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आपदाः एक साल बाद 'गवाही' देने आया परिवार

Tue, 17 Jun 2014 11:13 AM IST
संदीप थपलियाल/अमर उजाला, केदारनाथ
संदीप थपलियाल/अमर उजाला, केदारनाथ Updated Tue, 17 Jun 2014 11:13 AM IST
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uttarakhand disaster after one year

कुरदती आपदा में पिछले साल 16 जून को ही केदारनाथ धाम का मुख्य पड़ाव रामबाड़ा तबाह हुआ था। कुछ संस्थाओं ने मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम रखा था। शिरकत के लिए मैं सुबह ही रुद्र प्रयाग से गुप्तकाशी होते हुए रामबाड़ा की ओर निकल पड़ा।

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कुदरती कहर ने इसका भूगोल ही बदल दिया था। जिस गुलजार बस्ती को लोग रामबाड़ा कहते थे, जिसे हम जानते-पहचानते थे, मिट्टी के ढूहों, पत्थरों के ढेर के अलावा कुछ भी नहीं था। सैलाब जिंदगी ही नहीं जिंदगी से जुड़ी हर चीज अपने साथ बहाकर ले गया था।
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यहां आकर जिंदगी की नश्वरता और क्षणभंगुरता का बोध शिद्दत से होने लगता है। मृतकों की बरसी पर श्रद्धांजलि बोझिल और गंभीर प्रकृति का कार्यक्रम है। मन में एक संजीदगी का अहसास था।

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जिंदगी का दूसरा पहलू भी

uttarakhand disaster after one year

लेकिन दोपहर में दिल्ली के उमेश जैन के परिवार से मिला तो लगा जिंदगी का दूसरा पहलू भी है। न मुआवजे का शिकवा, न मौतों के आंकड़े की परवाह, न लब पर रास्ते की दुश्वारी की शिकायत।

उमेश जैन पत्नी कमलजीत, पुत्र चिरांशु और एक पारिवारिक मित्र सोनिका के साथ केदारनाथ का दर्शन करके लौट रहे थे।

उमेश जैन आज के ठीक साल भर पहले परिवार के इन्हीं सदस्यों के साथ 16 जून को बाबा केदार का दर्शन करके रामबाड़ा में लौट रहे थे।

सुबह साढ़े नौ बजे चाय पी रहे थे कि केदारघाटी से कुछ नेपाली भागते हुए आए और कहा कि भागो पीछे से पानी आ रहा है। भारी बारिश हो रही थी। जिसे जैसे मौका लगा भागा। उमेश भी भागे।

भोले का शुक्रिया अदा करने आए

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बताते हैं कि रामबाड़ा के करीब एक पुल पर काफी लोग आवाजाही कर रहे थे। उनके सामने ही एक पहाड़ी भहराकर पुल ही गिरी।

कई लोग उसकी चपेट में आ गए। दबे लोगों समेत ही पुल मंदाकिनी में समा गया। तीन दिन जंगल चट्टी में रहने के बाद हेलीकाप्टर से उन्हें रेस्क्यू किया गया। 24 जून 2013 को वह दिल्ली पहुंच सके थे।

उमेश से पूछा पिछले साल जब जान मुश्किल से बची थी तो फिर आप परिवार समेत इसी दिन आए हैं, क्या वजह है।

उमेश ने आसमान की ओर देखते हुए जवाब दिया-मौत के तांडव के बीच हम लोग सही-सलामत हैं, क्या यह भोले की कृपा नहीं है। हम तो भोले का शुक्रिया अदा करने आए हैं। आने में डर नहीं लगा?

डर कैसा, जीवन ही भोले की देन है

uttarakhand disaster after one year

पूछा तो उमेश कहते हैं डर कैसा, जीवन ही भोले की देन है, जिस दिन लेना होगा ले लेंगे इसमें डर कैसा। हमें वही सलामत रखेंगे। कैसी जबरदस्त आस्था है। इसके आगे नतमस्तक ही हुआ जा सकता है।

परिवार के साथ आई सोनिका जरूर कहती हैं कि वह उस मनहूस दिनों को याद नहीं करना चाहतीं। कहती हैं गुलजार रामबाड़ा को तबाह देखकर आंखों में आंसू आ गए। उमेश की पत्नी कमलजीत बताती हैं हादसे का असर अभी तक नहीं गया। साल भर से ढंग से नींद नहीं आई। शायद अब इस साल बाबा केदार के दर्शन के बाद नींद आए।

इस साल बहुत कम लोग पहुंच रहे हैं

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इसके बाद उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रजनीश और हिमाचल की निकिता मिलती हैं। बाबा केदार के दर्शन करके लौट रहे थे। कहते हैं कि अब सब ठीक है। संदेश यही जाना चाहिए कि बाबा के दरबार में सभी ठीक है। प्रबल आस्था दुश्वारियों को मामूली बना देती है। यहां तीर्थयात्रियों की राह बहुत आसान नहीं है लेकिन शायद ही किसी के लब पे कोई शिकायत हो।

ऐसा नहीं है कि आपदा से कुछ बदला न हो। सबसे बड़ी बात कि इस साल बहुत कम लोग पहुंच रहे हैं। बीते साल 14 मई से 14 जून तक तीन लाख 10 हजार 615 लोग आए हैं। इसी अवधि में इस साल सिर्फ 23 हजार लोग पहुंचे हैं।

हर रोज 10 से 15 हजार लोग केदारनाथ आते थे, अब मुश्किल से तीन सवा तीन सौ आ रहे हैं। सोमवार को 360 लोग आए थे। यात्रा के पड़ाव सूने पडे़ हैं। व्यापारियों, कारोबारियों के साथ इन दिनों तीर्थयात्रियों से गुलजार रहने वाला केदारनाथ मार्ग पर रौनक नहीं है।

रास्तों की शक्ल ही नहीं रास्ता भी बदल गया है। रामबाड़ा के तबाह होने से पहले मंदाकिनी के बांई ओर से रास्ता केदारधाम जाता था, अब ऊपर की पहाड़ियों से दाईं ओर से रास्ता बनाया गया है। इससे पहले के टूटे रास्ते भी बना लिए गए हैं।

केदारनाथ धाम का ताजा हाल

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केदारधाम में मंजर जरूर बदला है लेकिन दिनचर्या नहीं बदली। मुख्य पुजारी गंगाधर लिंग आज भी ब्राह्ममुहूर्त में लगभग चार बजे बाबा केदार का पूजन शुरू करा देते हैं। अभिषेक, आरती सब कुछ बदस्तूर जारी है। बस कमी है तो भक्तों की संख्या की।

इस सीजन में यहां हजारों लोग रहते थे, अब धाम में सरकार की ओर से सिर्फ 300 लोगों के रहने की व्यवस्था है। इतने ही सरकारी कर्मचारी और पुजारी यहां रहते हैं। दिन भर लाउड स्पीकर से मंदिर में मंत्र, शिव स्त्रोत, भजन आदि गूंजते रहते हैं।

एक नजारा और बदला है। बीते साल बाबा केदार धाम मंदिर के ऐन पीछे आकर अड़ जाने वाली शिला का भी पूजन होने लगा है। बहुतों का मानना है कि इस शिला ने ही चमत्कारिक ढंग से बाबा के धाम को सैलाब से बचा लिया था। धाम के आसपास भवनों के ध्वंसावशेष कुदरत की तबाही के दस्तावेज के तौर पर खड़े हैं।

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