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उत्तराखंड: आवेदन ही नहीं हुआ तो कैसे मिलती अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज को मान्यता, सोशल मीडिया पर छिड़ी मुहिम
Wed, 17 Nov 2021 02:47 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Wed, 17 Nov 2021 02:47 PM IST
सार
अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज को वैसे तो वर्ष 2017 में शुरू करने की योजना थी लेकिन धीरे-धीरे तारीख पीछे खिसकती चली गई। छात्रों का इंतजार भी साल-दर-साल आगे बढ़ता चला गया।
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अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज
- फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
प्रदेश के तीसरे सरकारी सोबन सिंह जीना अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज के लिए विभाग के अधिकारियों ने फीस तो जमा करा दी लेकिन आवेदन ही नहीं कर पाए। गफलत में महीनों तक अधिकारी नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) के निरीक्षण का इंतजार करते रह गए। अब 15 नवंबर की तिथि भी निकल चुकी है। मेडिकल कॉलेज की मान्यता की प्रक्रिया लटक गई है। उधर, युवाओं ने मेडिकल कॉलेज के हक में ट्वीटर पर विशेष अभियान छेड़ दिया है।
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एक चूक की वजह से कॉलेज की मान्यता लटक गई
अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज को वैसे तो वर्ष 2017 में शुरू करने की योजना थी लेकिन धीरे-धीरे तारीख पीछे खिसकती चली गई। छात्रों का इंतजार भी साल-दर-साल आगे बढ़ता चला गया। सरकारी मशीनरी ने दबाव को देखते हुए कॉलेज का निर्माण करने के साथ ही पद सृजित किए, प्रिंसिपल की तैनाती की। सभी प्रक्रिया शुरू हो गई, लेकिन एक चूक की वजह से कॉलेज की मान्यता लटक गई। तत्कालीन अधिकारियों ने कॉलेज की मान्यता के लिए फीस जमा करा दी। जब ऑनलाइन आवेदन करने की बारी आई तो उसमें अटक गए। आधे-अधूरे फार्म को सबमिट कर दिया गया लेकिन वह जमा ही नहीं हुआ। किसी ने इस ओर ध्यान भी नहीं दिया।
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अधिकारी, एनएमसी की टीम के निरीक्षण के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। निरीक्षण और मान्यता का समय खत्म होने को आया तो अधिकारियों को होश आया। उन्होंने एक अधिकारी को एनएमसी में भेजा तो पता चला कि अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज का तो नाम ही नहीं था। जब जानकारी की तो पता चला कि आवेदन ही नहीं हुआ। इस चूक की भरपाई के प्रयास शुरू किए गए जो कि अभी तक नाकाफी हैं। हालात यह हैं कि अब सरकार और अधिकारी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का मुंह देख रहे हैं। कहीं वह कोई रास्ता निकालें तो कॉलेज को मान्यता मिलेगी।
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युवाओं ने ट्वीटर पर छेड़ा अभियान
युवाओं ने ट्वीटर पर हैशटैग अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज के नाम से अभियान छेड़ दिया है। रोजाना अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज को शुरू करने के हक में सैकड़ों ट्वीट हो रहे हैं। युवा लगातार सीएम से लेकर पीएम मोदी तक को टैग करते हुए ट्वीट कर रहे हैं। मुहिम के संयोजक डीके मिश्रा का कहना है कि 2012 में जिस कॉलेज की शुरुआत हुई थी, उसमें अब तक कक्षाएं शुरू नहीं हो पाई हैं।
मान्यता मिली तो होनहारों को होगा बड़ा फायदा
अगर अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज को एमबीबीएस की 100 सीटें मिल जाती हैं तो होनहारों को बड़ा फायदा होगा। इनमें से 15 प्रतिशत सीटें तो ऑल इंडिया कोटे से भरी जाएंगी लेकिन 85 सीटों पर राज्य के युवाओं को नीट स्कोर के आधार पर दाखिला मिलेगा।
15 नवंबर तक था समय
मेडिकल कॉलेजों की मान्यता की प्रक्रिया पूरी होने का समय केंद्र सरकार ने 15 नवंबर तक तय किया था। 15 नवंबर को ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने देशभर के कॉलेजों की मान्यता के पत्र जारी कर दिए हैं। धीरे-धीरे अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज की आस टूटती जा रही है।
हमने मेडिकल कॉलेज के निरीक्षण व मान्यता के लिए फीस जमा कराई। इसके बाद आवेदन किया। हम संतुष्ट थे लेकिन बाद में पता चला कि तकनीकी दिक्कत की वजह से आवेदन नहीं हुआ। अब मामला सरकार के स्तर पर चल रहा है। उम्मीद है कि जल्द ही कोई निर्णय होगा।
-डॉ. पंकज पांडेय, सचिव, चिकित्सा शिक्षा
अशासकीय महाविद्यालयों पर शिकंजा कसने की मुहिम को झटका
हाईकोर्ट के फैसले से प्रदेश सरकार की अशासकीय महाविद्यालयों पर शिकंजा कसने की कवायद को झटका लगा है। सरकार इन महाविद्यालयों के राज्य विश्वविद्यालयों से संबद्ध न होने पर उनका अनुदान रोकने की तैयारी में थी। सरकार का स्पष्ट मत था कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों से संबद्ध महाविद्यालयों को राज्य सरकार से अनुदान दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा इससे केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उस आदेश पर भी सवाल खड़ा हुआ है, जिसमें केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम में बदलाव के बिना ही इन महाविद्यालयों को असंबद्ध करने का आदेश कर दिया गया।
प्रदेश सरकार एचएनबी केंद्रीय विश्वविद्यालय से संबद्ध 18 महाविद्यालयों का अनुदान यह कहते हुए रोकने की तैयारी में थी कि सरकार की ओर से कुछ मामलों में एचएनबी केंद्रीय विश्वविद्यालयों से संबद्ध महाविद्यालयों को दिशा निर्देश देने पर संबंधित महाविद्यालय उसका पालन नहीं करते। जबकि इन महाविद्यालयों को राज्य सरकार की ओर से अनुदान दिया जा रहा है। सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया था कि केंद्रीय विश्वविद्यालय से संबद्ध अशासकीय महाविद्यालयों ने राज्य विश्वविद्यालय से संबद्धता न ली तो उनका अनुदान रोका जाएगा। सभी पहलुओं की पड़ताल के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव ओम प्रकाश की अध्यक्षता में कार्मिक, न्याय, वित्त एवं प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा को सदस्य नामित करते हुए कमेटी गठित की गई थी।
जबकि एचएनबी केंद्रीय विश्वविद्यालय की ओर से इन अशासकीय महाविद्यालयों को असंबद्ध किए जाने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को इसकी सिफारिश की गई थी। याचिकाकर्ता रविंद्र जुगरान के मुताबिक केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इस मामले में बिना परीक्षण के इन महाविद्यालयों की असंबद्धता का आदेश कर दिया था। जबकि वर्ष 2009 के केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम में संसद से प्रस्ताव पास हुए बिना इन महाविद्यालयों को असंबद्ध नहीं किया जा सकता। अधिनियम में स्पष्ट है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय से न तो नए महाविद्यालय जुड़ सकते हैं न ही पुराने महाविद्यालयों को असंबद्ध किया जा सकता है। हाईकोर्ट में प्रदेश सरकार एवं केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के आदेश को चुनौती दिए जाने पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया गया है।