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उत्तराखंड: हाईकोर्ट ने कुंभ में कोरोना जांच फर्जीवाड़े में आरोपितों की गिरफ्तारी पर रोक बढ़ाई
Tue, 20 Jul 2021 09:27 PM IST
अलका त्यागी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
Published by: अलका त्यागी
Updated Tue, 20 Jul 2021 09:27 PM IST
सार
न्यायमूर्ति एनएस धानिक की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार शरत पंत व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे मैक्स कॉरपोरेट सर्विसेस में एक सर्विस प्रोवाइडर है।
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कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
कुंभ मेले के दौरान कोरोना जांच फर्जीवाड़े में मैक्स कॉरपोरेट सर्विसेज, सर्विस पार्टनर शरत पंत और मलिका पंत की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक के आदेश को दो सप्ताह के लिए बढ़ा दिया है। कोर्ट ने आरोपितों को जांच में सहयोग करने के निर्देश भी दिए हैं।
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वहीं, मंगलवार को सरकार की ओर से प्रार्थनापत्र देकर कोर्ट से अनुरोध किया कि पूर्व के आदेश को रिकॉल किया जाए या वापस लिया जाए क्योंकि जांच में उक्त के खिलाफ गंभीर साक्ष्य हैं और पुलिस ने गंभीर साक्ष्यों के आधार पर ही उक्त के खिलाफ आईपीसी की धारा 367 बढ़ाई है। इसलिए अब अननेश कुमार बनाम बिहार राज्य का निर्णय उक्त पर लागू नहीं होता है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने इस पर आपत्ति दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा।
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न्यायमूर्ति एनएस धानिक की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार शरत पंत व अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि वे मैक्स कॉरपोरेट सर्विसेस में एक सर्विस प्रोवाइडर है। परीक्षण और डेटा प्रविष्टि के दौरान मैक्स कॉरपोरेट का कोई कर्मचारी मौजूद नहीं था। इसके अलावा, परीक्षण और डेटा प्रविष्टि का सारा काम स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की प्रत्यक्ष निगरानी में किया गया था। इन अधिकारियों ने परीक्षण स्टालों में जो कुछ भी किया था, उसे अपनी मंजूरी दे दी। अगर कोई गलत काम कर रहा था तो कुंभ मेले की पूरी अवधि के दौरान अधिकारी चुप क्यों रहे।
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वहीं, मुख्य चिकित्सा अधिकारी हरिद्वार ने पुलिस में मुकदमा दर्ज करते हुए आरोप लगाया था कि कुंभ मेले के दौरान आरोपितों की ओर से अपने लाभ के लिए फर्जी तरीके से जांचें की गईं। एक व्यक्ति ने सीएमओ हरिद्वार को एक पत्र भेजकर शिकायत की थी कि कुंभ मेले में टेस्ट कराने वाली लैबों द्वारा उनकी आईडी और फोन नंबर का उपयोग किया गया है, जबकि उन्होंने रैपिड एंटीजन टेस्ट कराने के लिए कोई सैंपल ही नहीं दिया था। कोर्ट ने पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य के निर्णय के आधार पर आरोपितों की गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी जिसमें सात साल से कम सजा वाले केसों में गिरफ्तार नहीं करने और जांच में सहयोग करने का प्रावधान है। इसी के आधार पर कोर्ट ने उक्त की गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी।