उत्तराखंड चुनाव 2022: यशपाल आर्य की घर वापसी से होने वाले नफा-नुकसान का आकलन शुरू

विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 12 Oct 2021 11:38 AM IST

सार

Uttarakhand Election 2022: कांग्रेस ने यशपाल आर्य को पार्टी में शामिल करवाकर भाजपा को झटका तो दिया ही है, साथ ही ऊधमसिंह नगर के तराई में पुन: अपनी पकड़ को मजबूत करने की पटकथा भी लिख दी है।
कांग्रेस में शामिल हुए यशपाल आर्य
कांग्रेस में शामिल हुए यशपाल आर्य - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार

वर्ष 2017 में कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामने वाले यशपाल आर्य की बेटे संजीव आर्य के साथ घर वापसी से कांग्रेस को होने वाले नफा-नुकसान को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। राज्य की राजनीति में बड़े दलित नेता के तौर पर पहचान रखने वाले आर्य 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचा सकते हैं, इस बात को लेकर तमाम सियासी कयास लगाए जा रहे हैं। 
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कांग्रेस ने यशपाल आर्य को पार्टी में शामिल करवाकर भाजपा को झटका तो दिया ही है, साथ ही ऊधमसिंह नगर के तराई में पुन: अपनी पकड़ को मजबूत करने की पटकथा भी लिख दी है। अभी जिले की नौ में से आठ सीटें भाजपा के कब्जे में हैं। इनमें से एक सीट खटीमा की भी है, जिसका मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी सीट से एक बार यशपाल आर्य भी विधायक रह चुके हैं। भाजपा ने जहां इन सीटों पर पकड़ मजबूत बनाने के लिए राज्य में मुख्यमंत्री और केंद्र में केंद्रीय राज्य मंत्री देकर बड़ा सियासी दांव खेला था। वहीं कांग्रेस ने यशपाल के रूप में उसके इन सियासी दावों की बड़ी काट ढूंढ निकाली है।


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यशपाल राज्य की राजनीति में बड़ा दलित चेहरा होने के साथ तराई की आधा दर्जन से अधिक सीटों पर प्रभाव रखते हैं। यशपाल के बहाने कांग्रेस ने प्रदेश ही नहीं देश में भी दलित वोटों में सेंध लगाने का बड़ा दांव खेला है। अभी कुछ दिन पहले ही कांग्रेस ने पंजाब में दलित चेहरे चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी है। इसी दौरान पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का बड़ा बयान आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह राज्य की सत्ता में किसी दलित को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे देखना चाहते हैं।

हरीश के इस बयान के तब और अब भी तमाम सियासी मायने टटोले जा रहे हैं। लेकिन कहीं न कहीं इसे क्षेत्रीय और जातीय समीकरण साधने के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस पार्टी के पास राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा के बाद अब यशपाल के रूप में दूसरा बड़ा दलित चेहरा मिल गया है। कांग्रेस ने 2022 के चुनाव में राज्य के 19 प्रतिशत दलित वोटों को रिझाने की पटकथा तो लिख दी है, अब देखने वाली बात यह होगी कि आर्य पार्टी को तराई के साथ राज्य में कितना तार पाते हैं। 

क्या बागियों की वापसी का सूत्रधार बनेंगे यशपाल

..तो क्या यशपाल के साथ कांग्रेस के बागियों की वापसी का रास्ता भी खुल गया है। यशपाल आर्य की घर वापसी के साथ ही सियासी फिजाओं में यह सवाल भी तैरने लगा है। सोमवार को ही उन्होंने अपने बेटे और नैनीताल से विधायक संजीव आर्य और पूर्व में कांग्रेस से जुड़े रहे वरिष्ठ सिख नेता हरेंद्र सिंह लाडी के साथ पुन: कांग्रेस का दामन थामा। चर्चा तीन विधायकों के पार्टी में शामिल होने की थी। इनमें बागी उमेश शर्मा काऊ का नाम भी शामिल था। काऊ की सोमवार सुबह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे राहुल गांधी से मुलाकात भी हो गई थी। लेकिन ऐन वक्त पर उनकी कांग्रेस पार्टी में ज्वाइनिंग टल गई। लेकिन भाजपा के लिए अभी खतरा टला नहीं है। यशपाल बागियों की पुन: वापसी का बड़ा सूत्रधार बन सकते हैं, इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों में ही चर्चाओं का दौर भी शुरू हो चुका है। 

कहीं किसानों का विरोध तो नहीं पार्टी बदलने का कारण 
यशपाल आर्य बाजपुर की आरक्षित सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। यह सीट सिख और किसान बहुल मानी जाती है। इधर, सत्ता विरोधी लहर और किसानों का आंदोलन कहीं आने वाले चुनाव में भारी न पड़ जाए, इससे भी यशपाल की पार्टी बदलने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सियासी जानकारों का मानना है कि कांग्रेस में जाने के पीछे एक बड़ा कारण तराई में बीजेपी का किसानों के मुद्दे पर खासा विरोध होना भी हो सकता है। ऐसे में बाजपुर सीट से जीतना यशपाल आर्य के लिए बीजेपी के टिकट पर जीतना मुश्किल हो सकता था। इसलिए कांग्रेस का दामन थाम कांग्रेस के टिकट पर वह चुनाव लड़ने जा रहे हैं। इसके अलावा पिछले काफी समय से कैबिनेट की बैठकों में यशपाल आर्य दलितों के मुद्दों को लेकर भी खासे मुखर थे।
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