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राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कबूतरी देवी नहीं रहीं, आइए जानते हैं संघर्षों से भरा उनका जीवन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 07 Jul 2018 06:31 PM IST
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कबूतरी देवी (फाइल फोटो)
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राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कबूतरी देवी का शनिवार को निधन हो गया। कबूतरी देवी अपनी बेटी के साथ पिथौरागढ़ में रह रही थीं।
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कबूतरी देवी ने पर्वतीय लोक संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया था। उत्तराखंड की तीजनबाई कही जाने वाली कबूतरी देवी पिथौरागढ़ के क्वीतड़ ब्लॉक मूनाकोट की रहने वाली थीं। उन्होंने पहली बार उत्तराखंड के लोकगीतों को आकाशवाणी और प्रतिष्ठित मंचों के माध्यम से प्रचारित किया था।
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उस वक्त कोई महिला आकाशवाणी के लिए नहीं गाती थीं। 70 के दशक में उन्होंने रेडियो जगत में अपने लोक गीतों को नई पहचान दिलाई थी। कबूतरी देवी ने आकाशवाणी के लिए करीब 100 से अधिक गीत गाए। जीवन के 20 साल गरीबी में बिताने के बाद 2002 से उनकी प्रतिभा को सम्मान मिलना शुरू हुआ।
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उन्हें कई सम्मान मिले। उत्तराखंड के संस्कृति विभाग ने उन्हें पेंशन देने का भी फैसला किया।
एक नाम कुमाऊं कोकिला भी
kabootri devi
उत्तराखंड की लोक कलाओं, रीति-रिवाजों को संजोने में लोक गायकों और लोक कलाकारों का बड़ा योगदान रहा है। इन्हीं में एक नाम कुमाऊं कोकिला कबूतरी देवी का भी है। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त कुमाऊं कोकिला की खासियत यह थी कि वह गायन में कभी भी वाद्य यंत्रों की मोहताज नहीं रहीं। उनके असमय चले जाने से हर कोई दुखी है। कबूतरी देवी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी हृदयस्पर्शी आवाज की खनक हर जगह मौजूद रहेगी। सोर घाटी के लोक पारंपरिक गीतों की धुन बनाकर उन्मुक्त कंठ से गाना कबूतरी जी के जीवन की महानतम उपलब्धि रही। उनकी सुर लहरी में पिथौरागढ़ जिले समेत समूचे कुमाऊं क्षेत्र के पारंपरिक आख्यान निहित हैं।
राजकीय महाविद्यालय गरुड़ के असिस्टेंट प्रो. हेम चंद्र दुबे उत्तर कहते हैं कि कबूतरी देवी प्रमुख विधाओं में मंगल गीत, ऋतु रैण, पहाड़ के प्रवासी के दर्द, कृषि गीत, पर्वतीय पर्यावरण, पर्वतीय सौंदर्य की अभिव्यक्ति, भगनौल न्यौली जागर, घनेली झोड़ा और चांचरी प्रमुख रूप से गातीं थीं। ऋतरैण में जो भागि जियलो गोरी नौ ऋतु सुणलो...यानि जो भाग्यवान जीएगा वह नौ ऋतुओं को सुनेगा, फूल देई छम्मा देई भर भकार दैणी द्वार...यानि फूल तुम्हारी दहलीज पर बिखर गए हैं तुम्हारे घर में धन-धान्य भरा रहे समेत कई अन्य गीत गातीं थीं। उनके गायन शैली में एक मार्मिक स्तर था। जब वो गाती थीं तो लोग अवाक रह जाते थे। लोक गायक आनंद कोरंगा ने पहाड़ को ठंडो पाणी...और आज पनी झाऊं -झाऊं... गाकर कबूतरी देवी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
उत्तरायणी मेला समिति ने कुमाऊं कोकिला कबूतरी देवी को कभी भी मंच पर आमंत्रित नहीं किया, लेकिन मेले को लेकर वह खासी उत्साहित रहतीं थीं। मंच न मिलने के बावजूद वह वर्ष 1980 और 90 के दशक में चौक बाजार में बैर, भगनौल गाने वालों के साथ अलग-अलग ऋतुओं में गाए जाने वाले ऋतु रैण और अन्य गीतों के जरिये महफिल जमा देतीं थीं। सामाजिक कार्यकर्ता भुवन कांडपाल बताते हैं कि लोग उनके गायन की शुरुआत होते ही वहां जमा हो जाते थे। पढ़ी-लिखी नहीं होने के बावजूद वह विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं।
राजकीय महाविद्यालय गरुड़ के असिस्टेंट प्रो. हेम चंद्र दुबे उत्तर कहते हैं कि कबूतरी देवी प्रमुख विधाओं में मंगल गीत, ऋतु रैण, पहाड़ के प्रवासी के दर्द, कृषि गीत, पर्वतीय पर्यावरण, पर्वतीय सौंदर्य की अभिव्यक्ति, भगनौल न्यौली जागर, घनेली झोड़ा और चांचरी प्रमुख रूप से गातीं थीं। ऋतरैण में जो भागि जियलो गोरी नौ ऋतु सुणलो...यानि जो भाग्यवान जीएगा वह नौ ऋतुओं को सुनेगा, फूल देई छम्मा देई भर भकार दैणी द्वार...यानि फूल तुम्हारी दहलीज पर बिखर गए हैं तुम्हारे घर में धन-धान्य भरा रहे समेत कई अन्य गीत गातीं थीं। उनके गायन शैली में एक मार्मिक स्तर था। जब वो गाती थीं तो लोग अवाक रह जाते थे। लोक गायक आनंद कोरंगा ने पहाड़ को ठंडो पाणी...और आज पनी झाऊं -झाऊं... गाकर कबूतरी देवी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
उत्तरायणी मेला समिति ने कुमाऊं कोकिला कबूतरी देवी को कभी भी मंच पर आमंत्रित नहीं किया, लेकिन मेले को लेकर वह खासी उत्साहित रहतीं थीं। मंच न मिलने के बावजूद वह वर्ष 1980 और 90 के दशक में चौक बाजार में बैर, भगनौल गाने वालों के साथ अलग-अलग ऋतुओं में गाए जाने वाले ऋतु रैण और अन्य गीतों के जरिये महफिल जमा देतीं थीं। सामाजिक कार्यकर्ता भुवन कांडपाल बताते हैं कि लोग उनके गायन की शुरुआत होते ही वहां जमा हो जाते थे। पढ़ी-लिखी नहीं होने के बावजूद वह विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं।