उत्तराखंड चुनाव 2022: आप ने छेड़ा नए जिलों का राग तो भड़की सियासत की आग, पहले हरीश रावत ने भी किया था एलान
पिछले दिनों वरिष्ठ कांग्रेस नेता पूर्व सीएम हरीश रावत ने प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने पर दो साल में चार नए जिले बनाने का एलान किया और अब काशीपुर में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनने पर आधा दर्जन नए जिले बनाने की घोषणा करके इस मुद्दे को और अधिक हवा दे दी।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दलों ने उत्तराखंड में नए जिलों के गठन का राग छेड़ दिया है। जानकारों इसे चुनावी राग की मिसाल दे रहे हैं। पूर्व भाजपा सरकार में डीडीहाट, यमुनोत्री, कोटद्वार और रानीखेत को जिला बनाने की घोषणा हो चुकी है, लेकिन सत्ता पर काबिज रही भाजपा और कांग्रेस की सरकारों में नए जिलों के गठन का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
पिछले दिनों वरिष्ठ कांग्रेस नेता पूर्व सीएम हरीश रावत ने प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने पर दो साल में चार नए जिले बनाने का एलान किया और अब काशीपुर में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनने पर आधा दर्जन नए जिले बनाने की घोषणा करके इस मुद्दे को और अधिक हवा दे दी।
Uttarakhand Election 2022: अरविंद केजरीवाल ने चौथी गारंटी से और पुख्ता कर दी चुनावी बिसात
21 साल में एक जिला भी नहीं बना
राज्य गठन के बाद से ही राजनीतिक दल नए जिले बनाने की घोषणाएं करते रहे हैं। लेकिन 21 साल बाद भी नए जिलों के गठन की पहेली सुलझ नहीं पाई है। वर्तमान में उत्तराखंड दो मंडल, 13, जिले, 110 तहसीलें और 18 उप तहसीलें हैं। वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने 15 अगस्त को कोटद्वार, डीडीहाट, यमुनोत्री और रानीखेत को जिला बनाने की घोषणा की थी। बाद में वह सीएम की कुर्सी से हट गए। उनकी जगह मुख्यमंत्री बने मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी (सेनि) ने 2012 में विधानसभा चुनाव में जाने से पहले नए जिलों के गठन का शासनादेश जारी करा दिया।
चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। कांग्रेस सरकार की बागडोर विजय बहुगुणा के हाथों में आ गई। चुनाव में गरमाने वाला नए जिलों का मुद्दा एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया। प्रदेश में अलग-अलग स्थानों से नए जिलों के गठन की मांग उठने लगी तो राजस्व परिषद के अध्यक्ष की अध्यक्षता में जिला पुनर्गठन आयोग बना दिया गया। आयोग ने नए जिलों के प्रस्ताव मांगें। प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि एक जिला बनाने और उसके लिए प्रशासनिक तामझाम जुटाने के लिए 1000 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। यह खर्च बढ़ भी सकता है। जिलों में अफसरों और कर्मचारियों की फौज के साथ ही उनके लिए दफ्तर और आवास बनाने पर भारी भरकम धनराशि खर्च होगी।
160 से अधिक आवेदन, 35 जिले बनाने की मांग
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, जिला पुनर्गठन आयोग के पास 160 से अधिक आवेदन पहुंचे। नए जिलों की मांग चार से बढ़कर 35 हो गई। आयोग को पहुंचे आवेदनों में प्रमुख रूप से थराली, कोटद्वार, थलीसैंण, खटीमा, काशीपुर, घनसाली, रामनगर, पछवादून, यमुनोत्री, पुरोला, रुड़की, रानीखेत, पुरोला, हल्द्वानी, ऋषिकेश आदि को जिला बनाने की मांग उठी ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करने के बाद से गैरसैंण को भी जिला बनाए जाने की मांग ने जोर पकड़ा है। पूर्व कांग्रेस सरकार में भी तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल गैरसैंण को जिला बनाए जाने पर खासा जोर देते रहे। त्रिवेंद्र सरकार पर भी गैरसैंण को जिला बनाने का दबाव रहा। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, पूर्व भाजपा सरकार में चार नए जिलों के गठन के लिए आबादी के मानकों को ढीला कर दिया गया था। उत्तरप्रदेश के समय में 15 लाख की आबादी पर एक जिला बनाने का मानक था। इसे घटाकर दो लाख कर दिया गया। इसी तरह क्षेत्रफल के मानकों को कम किया गया।
ठंडे बस्ते में चार जिलों की घोषणा
कोटद्वार: करीब साढ़े तीन लाख की आबादी और 142578 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर जिला बनाने का प्रस्ताव था। इसमें सतपुली, धुमाकोट, यमकेश्वर और लैंसडौन को शामिल किया जाना था।
यमुनोत्री: 283898 हेक्टेयर क्षेत्रफल करीब डेढ़ लाख की आबादी पर यमुनोत्री जिला बनाने का प्रस्ताव था, जिसमें बड़कोट, पुरोला और मोरी को शामिल किया जाना था।
रानीखेत: 139686 हेक्टेयर क्षेत्रफल और करीब साढ़े तीन लाख की आबादी पर जिला बनना था, जिसमें रानीखेत, सल्ट भिकियासैंण, द्वारहाट, चौखुटिया और स्याल्दे शामिल होने थे।
डीडीहाट: 81304 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर करीब पौने दो लाख आबादी पर जिला बनाया जाना था। इसमें डीडीहाट, धारचूला, मुनस्यारी, थल, बंगापानी को शामिल करने का प्रस्ताव था।
उत्तराखंड में नए जिलों के गठन का कोई औचित्य नहीं है। सरकारों को प्रशासनिक इकाइयों की मजबूती पर काम करना चाहिए। सुशासन पर फोकस करेंगे तो नए जिलों की आवश्यकता महसूस नहीं होगी।
- अनूप नौटियाल, सामाजिक कार्यकर्ता
राजनीतिक दलों की घोषणा में विरोधाभास है। एक ओर वे नौकरशाही के हावी हो जाने का रोना रोते हैं, दूसरी ओर वे नए जिले बनाकर अफसरों की नई फौज खड़ी करना चाहते हैं। उन्होंने कभी सोचा भी है कि खराब माली हालत का सामना कर रहे राज्य में नए जिले के गठन से कितना आर्थिक बोझ पड़ेगा?
