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16 बरस में नहीं तैयार हुआ उत्तराखंड में तीसरा विकल्प
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 02 Dec 2016 11:10 AM IST
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उत्तराखंड गठन के बाद से क्षेत्रीय मुद्दों की सियासत करने वाले क्षेत्रीय दल प्रदेश में नहीं पनप पाए। जिस दल उक्रांद ने राज्य गठन आंदोलन की नींव रखी वह उत्तराखंड बनने के बाद अपने लिए सियासी जमीन नहीं बना पाया।
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वहीं इसी दौरान पड़ोसी राज्यों यूपी, हरियाणा, पंजाब में क्षेत्रीय दलों ने मजबूत पैठ बनाकर राष्ट्रीय दलों से सत्ता हथिया ली। उक्रांद की विफलता के बाद परिवर्तन पार्टी और रक्षा मोर्चा जैसे क्षेत्रीय दल उभरे तो सही, लेकिन अभी तक कोई भी विधानसभा में सियासी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पाए। इन क्षेत्रीय दलों का प्रदेश में 10 प्रतिशत से भी कम वोट बैंक हैं।
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25 जुलाई 1979 में बने उत्तराखंड क्रांति दल का राज्य गठन से पूर्व तक स्वर्णिम इतिहास रहा है। राज्य आंदोलन की चिंगारी को भड़का कर शोला बनाने में उक्रांद के इंद्रमणि बड़ोनी जैसे नेताओं का अहम योगदान रहा है, लेकिन 1997 में यूपी विधानसभा चुनाव में भाग लेने को लेकर उक्रांद में पहली बार वैचारिक मतभेद गहराय थे।
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वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव से लेकर वर्ष 2012 के बीच पार्टी का विधानसभा में प्रतिनिधित्व घटकर एक होना आपसी कलह का नतीजा है। जिसका मुख्य कारण पार्टी में खेमेबाजी रही है। 2011 में पूर्व कैबिनेट मंत्री टीपीएस रावत ने उत्तराखंड रक्षा मोर्चे का गठन किया।
उक्रांद से साथ मिलकर चुनाव में उतरने की कोशिश नाकाम रहने के बाद टीपीएस ने 2012 विधानसभा चुनाव में 50 प्रत्याशी उतारे। पार्टी का उक्रांद से अधिक मत प्रतिशत रहा, लेकिन कोई प्रत्याशी नहीं जीता। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी की सक्रियता के बावजूद उनको अभी तक किसी चुनाव में कामयाबी नहीं मिली।
नैनीसार जैसा प्रदेश व्यापी मुद्दा उठा सरकार को झटका देने वाले परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी मानते हैं कि क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर आकर राष्ट्रीय दलों के खिलाफ उतरना होगा। यूआरएम के नेता पीसी थपलियाल भी संयुक्त फ्रंट की बात कर रहे हैं।
कई चेहरे छोड़ रहे क्षेत्रीय दलों की सियासत
क्षेत्रीय दलों को अब तक कई नेता साथ छोड़ चुके हैं। वर्ष 2012 में दिवाकर भट्ट ने उक्रांद का साथ छोड़ा। उक्रांद के विधायक ओम गोपाल भी अब भाजपा में हैं। मौजूदा सरकार में मंत्री प्रीतम सिंह पंवार इस बार निर्दलीय उतरने की तैयार कर रहे हैं। टीपीएस रावत ने रक्षा मोर्चा का गठन किया, लेकिन अब कांग्रेस में हैं।
अब 2017 की है तैयारी
उक्रांद, यूआरएम और परिवर्तन पार्टी विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए ताल ठोक चुके हैं। इनमें गठबंधन करने की बात तो होती रहती है, लेकिन ऐन मौके पर सब अलग अलग चुनाव लड़ते हैं। उक्रांद के सामने बड़ी दिक्कत यह है कि उसमें दो धड़े हैं, जिसमें एक पुष्पेश त्रिपाठी की अध्यक्षता में है तो दूसरा त्रिवेंद्र पंवार के अध्यक्षता में चल रहा है।
एकमात्र विधायक प्रीतम पंवार इस बार उक्रांद का दामन छोड़ने की तैयारी में हैं। जबकि दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल पहले ही भाजपा का दामन थाम चुके हैं। यूआरएम आरबीएस रावत जैसे चेहरों के साथ कुछ ब्यूरोक्रेट्स को जोड़कर उतरने कीू तैयारी में है। हालांकि अब संस्थापक अध्यक्ष टीपीसी रावत दल का हिस्सा नहीं हैं। परिवर्तन पार्टी को कुमाऊं में कुछ सीटों से उम्मीद है।