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उत्तराखंड के पूर्व सीएम खंडूड़ी से तय होती रही दिवंगत भाजपा नेता उमेश की सियासी हैसियत

Mon, 10 Jun 2019 09:38 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Mon, 10 Jun 2019 09:38 AM IST
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Uttarakhand Bjp senior leader umesh agarwal compared with bc khanduri
भाजपा नेता उमेश अग्रवाल की अंतिम विदाई - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

दिवंगत भाजपा नेता उमेश अग्रवाल के साथ पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी के अटूट रिश्ते की लंबी कहानी रही है। उत्तराखंड की राजनीति में जब-जब बीसी खंडूड़ी ताकतवर रहे, तब तब उमेश अग्रवाल के सियासी रसूख में बढ़ोतरी हुई। खंडूड़ी कमजोर हुए, तो उपेक्षा और हाशिये पर जाने की तकलीफ उमेश अग्रवाल को भी उठानी पड़ी। राजनीति की कच्ची-पक्की और काफी हद तक अविश्वसनीय डगर पर उमेश अग्रवाल हमेशा खंडूड़ी के ‘सच्चे-सिपाही’ रहे। राजनीति मेें अपने लिए नई राह न भी निकली, लेकिन उमेश ने खंडूड़ी का साथ छोड़कर किसी और की शरण नहीं ली। इसके अलावा, भाजपा पार्टी के साथ भी उनके अटूट रिश्ते बने रहे।

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दरअसल, वर्ष 1991 में रामलहर के साथ ही लोकसभा चुनाव के लिए पहली बार जब गढ़वाल सीट पर खंडूड़ी की दावेदारी सामने आई, तब से ही अग्रवाल के साथ उनके रिश्ते बन गए। उस वक्त देहरादून शहर का ज्यादातर हिस्सा गढ़वाल लोकसभा सीट का हिस्सा होता था। खंडूड़ी चुनावी राजनीति में नए थे और देहरादून शहर में अपने लिए मजबूत साथी की तलाश कर रहे थे। उमेश उनके संपर्क में आए, तो फिर हमेशा के लिए उन्हीं के होकर रह गए। दो महीने पहले उमेश अग्रवाल ने खंडूड़ी से अपने जुड़ाव की बातें ‘अमर उजाला’ से साझा की थी। तब उमेश ने कहा था-मैंने खंडूड़ी जी के लिए लोकसभा चुनाव में खूब मेहनत की थी। मैं भाजपा का कार्यकर्ता था, इसलिए मुझे यह सब करना ही था, लेकिन चुनाव जीतने के बाद खंडूड़ी मुझसे मिलने मेरे घर आए और धन्यवाद अदा किया। उनकी यह बात, साफगोई दिल में उतर गई और तय कर लिया कि इनके साथ ही रहना है।
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खंडूड़ी राज में सत्ता के केंद्र के रूप में उभरे

वर्ष 2007 में बीसी खंडूड़ी उत्तराखंड के सीएम बने, तो उनके सबसे भरोसेमंद साथी के तौर पर उमेश अग्रवाल के बढ़ते हुए प्रभाव को सबने महसूस किया। उन्हें गढ़वाल मंडल विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया। इससे पहले वे खंडूड़ी के केंद्रीय मंत्री बनने पर भी उनके सबसे मजबूत प्रतिनिधि के तौर पर जाने जाते रहे। वह कई बार औपचारिक तौर पर सांसद प्रतिनिधि भी रहे। खंडूड़ी जब भी चुनावी राजनीति में उतरे, तब प्रबंधन की सारी जिम्मेदारी उमेश अग्रवाल के कंधों पर ही रही।

प्रबल दावेदार रहे, मगर हमेशा फिसला टिकट
एक जमाने में धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में अपराजित से माने जाने वाले दिनेश अग्रवाल से टक्कर के लिए उमेश अग्रवाल को मजबूत दावेदार माना गया। मगर उन्हें टिकट नहीं मिल पाया। उन्होंने कई बार दावेदारी की। उनकी पकड़ को पार्टी महसूस भी करती थी, लेकिन टिकट हमेशा फिसल जाता था। 2012 में उनकी जगह प्रकाश सुमन ध्यानी को टिकट मिल गया था। इसी तरह 2017 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मेयर विनोद चमोली को भाजपा का टिकट मिल गया। अग्रवाल ने देहरादून नगर निगम के मेयर पद के टिकट के लिए भी दावेदारी की, लेकिन उनका नंबर नहीं लग पाया।
 

पिछले कुछ वर्ष रहे सिर्फ उपेक्षा के ही नाम

भाजपा नेता उमेश अग्रवाल पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के स्तर पर उपेक्षित होते चले गए। इसका एक बड़ा कारण बीसी खंडूड़ी का खराब स्वास्थ्य के कारण भाजपा की राजनीति में कमजोर होना भी रहा। एक झटके में दून महानगर अध्यक्ष पद से उमेश अग्रवाल की विदाई कर दी गई। उनकी जगह वैश्य बिरादरी से ही विनय गोयल को दायित्व दे दिया गया। उमेश अग्रवाल सरकारी दायित्व के भी मजबूत दावेदार थे, लेकिन जब पहली सूची आई, तो उनका नाम गायब था।

बीमारी के चलते खामोश हो गए थे अग्रवाल
टीवी डिबेट और पार्टी के कार्यक्रमों में अपनी बुलंद आवाज के कारण हमेशा ध्यान खींचने वाले उमेश अग्रवाल बीमारी के कारण खामोश से हो गए थे। पिछले कुछ समय से वह सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगे थे। टीवी डिबेट और अन्य कार्यक्रमों में उन्होंने जाना छोड़ दिया था।

पार्टी छोड़ने की अफवाह उड़ी, मगर भाजपाई ही रहे
वर्ष 2018 के नगर निकाय चुनाव के दौरान उमेश अग्रवाल के भाजपा छोड़ने की अफवाह कई बार उड़ी, लेकिन वह भाजपा के साथ मजबूत रिश्ते में बंधे रहे। उन्होंने उस वक्त खुद सामने आकर कहा था कि भाजपा उनकी मां की तरह है, जिसे वह कभी नहीं छोड़ सकते।

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