उत्तराखंड: रेंग-रेंग कर चल रहा 10 रोपवे बनाने का काम, घोषणा के बाद भी हाल-बेहाल, पढ़ें खास रिपोर्ट...
Ropeway in uttarakhand: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पिछले दिनों सड़कों और रोपवे के संबंध में सचिवालय में आयोजित एक बैठक में रोपवे कनेक्टिविटी नेटवर्क बढ़ाने के लिए लोक निर्माण विभाग में रोपवे सेल बनाने के निर्देश दिए थे। लेकिन शासनादेश न होने के कारण अभी तक इस सेल का गठन नहीं हो पाया है।
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विस्तार
उत्तराखंड में देहरादून (पुरकुल गांव) से मसूरी (लाइब्रेरी चौक), कद्दूखाल से सुरकंडा देवी मंदिर, ठुलीगाड़ से पूर्णागिरि, जानकी चट्टी (खरसाली) से यमुनोत्री, रानी बाग से नैनीताल, गौरीकुंड से केदारनाथ, गोविंद घाट से हेमकुंड, झलपाडी से दीवाडांडा, कीर्तिखाल से भैरव गढ़ी और क्यूंकालेश्वर महादेव मंदिर तक रोपवे बनाए जाने हैं। इनके निर्माण फिलहाल अलग-अलग चरणों में हैं। लेकिन ज्यादातर का निर्माण कछुए की रफ्तार से हो रहा है। प्रदेश में हरिद्वार में चंडी देवी रोपवे, मां मनसा देवी रोपवे, मल्लीताल नैनीताल रोपवे, देहरादून में सहस्रधारा रोपवे, जोशीमठ में औली रोपवे, टिहरी में कैंपटी फॉल, मसूरी रोपवे और भट्टा गांव मसूरी समेत कुल आठ रोपवे संचालित हो रहे हैं। सभी चालू हालत में हैं। बीते माह ही लोनिवि व पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने पर्यटन, ब्रिडकुल, वन विभाग और लोनिवि के अधिकारियों के साथ बैठक रोपवे निर्माण की प्रगति जानी थी और दिशा निर्देश जारी किए थे।
देहरादून : मंजूरी मिलते ही शुरू होगा दून-मसूरी एरियल रोपवे का काम
दून से मसूरी तक एरियल पैसेंजर रोपवे का सपना जल्द ही साकार होगा। योजना में आ रही सभी बाधाएं लगभग पूरी हो चुकी है। इंतजार है तो सिर्फ केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की स्वीकृति की। स्वीकृति मिलती ही रोपवे का काम शुरू हो जाएगा। दिसंबर तक योजना पर काम शुरू होने की उम्मीद है। दून-मसूरी के प्रस्तावित रोपवे को विश्व का पांचवां सबसे लंबा मोनो-केबिल डिटैचेबल पैसेंजर रोपवे माना जा रहा है। इसकी लंबाई करीब पांच किलोमीटर है। निर्माण पूरा होने से दून से मसूरी की दूरी मात्र बीस मिनट रह जाएगी। करीब 258 करोड़ के इस प्रोजेक्ट की लगभग सभी बाधाएं पूरी हो चुकी हैं। योजना में सबसे बड़ी बाधा लैंड ट्रांसफर की थी। इसे सुलझा लिया गया है। डिप्टी डायरेक्टर उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषदऔर योजना का काम देख एसएस सामंत ने बताया कि विभाग की साल के अंत तक योजना पर काम शुरू करने की योजना है। कहा कि लगभग सभी बाधाएं पूरी हो चुकी है।
चमोली: तीन साल से नहीं हुआ घांघरिया-हेमकुंड रोपवे का निर्माण
चमोली जनपद में जोशीमठ-औली रोपवे का संचालन जीएमवीएन (गढ़वाल मंडल विकास निगम) की ओर से किया जा रहा है। जिले में हेमकुंड साहिब यात्रा मार्ग पर घांघरिया से हेमकुंड तक की छह किलोमीटर की पैदल दूरी को कम करने के लिए पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने वर्ष 2018 में यहां रोपवे निर्माण की घोषणा की थी, लेकिन इसका निर्माण शुरू नहीं हो पाया है। रोपवे के टावर व अन्य सामग्री एक वर्ष पूर्व घांघरिया क्षेत्र में रखी गई थी। रोपवे न होने से हेमकुंड साहिब के तीर्थयात्रियों को 19 किमी की पैदल दूरी तय करनी पड़ रही है।
नई टिहरी: धीमी गति से चल रहा सुरकंडा रोपवे का निर्माण
टिहरी जिले में एक मात्र टिपरी-मदननेगी रोपवे का संचालन हो रहा है। टिहरी बांध प्रभावित प्रतापनगर क्षेत्र के लोग इस रोपवे से झील से आरपार आवागमन करते हैं। सात सीटर इस रोपवे का संचालन 2015 से सिडकुल निरंतर करता आ रहा है, जबकि स्यांसू-भल्डिायाणा रोपवे का संचालन दिसंबर 2020 से ठप है। वहीं, सुरकंडा रोपवे का निर्माण बेहद धीमी गति से हो रहा है। बांध प्रभावित क्षेत्र के लिए 8 नवंबर 2020 को डोबरा-चांठी पुल के लोकार्पण के बाद स्सांयू-भल्डियाणा रोपवे का संचालन बंद कर दिया गया है। शासन स्तर पर अब स्यांयू-भल्डियाणा रोपवे पर्यटन विभाग को सौंपने की कवायद चल रही है। वहीं सिद्धपीठ सुरकंडा के लिए कद्दूखाल से 2014-15 से पीपीपी मोड पर रोपवे का निर्माण चल रहा है। 13 करोड़ की लागत से बनने वाले कद्दूखाल-सुरकंडा रोपवे का निर्माण धीमी गति से चल रहा है। जनवरी 2019 तक रोपवे का संचालन शुरू होना था, लेकिन 80 फीसदी कार्य भी पूरा नहीं हो पाया है। रोपवे न होने के कारण सिद्धपीठ सुरकंडा के दर्शनों के लिए जाने वाले वृद्ध और दिव्यांग लोग आसानी से मंदिर तक नहीं पहुंच पाते।
पौड़ी: तीन प्रस्ताव शासन में कैद
पौड़ी जिले में तीन पर्यटन/धार्मिक स्थलों में रोपवे निर्माण के प्रस्ताव हैं। यह प्रस्ताव अलग-अलग समय में पर्यटन विकास निदेशालय के माध्यम से बनाए गए हैं। अभी तक इनका क्रियान्वयन नहीं हुआ है। वर्ष 2017 में पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज के निर्देश पर पोखड़ा ब्लॉक में जलपाड़ी-दीवा का डांडा और जयहरीखाल क्षेत्र में कीर्तिखाल-भैरवगढ़ी रोपवे के लिए प्रारंभिक सर्वेक्षण हुआ था। अभी यहां 7 किलोमीटर की खड़ी पैदल चढ़ाई चढनी पड़ती है। भैरवगढ़ी भी खूबसूरत स्थान है। यहां भैरवनाथ का मंदिर है। यहां पहुंचने के लिए ढाई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने पौड़ी बाजार से क्यूंकालेश्वर मंदिर तक रोपवे निर्माण की घोषणा की थी। जिला पर्यटन विकास अधिकारी केएस नेगी का कहना है कि अभी रोपवे का काम शुरू नहीं हुआ है। प्रस्ताव संबंधी सारे कार्य निदेशालय स्तर पर हुए हैं।
उत्तरकाशी: यमुनोत्री रोपवे योजना शिलान्यास तक सीमित
जनपद में एक भी रोपवे संचालित नहीं हो रहा है। वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल व भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यमुना घाटी के खरसाली गांव में रोपवे योजना का शिलान्यास किया था। रोपवे का निर्माण यमुनोत्री यात्रा को सुगम बनाना था। इसके लिए खरसाली के ग्रामीणों की 75 नाली भूमि का अधिग्रहण भी किया गया था। करीब 4 किमी लंबी योजना का निर्माण 70 करोड़ की लागत से किया जाना था लेकिन निर्माण कार्य शिलान्यास से आगे नहीं बढ़ पाया। स्थिति यह है कि अब तक टेंडर प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो पाई है। वहीं दयारा बुग्याल में भी रोपवे प्रस्तावित था, जिस पर भी अभी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
रुद्रप्रयाग: केदारनाथ में मंजूर रोपवे सर्वे से आगे नहीं बढ़ा
मौजूदा समय में रुद्रप्रयाग जिले में कोई रोपेव नहीं है। जबकि केदारनाथ के लिए वर्ष 2005 से स्वीकृत रोपवे सर्वेक्षण से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। जबकि वर्ष 2018 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने भी जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांग चुका है। जून 2013 की आपदा के बाद से रोपवे निर्माण को लेकर पूर्व सीएम हरीश रावत ने भी तीन बार घोषणा की थी। वहीं, एक दशक पूर्व ऊखीमठ ब्लॉक के करोखी गांव में भी रोपवे निर्माण की योजना परवान नहीं चढ़ पाई।