- एसएस पांगती, पूर्व आईएएस अधिकारी
नए जिलों के गठन को लेकर सरकार के स्तर पर एक आयोग बनाया गया है। आयोग जिलों के प्रस्तावों पर विचार कर रहा है। आयोग की जो भी सिफारिश होगी तो सरकार उस पर अगली कार्रवाई करेगी।
- मदन कौशिक, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा
कोटद्वार : 60 के दशक से हो रही है कोटद्वार को जिला बनाने की मांग
15 विकासखंडों वाले पौड़ी जिले की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए 60 के दशक से कोटद्वार को जिला बनाने की मांग चली आ रही है। राज्य निर्माण के बाद कोटद्वार जिला निर्माण को लेकर मांग तेज हुई। 2009 में वसंत पंचमी मेले के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कोटद्वार जिला निर्माण के संकेत दिए। 15 अगस्त, 2011 को कोटद्वार समेत चार जिलों की घोषणा की गई। लेकिन, ये घोषणा आज तक धरातल पर नहीं उतर सकी। जिले की मांग को लेकर पहले नागरिक मंच ने कई महीनों तक आंदोलन किया। इसके बाद बार एसोसिएशन ने लंबे समय तक जिले की मांग को लेकर तहसील में धरना-प्रदर्शन कर जिला आंदोलन की अलख जगाए रखी। वर्ष 2017 के चुनाव में भाजपा की ओर से जिला बनाने के आश्वासन के बाद बार एसोसिएशन ने अपना आंदोलन समाप्त किया।
रुड़की: लंबे समय से है मांग पर किसी भी पार्टी के एजेंडे में नहीं
रुड़की को जिला बनाने की मांग लंबे समय से होती रही है। लेकिन किसी भी पार्टी ने इसे अपने एजेंडे के रूप में शामिल नहीं किया। आंदोलन की बात करें तो इस मुद्दे को लेकर गैरराजनीतिक लोकतांत्रिक जनमोर्चा का गठन हुआ। जिसमें उत्तराखंड क्रांति दल ने भी इस मुद्दे को लेकर मोर्चा का समर्थन किया। लेकिन हाल ही में इसे गठित करने वाले मोर्चा के संयोजक ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली है। हालांकि रुड़की जिला बनता है तो भौगोलिक स्थिति के मद्देनजर यह सैकड़ों गांवों के लिए विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। यूपी बॉर्डर से लगती सीमा पर स्थित खानपुर, नारसन, झबरेड़ा के लोगों को अपने जरूरी कामों के लिए हरिद्वार स्थित जिला मुख्यालय के चक्कर काटने पड़ते हैं। जबकि रुड़की जिला बनता है तो सैकड़ों गांवों के लिए यह केंद्र के रूप में मददगार साबित होगा। सभी जिले के बड़े अधिकारी नजदीक स्थल पर मिलेंगे तो लोगों की समस्याओं की सुनवाई और उनके निस्तारण में आसानी होगी। जहां तक रुड़की को जिला बनाने के पीछे आंदोलन की बात है तो यहां किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इसे अपने एजेंडे में शामिल नहीं किया।
यमुनोत्री : घोषणा होने के बाद भी नहीं बन पाया जिला
24 फरवरी 1960 को उत्तरकाशी जनपद का गठन किया गया था। तब क्षेत्र के समाजसेवी दौलतराम रंवाल्टा ने यमुना घाटी में जनपद का मुख्यालय बनाए जाने की बात रखी थी। रंवाल्टा जवाहर लाल नेहरू के करीबी थे। 15 अगस्त 2011 को तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेेश पोखरियाल ने चार नए जनपदों की घोषणा की थी, जिसमें यमुनोत्री जनपद भी शामिल था। लेकिन आज तक घोषित जनपद अस्तित्व में नहीं आ पाए हैं। घोषित जनपदों को अस्तित्व में लाए जाने के लिए स्थानीय निवासी लंबे समय से आंदोलित हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सकल चंद रावत कहते हैं कि यमुना घाटी को पृथक जनपद बनाने की मांग 1971 से की जा रही है। उस समय पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी उत्तरकाशी दौरे पर आई थीं।
डीडीहाट: जिले की मांग दशकों पुरानी
डीडीहाट जिले की मांग वर्ष 1960 से उठ रही है। वर्ष 2005 में भी जिले की मांग के लिए आंदोलन हुआ। क्षेत्रवासियों की मांग पर वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने डीडीहाट जिला बनाने की घोषणा की थी। डीडीहाट जिले में डीडीहाट, कनालीछीना, देवलथल, थल, तेजम, बंगापानी, धारचूला और मुनस्यारी तहसीलों को शामिल करने की योजना थी लेकिन जिला अस्तित्व में नहीं आ सका है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पूर्व तत्कालीन कांग्रेस सरकार से भी लोगों को डीडीहाट जिले के गठन की उम्मीद थी। उस समय तत्कालीन सीएम हरीश रावत ने डीडीहाट भ्रमण के दौरान डीडीहाट नगर पंचायत और नगर पालिका बनाने की घोषणा की थी, जबकि लोगों को डीडीहाट जिले की उम्मीद थी। एक माह पूर्व भी जिला बनाओ संघर्ष समिति ने आमरण अनशन किया था। पूर्व सीएम हरीश रावत ने सरकार बनने पर जिला गठन करने का आश्वासन देकर आंदोलन समाप्त कराया था।
रानीखेत : 1955 से उठ रही रानीखेत जिले की मांग
रानीखेत जिले की मांग 1955 से उठ रही है। रानीखेत को ब्रिटिश शासक ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाना चाहते थे। यहां नगर पालिका भी नहीं है। छावनी परिषद के जटिल कानूनों के चलते लोगों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। लोगों का कहना है कि जिला बनने से जहां रोजगार के द्वार खुलेंगे, वहीं पलायन भी रुकेगा। अच्छे शिक्षण संस्थान खुलेंगे। 2011 में जिले की घोषणा मात्र से ही नगर में 12 नए बैंक खुल गए थे। सल्ट, देघाट, भिकियासैंण सहित तमाम स्थानों से जिला मुख्यालय अल्मोड़ा की दूरी अत्यधिक है। ऐसे में यदि रानीखेत जिला बना तो इन तहसीलों को अत्यधिक सुविधा होगी।
काशीपुर : जिला बनने से खुलेगी विकास की राह
काशीपुर के जिला बनने से क्षेत्र में विकास की राह सुगम होगी। उन्नति के दरवाजे खुलेंगे और कई जन समस्याओं से छुटकारा मिलेगा। लोगों को 50 किलोमीटर दूर मुख्यालय नहीं जाना होगा। उद्योगों को फायदा होगा। आम लोगों के रोजगार में वृद्धि होगी और शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होंगी। काशीपुर ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से भी बहुत समृद्ध है। यहां द्रोण सागर है। मोटेश्वर महादेव मंदिर और चैती माता का मंदिर भी प्रसिद्ध है। जिला बनने से पर्यटन की राह सुगम होगी और विकास के दरवाजे खुलेंगे।
हमने तो नौ नए जिले पहले ही चुन लिए थे : हरीश
पूर्व सीएम हरीश रावत का कहना है कि कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2016 में गैरसैंण, रानीखेत, डीडीहाट, खटीमा, काशीपुर, कोटद्वार, यमुनोत्री, बीरोंखाल और रुड़की को जिला बनाने की कार्यवाही शुरू की थी। इसके लिए विधानसभा में सौ करोड़ रुपये का बजट पास कराने के साथ तहसीलें, उप तहसीलें और पटवारी हलके बनाने का काम भी शुरू कर दिया गया था। जो नए जिले बनाने की प्रारंभिक प्रक्रिया है। जिन जिलों के गठन की प्रक्रिया से पूर्व जिला पुनर्गठन आयोग बनाया गया था, जिसकी रिपोर्ट की संस्तुति के आधार पर हम आगे बढ़े थे। गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिहाज से जिला बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके साथ ही इसका नाम गढ़-कुमौं करने पर भी विचार किया जा रहा था। इसके अलावा नरेंद्रनगर को भी जिला बनाने की बात हुई थी, लेकिन इसका प्रस्ताव कुछ तकनीकी कारणों से अटक गया था। इसके साथ ही दो नई कमिश्नरी अल्मोड़ा और टिहरी बनाने का प्रस्ताव भी था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस यदि सत्ता में आती है तो हम इस काम को पुन: दो साल में पूरा करेंगे।