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समूह 'ग' के पदों को लेकर उत्तराखंड सरकार की पेशानी पर बल
Fri, 28 Dec 2018 11:52 AM IST
अलका त्यागी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: अलका त्यागी
Updated Fri, 28 Dec 2018 11:52 AM IST
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trivendra singh rawat
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प्रदेश में समूह ग पदों पर प्रदेश के अभ्यर्थियों का एकाधिकार खत्म होने की आशंका से सरकार की पेशानी पर बल पड़ गए हैं। उच्च न्यायालय का फैसला लागू होने के बाद समूह ग पदों की भर्ती प्रक्रिया में राज्य निवासी युवाओं का एकाधिकार खत्म हो जाएगा और देश के किसी भी राज्य का अभ्यर्थी इन पदों के लिए आवेदन कर सकेगा। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने शासन से मार्गदर्शन मांगा है।
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उच्च न्यायालय में एक याचिका पर एकलपीठ के आए फैसले के खिलाफ उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग अपील में गया था। खंडपीठ ने एकल पीठ के रोजगार कार्यालयों में पंजीकरण की शर्त को हटाने के फैसले को सही माना। अब आयोग चाहकर भी उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में नहीं जा सकता, क्योंकि समूह ग के पदों की भर्ती के लिए अनिवार्य/ वांछनीय अर्हता नियमावली, 2010 प्रदेश सरकार ने जारी की है। ऐसे में मामले पर अगला कदम राज्य सरकार को ही तय करना है।
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उधर, आयोग पर अब यह दबाव है कि वह जो भी भर्ती प्रक्रिया करेगा, न्यायालय के फैसले के आलोक में वह रोजगार कार्यालय में पंजीकरण की पात्रता की शर्त नहीं लगाएगा। आयोग को 800 से अधिक पदों पर भर्ती प्रक्रिया आरंभ करनी है। यही वजह है कि आयोग ने शासन से न्यायालय के फैसले के आलोक में मार्गदर्शन मांगा है। आयोग के सचिव संतोष बड़ोनी ने इसकी पुष्टि की है।
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सरकार को सता रहा युवाओं की नाराजगी का डर
न्यायालय के फैसले से सरकार और शासन में खासी खलबली है। सरकार राज्य के युवाओं की नाराजगी को लेकर चिंतित है। संवैधानिक तौर पर न्यायालय का फैसले को वह बेशक सही मान रही है, लेकिन फैसला लागू होने के बाद उसे लाखों पंजीकृत बेरोजगारों की एक अहम सुविधा के छिन जाने के खतरा सता रहा है। इससे उसे उनकी नाराजगी का भय है। यही वजह है कि शासन स्तर पर कोई न कोई रास्ता निकालने के प्रयास तेज हो गए हैं। फिलहाल कार्मिक विभाग ने न्याय विभाग से परामर्श मांगा है। न्यायिक परामर्श मिलने के बाद यह प्रकरण प्रदेश मंत्रिमंडल के सामने प्रस्तुत भी किया जा सकता है।
2014 में लगी थी पंजीकरण की शर्त
न्यायालय का फैसला आने के बाद 10 फरवरी 2014 का सरकार का शासनादेश भी निरस्त हो गया है। इसी शासनादेश में समूह ग के सीधी भर्ती के पदों पर भर्ती के लिए उन्हीं उम्मीदवार को पात्र माना गया, जिनका नाम उत्तराखंड राज्य के किसी सेवायोजन कार्यालय में पंजीकृत है। सरकार ने सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकरण की शर्त लगाकर समूह ग के सीधी भर्ती के पदों को एक तरह से राज्य के उन उम्मीदवारों के लिए आरक्षित कर दिया, जो राज्य के मूल निवासी हैं या स्थायी तौर पर निवास कर रहे हैं। दरअसल, राज्य के सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकरण की पात्रता केवल स्थायी निवासी और मूल निवासी अभ्यर्थी के लिए ही है। लेकिन न्यायालय ने सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकरण की शर्त को समानता के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए इसे खारिज कर दिया है।
उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने शासन का मार्गदर्शन मांगा है। इस प्रकरण को लेकर सरकार गंभीर है। न्याय विभाग से परामर्श मांगा गया है। हमें आशा है कि कोई न कोई सकारात्मक हल निकाल लिया जाएगा।
-राधा रतूड़ी, अपर मुख्य सचिव, कार्मिक
न्यायालय के फैसले के आलोक में आयोग अब जो भी भर्ती प्रक्रिया करेगा, उसमें रोजगार कार्यालय में पंजीकरण की शर्त शामिल नहीं होगी। आयोग को पदों पर भर्ती प्रक्रिया आरंभ करनी है। इसलिए फैसले के संबंध में शासन से मार्गदर्शन मांगा गया है।
-संतोष बड़ोनी, सचिव, उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग