फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Uttarakhand Election 2022: independents played role of king maker, also have the power

Uttarakhand Election 2022: निर्दलियों का दम, किंग मेकर की भूमिका निभाई, सत्ता की मलाई भी खाई

Sat, 18 Dec 2021 01:05 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 18 Dec 2021 01:05 PM IST
सार

राज्य गठन से पहले उत्तरप्रदेश के दौर में 1951 से लेकर 1996 तक कुल 13 विधानसभा चुनाव हुए। इनमें से 1974, 1991 व 1996 को छोड़कर बाकी सभी चुनावों में निर्दलियों ने अपनी जीत का डंका बजाया।

विज्ञापन
Uttarakhand Election 2022: independents played role of king maker, also have the power
नेताजी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी का दौर रहा हो या उत्तराखंड राज्य का समय जब-जब विधानसभा के चुनाव आए, राजनीतिक दलों के दंगल में निर्दलियों ने भी खूब दम दिखाया। राज्य गठन के बाद जब भाजपा और कांग्रेस बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर हो गए तो इन्हीं निर्दलीय विधायकों ने किंग मेकर की भूमिका निभाई और सत्ता की मलाई भी खाई। 

विज्ञापन


राज्य गठन से पहले उत्तरप्रदेश के दौर में 1951 से लेकर 1996 तक कुल 13 विधानसभा चुनाव हुए। इनमें से 1974, 1991 व 1996 को छोड़कर बाकी सभी चुनावों में निर्दलियों ने अपनी जीत का डंका बजाया। राज्य में उत्तराखंड क्रांति दल की कमान संभाल रहे काशी सिंह ऐरी उन बिरले विधायकों में से हैं, जो अपने दमखम के बल पर एक से ज्यादा बार निर्दलीय चुनकर आए। 
विज्ञापन


Rahul Gandhi: अबकी बार भाजपा के अंदाज में वार, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे पर कांग्रेसी दिग्गजों ने चलाए तीर
विज्ञापन
विज्ञापन


पहाड़ की जनता ने पचास से सत्तर के दशक तक सबसे लोकप्रिय दल कांग्रेस के उम्मीदवार के स्थान पर उनके बीच सक्रिय रहने वाले आजाद प्रत्याशी को चुना। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रणेता पहाड़ के गांधी इंद्रमणि बडोनी देवप्रयाग से 1967 और 1977 में निर्दलीय चुनाव जीते। 1977 में जेपी आंदोलन के दौर में जब जनता पार्टी के सामने कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज चुनाव हार गए, ऐसे समय में लोकप्रियता के दम पर बड़ोनी आजाद प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीते। कांग्रेस, जनसंघ, जनता पार्टी, वामपंथी दलों के चुनावी दंगल में निर्दलीय प्रत्याशियों का जीत का यह सिलसिला उत्तराखंड राज्य गठन के बाद भी जारी रहा।

हर चुनाव में निर्दलियों ने दिखाया दमखम
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद चार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। हर विधानसभा चुनाव में निर्दलियों ने दम दिखाया। विधानसभा चुनावों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह तथ्य सामने आता है कि निर्दलियों ने हर चुनाव में 10 फीसदी से अधिक वोट हासिल किए। 2002 व  2017 के विधानसभा चुनाव में निर्दलियों का वोट प्रतिशत तीसरी बड़ी राजनीतिक ताकत रही बसपा से भी अधिक रहा।  2002 के चुनाव में निर्दलियों ने 16.30 फीसदी वोट हासिल किए जबकि 2007 के चुनाव में उनका वोट प्रतिशत 10.81 रहा। 2012 में निर्दलियों ने 12.34 प्रतिशत वोट हासिल किए जबकि 2017 में उन्हें 10.04 प्रतिशत वोट मिले।

किंग मेकर की भूमिका निभाई, सत्ता की मलाई भी खाई
विधानसभा चुनाव में निर्दलीय विधायकों ने किंग मेकर भूमिका भी निभाई। इसके बदले में उन्हें सत्ता के प्रसाद के तौर पर मंत्री की कुर्सी मिली। इसकी शुरुआत हुई 2007 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री जनरल बीसी खंडूड़ी को बहुमत का आंकड़ा साधना था। तब नंदप्रयाग से निर्दलीय चुनाव जीते राजेंद्र भंडारी भाजपा सरकार के समर्थन में आए। बदले में उन्हें कैबिनेट मंत्री की कुर्सी मिली। 

2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला निर्दलीय विधायकों के लिए वरदान साबित हुआ। भाजपा 31 विधायकों की संख्या पर अटक गई, जबकि कांग्रेस के 32 विधायक जीते। सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के निर्दलियों का समर्थन लेने के सिवाय कोई चारा नहीं था। चुनाव में तीन निर्दलीय विधायक चुने गए थे। एक बार फिर निर्दलीय किंग मेकर की भूमिका नजर आए। बदले में टिहरी से निर्दलीय चुनाव जीते दिनेश धनै, देवप्रयाग से मंत्री प्रसाद नैथानी, लालकुआं से हरीश्चंद्र दुर्गापाल को कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री की कुर्सी मिली।

खंडित जनादेश में निर्दलीय विधायकों की मौज

उत्तराखंड विधानसभा का चुनावी इतिहास गवाह है कि जब-जब खंडित जनादेश आया, निर्दलीय विधायकों की मौज आ गई। वरना 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 57 सीटों की प्रचंड जीत के साथ सत्ता में आई। इस चुनाव में धनौल्टी से निर्दलीय जीते प्रीतम सिंह पंवार और भीमताल से राम सिंह कैड़ा को कुछ खास हासिल नहीं हुआ। अंतत: दोनों विधायक भाजपा में शामिल हो गए। वर्ष 2002 में कांग्रेस को 36 सीटों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। उस चुनाव में भी तीन निर्दलीय विधायक चुने गए थे। लेकिन तब कांग्रेस बहुत ज्यादा दबाव में नहीं दिखी।

ये विधायक जीते निर्दलीय
1951 : जयेंद्र सिंह बिष्ट(टिहरी नार्थ), सत्य सिंह (देवप्रयाग), महाराज कुमार बालेंदु (टिहरी साउथ प्रतापनगर)
1957: घनश्याम (बदरीनाथ) व गुलाब सिंह(मसूरी)
1962: मुकंदी लाल (लैंसडौन), 
1967: इंद्रमणि बडोनी (देवप्रयाग), आर प्रसाद (एकेश्वर) एमजी गिरी(हरिद्वार) आर स्वरूप(देहरादून)
1977: इंद्रमणि बडोनी (देवप्रयाग)
1980: नरेंद्र सिंह भंडारी (पौड़ी), शिवानंद नौटियाल (कर्णप्रयाग), कुंवर सिंह नेगी (बदरीकेदार) और जसवंत सिंह बिष्ट (रानीखेत)
1985: काशी सिंह ऐरी (डीडीहाट)
1989: काशी सिंह ऐरी (डीडीहाट), करन चंद्र सिंह(काशीपुर), जसवंत सिंह(रानीखेत) रंजीत सिंह वर्मा (मसूरी)
1993: सुरेंद्र सिंह नेगी (लैंसडौन)

उत्तराखंड गठन के बाद चार विधानसभा चुनावों में निर्दलीय
2002: डॉ. शैलेंद्र मोहन सिंघल (जसपुर), गगन सिंह रजवार(धारचुला),  कुंवर प्रणव चैंपियन(लक्सर)
2007: यशपाल बेनाम (पौड़ी), राजेंद्र सिंह भंडारी (नंदप्रयाग), गगन सिंह रजवार (धारचूला)
2012: दिनेश धनै (टिहरी), मंत्री प्रसाद नैथानी (देवप्रयाग), हरीशचंद्र दुर्गापाल (लालकुआं), प्रीतम पंवार (यूकेडी)
2017: राम सिंह कैड़ा (भीमताल), प्रीतम सिंह पंवार (धनौल्टी)

विधानसभा चुनाव में निर्दलीयों का वोट प्रतिशत
विस चुनाव  -  प्रत्याशी  - जीते -  वोट प्रतिशत
2002  -   346   -      03   -      16.30
2007  - 240    -    03      -    10.81   
2012 -  261  -      03    -      12.34  
2017- 261   -      02     -     10.38

निर्दलीय चुनाव लड़ना आसान नहीं होता : प्रीतम पंवार
हरीश रावत सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे प्रीतम सिंह पंवार का मानना है कि निर्दलीय चुनाव जीतना आसान नहीं है। निर्दलीय प्रत्याशी को एक-एक वोट के लिए पसीना बहाना पड़ता है। उसका कोई कैडर वोट नहीं होता। पांच साल की तपस्या के बाद जब चुनाव आते हैं तो राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों से टक्कर लेना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। सियासी दल के प्रत्याशी के पास कैडर वोट होता है। संगठन का मजबूत नेटवर्क होता है। इसका लाभ दलों के प्रत्याशी को मिलता है, लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी को ये सारे संसाधन खुद अपने सामर्थ्य से जुटाने होते हैं। जनता के बीच रहना पड़ता है, उनके दुख सुख में साथ खड़े होना होता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed