उत्तराखंड सरकार के तीन साल: खेती हुई कम, रोजगार बढ़ाने और पलायन रोकने को करने होंगे कई इंतजाम
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प्रदेश के किसानों की डबल इनकम करने के लिए सरकार ने पिछले तीन सालों में खेती किसानी के लिए तमाम योजनाएं और निर्णय लिए हैं। पहाड़ों में खेती किसानी की असलियत यह है कि राज्य गठन के बाद 24 हजार हेक्टेयर खेती की जमीन कम हुई है और सात हजार हेक्टेयर खेती की जमीन बंजर हो गई है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि सेक्टर की विकास दर 0.81 प्रतिशत रह गई है। जबकि 2011-12 में 4.80 प्रतिशत थी।
प्रदेश सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए सरकार ने जैविक खेती, क्लस्टर आधारित खेती, कांट्रेक्ट फार्मिंग, स्थानीय फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य, फल-सब्जी पर मंडी शुल्क समाप्त करने, चकबंदी समेत कई योजनाएं व निर्णय लिए हैं। पहाड़ों में कम हो रही खेती की जमीन सरकार सामने बड़ी चुनौती है। जंगली जानवरों, बंदरों से फसलों को नुकसान, सिंचाई सुविधा के अभाव से किसान खेती छोड़ रहे हैं।
कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य गठन से अब तक 7704 हेक्टेयर खेती की जमीन बंजर हो गई है। करीब 24 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि कम हुई है। खास बात ये भी है कि विकास योजनाओं के लिए भी सरकार को जमीन जुटानी पड़ रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में 24985 हेक्टेयर कृषि भूमि कम हुई है। इसमें 17281 हेक्टेयर भूमि का अन्य उपयोग हो रहा है।
ऊधम सिंह नगर में 56.4212 हेक्टेयर, नैनीताल में 2144 हेक्टेयर और हरिद्वार में 1204 हेक्टेयर कृषि भूमि को विभिन्न योजनाओं के लिए दिया जाना है। 2011 में नई कृषि नीति के लिए किए गए अध्ययन से यह बात सामने आई है कि प्रति वर्ष 2000 हेक्टेयर भूमि कृषि के अलावा अन्य मामलों के लिए इस्तेमाल हो रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में बंजर भूमि बढ़ रही है और खेती की जमीन का तेजी से भूक्षरण हो रहा है।
जैविक और एरोमा खेती पर दारोमदार
उत्तराखंड को जैविक राज्य बनाने की दिशा में सरकार काम कर रही है। परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत प्रदेश के सभी जनपदों में अलग-अलग फसलों के 3900 जैविक क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं। वहीं, बंजर भूमि पर किसानों को एरोमा खेती के लिए सरकार प्रोत्साहित कर रही है। सरकार का मानना है कि जैविक खेती से किसानों को उत्पाद के अच्छे दाम मिलेंगे।
किसानों की आय बढ़ाने का सरकार ने संकल्प लिया है। इस दिशा में पिछले तीन सालों में सरकार ने खेती किसानी को बढ़ावा देने के लिए 80 से अधिक महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं। परंपरागत फसलों का किसानों को उचित मूल्य देने के लिए सरकार ने पहली बार एमएसपी तय की है। मंडी समितियों के माध्यम से सरकार सीधे किसानों से उत्पाद खरीद रही है। - सुबोध उनियाल, कृषि मंत्री
बेरोजगारी दर में भारी इजाफा, सात लाख से अधिक युवा हैं पंजीकृत
रोजगार के मोर्चे पर सरकार को पिछले तीन सालोें में खास सफलता नहीं मिल पाई है। प्रदेश में सबसे अधिक रोजगार की संभावना कृषि और पर्यटन क्षेत्र में है। यही दोनों सेक्टर परफार्म करते हुए नहीं दिख रहे हैं।
बेरोजगारी के बेलगाम होने को देखते हुए प्रदेश सरकार ने वर्तमान वित्तीय वर्ष को रोजगार वर्ष घोषित किया था। निजी क्षेत्र में पूंजी निवेश बढ़ाने और सरकारी क्षेत्र में अधिक रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया। सरकारी क्षेत्र में रोजगार फाइलों में ज्यादा उलझ कर रह गया। सरकार अभी तक करीब 28 हजार पदों को भरने की प्रक्रिया ही शुरू कर पाई है। कुल 56 हजार पदों के खाली होने का आकलन है। इसके अलावा निजी क्षेत्र में निवेश से भी प्रदेश सरकार का अनुमान है कि रोजगार पनपेगा।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की ओर 2019 मार्च तक किए गए सर्वे से यह साफ हुुआ कि प्रदेश में बेरोजगारी दर 4.2 है। 2003-04 में यह दर मात्र 2.1 प्रतिशत थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि प्रदेश में किसी न किसी तरह के रोजगार में लगे लोगों की संख्या (वर्क पार्टिसिपेशन) करीब 45 प्रतिशत है। प्रदेश के सेवायोजन कार्यालयों में सात लाख से अधिक युवाओं ने पंजीकरण कराया हुआ है। प्रदेश सरकार की ओर से जारी की गई आर्थिक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 2019-20 में 86 हजार युवाओं ने पंजीकरण कराया।
मुसीबत ये है कि प्रदेश में कृषि सेक्टर में सबसे अधिक रोजगार की संभावना है। पिछले तीन सालों से यही सेक्टर परफार्म नहीं कर पा रहा है। कृषि में विकास दर मात्र 0.81 प्रतिशत रह गई है। इसी तरह पर्यटन में भी प्रदेश सरकार को रोजगार बढ़ाने में खास सफलता नहीं मिल पाई है।
कहां कितना मिल रहा है रोजगार
सेक्टर उत्तराखंड
कृषि 5.98
उद्योग 30.85
सेवा क्षेत्र 63.18
उद्यमियों के लिए रेड कारपेट, निवेश को धरातल पर उतारने की चुनौती
उत्तराखंड के औद्योगिक विकास के लिए सरकार ने नए उद्योगों के लिए रेड कारपेट बिछाई है, लेकिन जमीन के अभाव में निवेश को धरातल पर उतारने की सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। डेढ़ साल के भीतर इन्वेस्टर्स समिट के 18 प्रतिशत निवेश प्रस्ताव पर काम शुरू हुआ है।
सरकार ने पिछले तीन सालों के भीतर निवेश को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक नीतियों में बदलाव व अलग-अलग सेक्टर में 15 नई नीतियां बनाई है। उद्यमियों के लिए उत्तराखंड में निवेश को आसान करने के साथ ही सरकार की तरफ से कई तरह की सहूलियत और रियायतें भी दी गई है।
वर्ष 2018 में सरकार ने पहली बार इन्वेस्टर्स समिट के माध्यम से देश दुनिया के उद्यमियों से 1.24 लाख करोड़ के 673 निवेश प्रस्तावों पर एमओयू किया। दिसंबर 2019 तक सरकार ने 22 हजार करोड़ के 430 से अधिक प्रस्तावों को धरातल पर उतारने का काम शुरू किया है। इस निवेश से 51 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है।
जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का 36 प्रतिशत योगदान
राज्य के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में सेकेंडरी सेक्टर का योगदान वर्ष 1999-2000 में 19.2 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2018-19 में लगभग 49 प्रतिशत हो गया है। इसमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का योगदान 36 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट है कि राज्य गठन के बाद औद्योगिक विकास में तेजी आई है। राज्य की जीडीपी में इस सेक्टर का योगदान बढ़ा है। प्रदेश सरकार ने वर्ष 2017 से लेकर दिसंबर 2019 तक सिंगल विंडो के माध्यम से 2785 एमएसएमई और बड़े उद्योगों को मंजूरी दी है। इसमें 16734 करोड़ का निवेश हुआ है।
बंद पड़े उद्योगों से वापस ली जाएगी जमीन
इन्वेस्टर्स समिट के माध्यम से सरकार को 1.24 लाख करोड़ रुपये निवेश के प्रस्ताव मिले हैं। निवेशकों की हरिद्वार, देहरादून व ऊधमसिंह नगर जनपदों में उद्योग लगाने के लिए जमीन की मांग है, लेकिन औद्योगिक क्षेत्रों में नए उद्योगों को देने के लिए जमीन नहीं है।
बंद पड़े उद्योगों के जमीन समर्पित करने से नए निवेशकों को जमीन मिल सकेगी। हालांकि सरकार ने जमींदारी भूमि विनाश अधिनियम में संशोधन कर उद्योगों के लिए 12.5 एकड़ से अधिक जमीन खरीदने की व्यवस्था की है। लेकिन निवेशकों को यह पता नहीं है कि प्रदेश के किस क्षेत्र में उद्योग लगाने के लिए जमीन मिलेगी।
प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन का ब्योरा
औद्योगिक क्षेत्र जमीन (एकड़ में)
हरिद्वार 1695
पंतनगर 3294
सेलाकुई 50
कोटद्वार 100
आईटी पार्क 67
सितारगंज 1093
सितारगंज फेज-दो 1763
पलायन रोकने करने होंगे कई इंतजाम
तीन साल के दौरान पहली बार किसी सरकार ने पलायन को लेकर सिर्फ चिंता और बातें नहीं की। पलायन की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए पहली बार सरकार के स्तर पर एक पलायन आयोग का गठन हुआ। आयोग ने वर्ष 2018 में 7950 ग्राम पंचायतों के सर्वेक्षण की अंतरिम रिपोर्ट दी।
उसके बाद उसकी दो रिपोर्ट आई। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने खुलासा किया कि पिछले एक दशक में 6338 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 लोगों ने अस्थाई रूप से पलायन किया। इसी अवधि में 3946 ग्राम पंचायतों के 1,18981 लोगों से स्थायी रूप से घर बार छोड़ दिया।
आयोग ने पलायन के कारणों की पड़ताल की। आयोग ने बताया कि 50 प्रतिशत लोगों ने रोजगार और आजीविका की खोज में पलायन किया। जबकि 15 फीसदी ने पलायन शिक्षा एवं आठ फीसदी इलाज की सुविधा की कमी के कारण शहरों और नगरों में जा बसे।
रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि पलायन करने वाली 42 फीसदी आबादी 26 से 35 वर्ष की रही। पलायन करने की एक बड़ी वजह जंगली जानवर भी माने गए। घर बार छोड़ने वाले 70 फीसदी लोगों ने राज्य के भीतर ही पलायन किया। अकेले पलायन करने वालों की संख्या सबसे अधिक आंकी गई।