सदस्यों का कहना है कि उनके पास छूटे हुए आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण का अधिकार होना चाहिए। भले छूटे हुए लोगों का नाम कही दर्ज न हो, लेकिन वह आंदोलन में भाग लेने वालों की पुष्टि कर सकते हैं।