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Uttarakhand News: पहाड़ों पर तेजी से खत्म हो रहे बांज के जंगल, शोध में जुटे एफआरआई के वैज्ञानिक
Sun, 17 Jan 2021 05:29 PM IST
अलका त्यागी
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
Published by: अलका त्यागी
Updated Sun, 17 Jan 2021 05:29 PM IST
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एफआरआई
- फोटो : फाइल फोटो
उत्तराखंड में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों में ग्रामीणों की जिंदगी में अहम स्थान रखने वाले बांज के जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं। इन जंगलों को उत्तराखंड में हरा सोना भी कहा जाता है। बांज के जंगलों की जगह चीड़ के जंगल उग रहे हैं। वन विभाग के अनुरोध पर वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में शोध शुरू कर दिया है।
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वन अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं वनस्पति विज्ञानी डॉ. वीके धवन ने बताया कि बांज के जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं। चौंकाने वाली बात चीड़ के जंगल तेजी से फैल रहे हैं। इसका कोई ठोस कारण अभी सामने नहीं आया है। तमाम पहलुओं पर शोध किए जा रहे हैं और इस बात का पता लगाया जा रहा है कि आखिरकार चीड़ के जंगलों में इतनी तेजी से इजाफा क्यों हो रहा है।
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बांज के जंगलों का अहम योगदान
वनस्पति विज्ञानी डॉ. वीके धवन के मुताबिक पर्वतीय इलाकों में बांज के जंगलों ग्रामीणों की जीविका में अहम स्थान है। साथ ही हिमालय की पारिस्थितिकी में भी अहम योगदान है। वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि बांज की जड़ें भरपूर मात्रा में पानी अवशोषित करती हैं और गर्मी में पानी छोड़ती हैं।
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इसकी वजह से पर्वतीय क्षेत्रों में जलसंकट से निपटने में बांज के जंगल अपनी अहम भूमिका अदा करते हैं। इतना ही नहीं बाज के पेड़ों की जड़ें मिट्टी को जकड़ कर रखती हैं, जिससे भू कटाव कम होने के साथ ही भूस्खलन का भी खतरा कम रहता है। बांज के पेड़ों की लकड़ियां ईंधन के तौर पर इस्तेमाल की जाती हैं। वहीं पत्तों की मदद से बिछौने बनाए जाते हैं। ठंड के मौसम में पत्तों के बिछौने बनाकर मवेशियों को ठंड से बचाया जाता है।
राज्य में पाई जाती हैं बांज की कई प्रजातियां
वनस्पति विज्ञानियों की मानें तो राज्य में बांज की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। इसतें तिलौज, रियांज और खरसू शामिल हैं। यह सभी प्रजातियां के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में 1200 से लेकर 3500 मीटर की उंचाई पर पाई जाती है।