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उच्च हिमालयी और मैदानी क्षेत्रों में पाए जाने वाले शैवालों से बनेगा बायोफ्यूल और जैविक खाद
Mon, 27 Jul 2020 03:56 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Mon, 27 Jul 2020 03:56 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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उत्तराखंड के उच्च हिमालयी और मैदानी क्षेत्रों में पाए जाने वाले शैवालों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। शैवालों का अध्ययन करने के बाद इनसे बायोफ्यूल के साथ ही जैविक खाद और पौष्टिक उत्पाद बनाने की योजना पर कार्य किया जाएगा। वन अनुसंधान शाखा के इस प्रोजेक्ट को मंजूरी भी दे दी गई है। अनुसंधान शाखा के अधिकारियों के मुताबिक मैदानी क्षेत्रों में पाए जाने वाले शैवालों का हरिद्वार और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले शैवालों का उत्तरकाशी में बनाए गए केंद्र में अध्ययन किया जाएगा।
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इजराइल समेत दुनिया के कई ऐसे देश हैं जहां पाई जाने वाले शैवालों यानी काई के जरिये बायोफ्यूल बनाने के साथ ही जैविक खाद बनाई जा रही है। इन शैवालों के जरिये कई पौष्टिक उत्पाद भी बनाए जा रहे हैं।
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भारत में अभी इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है, लेकिन अब वन अनुसंधान शाखा के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में पहल की है। राज्य के मैदानी और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले शैवालों का अध्ययन करने के साथ ही इन्हें आर्थिकी से जोड़ने को लेकर पहल की गई है। वन अनुसंधान शाखा की ओर से इस संबंध में एक प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। जिसे परिषद की बैठक में मंजूरी भी दे दी गई है।
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उत्तराखंड में पाई जाती हैं शैवाल की 300 से अधिक प्रजातियां
वन अनुसंधान शाखा के विज्ञानियों के अनुसार उत्तराखंड के मैदानी और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में शैवाल की 300 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें अधिकतर के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है।
शैवालों से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का भी होगा अध्ययन
वन अनुसंधान शाखा के वैज्ञानिकों के मुताबिक शैवालों का अध्ययन करने के दौरान इस बात का भी पता लगाया जाएगा कि आखिरकार पर्यावरण पर इनका क्या प्रभाव पड़ रहा है? साथ ही राज्य में गंगा, यमुना समेत नदियों में पाई जाने वाले शैवालों से विभिन्न प्रजातियों का अध्ययन कर इस बात की जानकारियां जुटाई जाएंगी कि जलीय जंतुओं पर इनका क्या प्रभाव पड़ रहा है।
राज्य के मैदानी और हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले शैवालों का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा। मैदानी क्षेत्रों में पाए जाने वाले शैवालों का हरिद्वार और उच्च हिमालयी क्षेत्रों के शैवालों का उत्तरकाशी में बनाए गए केंद्र में अध्ययन होगा। शैवालों का अध्ययन करने के साथ ही इसे आर्थिकी से जोड़ने की रिपोर्ट तैयार की जाएगी। जिसमें दुनिया के कई देश शैवालों पर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। जहां इससे जैविक खाद और बायोफ्यूल बनाने के साथ ही पौष्टिक उत्पाद बनाए जा रहे हैं। - संजीव चतुर्वेदी, मुख्य वन संरक्षक एवं निदेशक वन अनुसंधान शाखा