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उत्तराखंड: जीईपी से सरकार बताएगी मिट्टी, हवा, पानी और जंगल में हुई कितनी बढ़ोतरी

Fri, 13 Mar 2020 04:00 AM IST
अलका त्यागी सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 13 Mar 2020 04:00 AM IST
सार

  • जीईपी के आकलन को प्रमुख सचिव वन की अध्यक्षता में कमेटी गठित, नियोजन विभाग बना नोडल 

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Uttarakhand government will do GEP To Know how much increase in soil, air, water and forest
- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

कई साल के इंतजार के बाद उत्तराखंड ने जीईपी (सकल पर्यावरण उत्पाद) की ओर कदम बढ़ा लिया है। जीईपी क्या होगी और किस तरह की होगी, यह डब्ल्यूआरआई (वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट), भारतीय वन्यजीव संस्थान व वाडिया आदि के सहयोग से तय होगा। प्रदेश का नियोजन विभाग इसमें उनकी मदद करेगा। इसके साथ ही इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रमुख सचिव वन आनंद वर्द्धन की अध्यक्षता में कमेटी का गठन भी किया गया है। उत्तराखंड पहला ऐसा राज्य है जो जीईपी तैयार कर रहा है।

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जीईपी के लक्ष्य तय करने, सुझाव देने, दायित्व आदि के आधार पर आधार पत्र (कांसेप्ट नोट) तैयार कर प्रमुख सचिव वन आनंद वर्द्धन को सौंपा जाएगा। प्रमुख सचिव वन की अध्यक्षता में संचालन समिति का गठन भी किया गया है। इस समिति में अपर सचिव वन सुभाष चंद्र के साथ ही सभी संबंधित विभागों के अध्यक्ष भी शामिल हैं। उत्तराखंड में इस काम के समन्वय के लिए नियोजन विभाग को नोडल विभाग बनाया गया है। जीईपी में नीरी और एफआरआई सहित अन्य संस्थान भी सहयोग करेंगे।
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पांच मार्च की बैठक में बनी थी सहमति
भारतीय वन्य जीव संस्थान में पांच मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर के. विजय राघवन की अध्यक्षता में हुई बैठक में जीईपी के काम को उत्तराखंड में आगे बढ़ाने पर सहमति बनी थी। हैस्को के संस्थापक निदेशक पद्मभूषण डॉ.अनिल जोशी ने जीईपी की अवधारणा को सामने रखा था। डॉ.जोशी का कहना था कि जीडीपी या सकल घरेलू उत्पाद से यह तो पता चलता है कि प्रदेश में कितना उत्पादन हुआ, लेकिन यह सामने नहीं आता कि मिट्टी, पानी, हवा और जंगल में कितना सुधार हुआ।  

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कई साल के इंतजार के बाद आगे बढ़ी बात

2013 की केदारनाथ आपदा के बाद प्रदेश में जीईपी पर बात होनी शुरू हुई थी। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने नोबल पुरस्कार विजेता सुरेश पचौरी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन भी किया था। इस समिति की बैठकें  भी हुईं, लेकिन फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया। लेकिन हैस्को के संस्थापक निदेशक पद्मभूषण डॉ.अनिल जोशी की ओर से कोशिश जारी रही। 

ग्रीन जीडीपी से अलग है जीईपी
प्रदेश के कुल उत्पादन से पर्यावरण को हुए नुकसान को घटाने पर जो सामने आएगा वह ग्रीन जीडीपी है। जीईपी में पर्यावरण के घटक हवा, पानी, मिट्टी आदि में एक साल में हुए सुधार का आकलन किया जाना है। साफ है कि जीईपी यह बताएगी कि प्रदेश ने पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों का उपयोग करने में पारिस्थितिकीय तंत्र (मिट्टी, हवा, पानी और जंगल के आपसी संबंध की पूरी व्यवस्था) का नुकसान घटाने में कितना काम किया।

जीईपी में इनका होगा आकलन
जंगल - वन आवरण, वन क्षेत्र, नया पौधरोपण, पौधों के जीवित रहने की दर, जैव विविधता, वन उपज।
पानी - प्रदूषण, पानी की मात्रा, कितना पानी रिचार्ज किया गया, बारिश का पानी कितना बचाया गया, भूजल, प्राकृतिक जल स्रोतों को कितना रिचार्ज किया गया।
हवा - प्रदूषण कितना कम हुआ, हवा की गुणवत्ता, हवा में पीएम 10, पीएम 5 आदि सूक्ष्म कणों की मात्रा आदि।
मिट्टी - कितने हानिकारक तत्व कम हुए, मिट्टी की गुणवत्ता, सतह की मिट्टी की गुणवत्ता और गहराई, वन भूमि की मिट्टी की गुणवत्ता।

जीईपी पर कांसेप्ट नोट तैयार होने के बाद यह तस्वीर और खुलकर सामने आएगी। फ्रेमवर्क हैस्को ने तैयार कर लिया था। प्रदेश का नियोजन विभाग भी अब इस मुहिम में शामिल है। केंद्र सरकार और विशेषज्ञों का भी सहयोग मिल रहा है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य होगा जो सफलतापूर्वक इस अवधारणा को लेकर आएगा।
- पद्मभूषण डॉ.अनिल जोशी, संस्थापक निदेशक हैस्को

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