कुमाऊं में ये है हाल
बागेश्वर : जिले में नहीं है एक भी रोपवे
जिले में धार्मिक स्थलों के लिए रोपवे लगाने की घोषणा तो खूब हुई है, लेकिन रोपवे का निर्माण नहीं हुआ। जिले में वर्तमान में एक भी रोपवे नहीं है। जिला मुख्यालय के प्रमुख धार्मिक स्थल नीलेश्वर से चंडिका मंदिर तक रोपवे लगाने की घोषणा कई बार चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने की। सरकार से भी आश्वासन मिला लेकिन रोपवे की सुविधा आज तक नहीं मिल सकी है। दोनों मंदिर आमने-सामने की चोटियों पर बने हैं। रोपवे से जहां लोग सरयू और गोमती नदी के विहंगम दृश्य का दीदार कर पाते, वहीं लोगों को रोजगार भी मिलता। पर्यटन को पंख लगते। सरकार कब बागेश्वर को रोपवे की सौगात देती है, यह भविष्य के गर्भ में है।
अल्मोड़ा : रोप-वे स्वीकृत होने के बाद भी नहीं बने
जिले में कहीं भी रोपवे नहीं हैं। राज्य बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने अल्मोड़ा नगर से कसारदेवी और पांडेखोला के अलावा स्याहीदेवी के लिए रोप-वे स्वीकृत किए थे ताकि अल्मोड़ा में पर्यटन गतिविधियों को गति मिल सके। रोप-वे बनना तो दूर इनका सर्वे तक का कार्य शुरू नहीं हो सका है। इसकी वजह से यह योजना धरातल पर नहीं उतर सकी है।
चंपावत : काम नहीं कर रहे चार रोपवे
जिले में छह रोपवे (रज्जुमार्ग) हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ दो ही काम कर रहे हैं। उपराकोट से फुरकियाझाला और लोडियालसेरा से खिरद्वारी को छोड़ शेष चार रोपवे तकनीकी या दूसरे कारणों से काम नहीं कर रहे हैं। चार रोपवे खेती के उत्पादों को सड़क तक लाने के लिए प्रयुक्त किए जा रहे हैं। वहीं मां पूर्णागिरि धाम के दर्शन के लिए हनुमान चट्टी से काली मंदिर तक 903 मीटर लंबा रोपवे मंजूर है। 35 करोड़ रुपये की लागत से पीपीपी मोड पर बनने वाले रोपवे की सारी अड़चनें दूर कर ली गईं हैं। अक्तूबर से इस रोपवे के निर्माण का काम शुरू हो जाएगा।
पिथौरागढ़ : रोप वे से नहीं जुड़ सके पिथौरागढ़ के दर्शनीय और धार्मिक स्थल
पिथौरागढ़ जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दर्शनीय और धार्मिक स्थलों को रोपवे से जोड़ने की घोषणाएं पूरी नहीं हो सकी हैं। वर्ष 1994 में पिथौरागढ़ नगर को पर्यटन के नक्शे पर लाने के लिए ध्वज, चंडिका मंदिर, चंडाक- मोस्टामानू तक रोप वे लगाने का प्रस्ताव बना था। वर्ष 2014 में भी मुनस्यारी से खलियाटॉप तक रोप-वे की घोषणा हुई थी। इसके बाद चंडिका मंदिर, असुरचूला और ध्वज तक रोप वे का प्रस्ताव शासन को भेजा गया लेकिन आज तक रोप वे निर्माण की दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी है। केवल चुनाव के समय राजनीतिक दलों को रोप वे की याद आती है।
नैनीताल : एक रोपवे, केएमवीएन करता है इसका संचालन
नैनीताल में एकमात्र रोपवे है, जिसका संचालन कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) करता है। कोरोनाकाल में इसे अत्याधुनिक बनाया गया था। दूसरी लहर थमने के बाद इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है। इसमें सैलानी मल्लीताल से स्नोव्यू तक आवाजाही करते हैं। रानीबाग से नैनीताल के लिए भी एक और रोपवे प्रस्तावित था, लेकिन आपत्ति लगने के बाद यह खटाई में पड़ गया है।