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बस नहीं समस्याओं का अड्डा है उत्तराखंड का ISBT

Wed, 21 Dec 2016 09:32 AM IST
सुनीत द्विवेदी / अमर उजाला, देहरादून
सुनीत द्विवेदी / अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 21 Dec 2016 09:32 AM IST
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uttarakhand isbt is a haunt of problem
isbt

करोड़ों की लागत से बना उत्तराखंड का पहला आईएसबीटी बसों के बजाय समस्याओं का अड्डा बन गया है। देश-विदेश से यात्री व पर्यटक यहां पहुंचते हैं, बावजूद इसके उनकी सुविधा के लिए यहां ऐसा कुछ भी नहीं, जो देवभूमि के गौरव से मेल खाता हो।

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सुरक्षा-सुविधा, दोनों मामलों में व्यवस्थाएं फेल हैं। पीपीपी मोड पर रैम्की कंपनी द्वारा संचालित आईएसबीटी में न तो इन-आउट का बोर्ड लगा है। न ही अग्नि शमन यंत्र यहां दिखाई देते हैं। खोया-पाया ऑफिस भी कहीं खो गया है। बात यहीं खत्म नहीं होती। वेटिंग हॉल को रेस्टोरेंट बना दिया गया।
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त्वरित चिकित्सा की व्यवस्था नहीं है। वहीं, पुलिस टीम की ओर से आखिरी बार गश्त कब हुई थी? शायद ही यहां मौजूद लोग बता सकें। लेकिन, इसके बावजूद आईएसबीटी का संचालन करने वाली रैम्की ग्रुप ऑफ कंपनीज हैदराबाद की ओर कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। आम लोगों की तो बात छोड़िए, कंपनी के अफसर मुख्यमंत्री और परिवहन सचिव के निर्देश भी मानने को तैयार नहीं हैं। 
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फटकार के बाद भी नहीं सुधरे हालात
परिवहन सचिव ने करीब छह माह पहले आईएसबीटी का दौरा किया था। अव्यवस्थाएं देख उन्होंने रैमकी कंपनी को दिए जाने वाला किराया एमडीडीए को देने के निर्देश दिए। वहीं, करीब 10 माह पहले मुख्यमंत्री ने भी दौरा कर कंपनी के अफसरों के पेच कसे थे। उन्होंने तो साफ लफ्जों में कह दिया था, सुधर जाओ नहीं तो इसे सरकार अधिग्रहीत कर लेगी। 

गेट के साथ ही अंदर भी डग्गामार वाहन   
आईएसबीटी के गेट के साथ ही अंदर तक डग्गामार वाहनों का कब्जा है। विक्रम और ऑटो वाले भी पीछे नहीं है। बस से यात्रियों के उतरने ही ये लोग उनके पीछे दौड़ लगा देते हैं। कई बार तो यात्रियों को हाथ जोड़कर इनसे पीछा छुड़ाना पड़ता है। डग्गामार वाहनों पर अंकुश लगाने को रोडवेज यूनियनों के आंदोलन के बाद भी निगम और आरटीओ के अफसर कोई अभियान नहीं चलाते।

जर्जर हालत में सड़क 
परिसर के अंदर की सड़क उखड़ी हुई पड़ी है। यहां मौजूद यात्रियों ने बताया कि बरसात के मौसम या बारिश में यहां जलभराव हो जाता है। इतना ही नहीं वाहनों के उनमें से गुजरने से कई लोगों के कपड़े भी खराब हो जाते हैं। 

कम संख्या में लगे हैं साइनबोर्ड 
इन और आउट का बोर्ड न लगे होने से यात्रियों को परेशानी होती है, जिसके कारण उन्हें आईएसबीटी के बाहर खड़े होकर बस पकड़नी पड़ती है। वहीं, आईएसबीटी में रूटों के करीब 25-30 प्रतिशत ही साइनबोर्ड लगे हुए हैं। यात्रियों को गंतव्य का प्लेटफार्म ढूंढने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। दिल्ली से आईएसबीटी पहुंचे हेमंत कुमार कहते हैं कि वह मसूरी जाना चाह रहे हैं। काफी खोजबीन के बाद मसूरी का साइनबोर्ड दिखा। पहुंचा तो पता चला कि मसूरी की बसें यहां से चलती ही नहीं हैं। 

ठंड में बगैर गद्दे के तख्त में सोने को मजबूर ड्राइवर 
ड्राइवरों के लिए स्टॉफ रेस्ट रूम बनाया गया है। लेकिन, ठंड के मौसम के बावजूद यहां ड्राइवर बगैर गद्दे के तख्त में सोने को मजबूर हैं। ड्राइवर रामकुमार कहते हैं कि बगैर गद्दों के इन तख्तों में नींद नहीं आती है। कई बार इसकी शिकायत की, पर कार्रवाई नहीं हुई।  


डॉरमेट्री में नहीं पहुंच पाते दिव्यांग 
कहने को यहां दो डारमेट्री तो बना दी गई है, लेकिन इसका लाभ दिव्यांगों को नहीं मिल पा रहा है। वजह रैंप का न होना है। वहीं, लिफ्ट भी नहीं है। 

एमडीडीए और रैम्की ग्रुप ऑफ कंपनीज हैदराबाद की ओर से पीपीपी मोड में आईएसबीटी का निर्माण किया गया है। आमदनी में कमी के कारण कुछ काम प्रभावित हो रहे हैं। पैसा आने पर जल्द ही जरूरी कार्यों को पूरा कराया जाएगा।
- बिरेंद्र सिंह नेगी, प्रोजेक्ट हेड, रैम्की  

आईएसबीटी की कमियों को लेकर समय-समय पर रैम्की कंपनी को अवगत कराया जाता है। इसके बावजूद कमियों को दूर करने के लिए उन्हें फिर से लिखा जाएगा।
- दीपक जैन, जीएम संचालन, परिवहन निगम

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