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सामने आया उत्तराखंड के कांग्रेसी CM का बड़ा घोटाला!

Mon, 18 Jan 2016 01:18 PM IST
गौरव मिश्रा/ अमर उजाला, देहरादून
गौरव मिश्रा/ अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 18 Jan 2016 01:18 PM IST
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uttarakhand government scam on smart city.

केदारनाथ आपदा राहत कार्यों में घालमेल के आरोपों के बाद अब उत्तराखंड सरकार का एक और घोटाला सामने आया है। इस बार का मामला स्मार्ट सिटी से जुड़ा हुआ है।

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दो महीने, ताबड़तोड़ चार तारीखें और चाय बागान प्रकरण में 39 साल से चल रहे मुकदमे में एडीएम (प्रशासन) कोर्ट से सरकार के खिलाफ फैसला।

यही नहीं, चाय बागान प्रकरण में चौंकाने वाला यह तथ्य भी सामने आया है कि सरकार ने इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया।

जिलाधिकारी रविनाथ रमन ने इस संबंध में अगले कदम के लिए सरकार से परामर्श मांगा, लेकिन नकारात्मक जवाब मिला। इसके आगे सब जानते हैं कि 31 अक्तूबर 2015 को उत्तराखंड कैबिनेट ने स्मार्ट सिटी के लिए डीटीसी इंडिया लिमिटेड से भूमि खरीदने के फैसले पर मुहर लगा दी थी।

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आ‌खिर क्यों कोर्ट नहीं गई सरकार?

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19 अक्तूबर 2015 को अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) प्रताप शाह की कोर्ट ने 39 वर्ष पुराने मामले में चाय बागान कंपनी डीटीसी इंडिया लिमिटेड के पक्ष में फैसला सुनाया।

अप्रैल में भी इसी एडीएम कोर्ट ने कंपनी को सीलिंग संबंधी नोटिस भेजा। नोटिस में साफ था कि डीटीसी कंपनी की अतिरिक्त भूमि सीलिंग अधिनियम के तहत सरकार में शामिल कर दी जाए।

सरकार तब तक मजबूती से कोर्ट में खड़ी थी। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि चार महीने में सरकार की सोच बदल गई? सितंबर माह से 19 अक्तूबर तक जल्द-जल्द 11 तारीखें लगीं।

19 अक्तूबर को एडीएम (प्रशासन) प्रताप शाह की कोर्ट ने कंपनी की भूमि पर सरकार के दावे को समाप्त कर दिया और 31 अक्तूबर को उत्तराखंड कैबिनेट ने स्मार्ट सिटी के लिए इस कंपनी से भूमि खरीदने पर मुहर लगा दी।

लाख टके का सवाल है कि इस फैसले के बाद सरकार बड़ी अदालत नहीं गई? मंडलायुक्त कोर्ट या राजस्व परिषद (रेवेन्यू बोर्ड) तो सरकार जा ही सकती थी। जिलाधिकारी के परामर्श का उत्तर ना देना और ऊंची अदालत का रुख ना करना आखिर क्या संकेत देता है?

वर्तमान सरकार के फैसलों पर उठे कई सवाल

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सरकार बनाम चाय बागान के मामले में वाद का स्वरूप ऐसा था जो वर्तमान सरकार के फैसलों पर कई सवाल उठाता है।

पहली बात तो यह है कि 39 साल चले इस मुकदमे में चाय बागान कंपनी से सीलिंग कानून के तहत सरकार को जमीन अधिग्रहित करनी थी। इस मुकदमे का मुख्य मुद्दा सीलिंग कानून के तहत सीमित भूमि को छोड़कर सारी जमीन सरकार द्वारा अधिग्रहित करने की ही थी।

विभिन्न न्यायालयों में जो भी निर्णय या जांच के उपरांत जो भी बात सामने आई, उनसे यह स्पष्ट हुआ कि परगनाधिकारी से लेकर गढ़वाल मंडलायुक्त तक ने अपने फैसलों में चाय बागान की अतिरिक्त भूमि को अधिग्रहित करने की सिफारिश की थी, फिर खिलाफ फैसला होने के बाद अचानक सरकार का नजरिया क्यों बदल गया?

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यह है मामला

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आरकेडिया-हरबंसवाला चाय बागान का स्वामित्व डीटीसी कंपनी के पास रहा है। साल 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने राजे-रजवाड़ों व जमींदारों की व्यवस्था को समाप्त करने के लिए कड़े कानून बनाए।

साल 1952 में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम को सख्त बनाया गया। साल 1973 से चाय कंपनी को नोटिस देने की प्रक्रिया शुरू हुई। उसके बाद विभिन्न न्यायालयों (राजस्व व न्यायिक) में तकरीबन 39 वर्ष सरकार बनाम कंपनी का मामला चला।

इस केस का निस्तारण एडीएम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर किया है। मामला चाय बागान के पक्ष में जाने के बाद प्रकरण विधिक राय के लिए न्याय विभाग को भेजा गया था। जिसमें न्याय विभाग ने उच्च अदालत में नहीं जाने का परामर्श दिया।
- रविनाथ रमन, जिलाधिकारी देहरादून

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