एक्सक्लूसिव : अपनी तंगहाली के बावजूद छोटी मदद से बड़ी राहत पहुंचा रहे गुमनाम मसीहा
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न ये धन्नासेठ हैं न किसी प्रशिक्षित एनजीओ के सदस्य। न ही इनके मन में किसी प्रकार का सियासी मंसूबा है। इन्हें नाम कमाने अथवा पुरस्कार पाने की लालसा भी नहीं है।
इन्हें सिर्फ गुमनाम मसीहा कहा जा सकता है, जिनका दिल अपनी तंगहाली के बावजूद सिर्फ... और सिर्फ इंसानियत के लिए धड़कता है। हरिद्वार के औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल के कुछ मजदूरों ने कोरोना काल की पीड़ा से विकल होकर 30 फैक्टरी कर्मचारियों का एक समूह बनाया और जरूरतमंदों के मददगार बन गए।
आम धारणा है कि धर्मनगरी हरिद्वार में धनवान से लेकर भिक्षुक भूखे पेट नहीं सोता। सदाव्रत लंगरों के चलते बेघर और फुटपाथों पर जिंदगी बसर करने वालों का पेट भले ही भर जाता है, लेकिन कड़ाके की ठंड में नींद नहीं आती है। पूरी रात कांपते रहते हैं।
ठंड से ठिठुरते बेघर लोगों की मदद के लिए सिडकुल के तीस कर्मचारी मसीहा बनकर सामने आए हैं। लॉकडाउन की अवधि से ही कर्मचारी हर महीने अपनी तनख्वाह से एक-एक हजार रुपये एकत्र करते हैं। एकत्र फंड से जरूरतमंदों को खाना और दवा बांटने के बाद अब कंबल, मोजे और टोपियां बांट रहे हैं।
पैसा जुटाना बड़ी चुनौती था।
मुहिम की शुरुआत करने वाले राजेश वर्मा सिडकुल के एक कारखाने में नौकरी करते हैं। मूलरूप से बुंलदशहर निवासी राजेश बताते हैं लॉकडाउन में पैदा हुए हालात ने उनको झकझोर दिया। कोरोना संक्रमण की जद में आने से उनका आवासीय क्षेत्र धीरवाली कंटेंटमेंट जोन बन गया। ठीक उनके घर के बाहर बैरियर पर दो महिला पुलिस कर्मियों की ड्यूटी रही।
पुलिस कर्मियों को खाना और पानी के लिए तरसते देखा। पत्नी से उनके लिए खाना बनवाकर खिलवाया। पुलिस कर्मियों के चेहरों पर खुशी के भाव देखकर दिल को सुकून मिला। उसी दिन से जरूरतमंदों की सेवा करने का मन बना लिया। राजेश बताते हैं, सीमित तनख्वाह से घर-परिवार का गुजर बसर ही मुश्किल से होता है। हार नहीं मानी और सिडकुल के अलग-अलग कारखानों में काम करने वाले कुछ दोस्तों से अपनी बात साझा की।
सभी ने हामी भरी, लगभग फकीरी की स्थिति में पैसा जुटाना बड़ी चुनौती था। लेकिन ठान लिया था तो सोचा क्यों न सोशल मीडिया का सहारा लूं। व्हाट्सअप पर एक ग्रुप बनाया। ग्रुप में परिचितों और दोस्तों को जोड़ा। एक-एक हजार हर महीने तनख्वाह से जनसेवा के लिए दान करने का आग्रह किया। आग्रह से कुछ लोग ग्रुप को छोड़कर चले गए। लेकिन कुछ नए साथी भी जुड़े।
दिखावे से दूर रहता है यह समूह
रुद्रप्रयाग के मनोज रावत बताते हैं जैसे ही 20 लोग जुड़े इस समूह ने लॉकडाउन में खाना और दवाएं बांटनी शुरू कर दी। अब ग्रुप मेें तीस एक्टिव सदस्य बन गए हैं। सभी हर महीने एक-एक हजार रुपये दान करते हैं।
मनोज रावत बताते हैं ठंड शुरू हो गई है। सर्दी का सितम झेलते लोगों को कंबल बांट रहे हैं। कारखानों में ड्यूटी करने के बाद घर जाकर ग्रुप में ही जनसेवा का रूट निर्धारित कर लेते हैं। जरूरतमंदों को कंबल, टोपी और मोजे देते हैं।
फिलहाल चुपचाप अपने काम को अंजाम देने वाला यह समूह दिखावे से दूर रहता है। मनोज के मुताबिक ग्रुप से जुड़े लोग पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, यूपी और उत्तराखंड के मूल निवासी हैं। भविष्य में गरीब परिवारों की बेटियों की शादी करवाने और निर्धन लोगों के इलाज में दवा बांटने की योजना है।