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उत्तराखंड: इस बार अलग छवि गढ़ रहे विधानसभा स्पीकर प्रेमचंद अग्रवाल
राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 23 Sep 2018 10:13 AM IST
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Premchand Aggarwal
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तटस्थता को लेकर कसौटी पर मानी जाने वाली विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे प्रेमचंद अग्रवाल अलग छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। उत्तराखंड विधानसभा का इतिहास रहा है कि यहां महत्वपूर्ण मौकों पर अध्यक्ष के फैसले अक्सर सवालों के कठघरे में खड़े होते थे। पूर्व सरकार में सियासी संकट के दौरान तत्कालीन स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल की छवि भी विवादों से नहीं बच पाई थी। मगर, मौजूदा सरकार में स्पीकर प्रेमचंद अग्रवाल न केवल सही अर्थों में तटस्थ दिखने का प्रयास कर रहे हैं, बल्कि इसमें वे सफल भी हुए हैं।
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पूर्व में विधायक रहने के दौरान प्रेमचंद अग्रवाल की छवि एक आक्रामक विधायक की थी। तब वे इसी सदन में अपने मसलों को उठाने के लिए अध्यक्ष पीठ (विधानसभा अध्यक्ष) पर दबाव बनाते थे। उनका उत्साह और उत्तेजना अध्यक्ष पीठ और सत्तापक्ष को असहज करता था। लेकिन, आज वे अध्यक्ष पीठ पर हैं और उन्हें सदस्यों की उत्तेजना, आक्रोश और शिकायतों का सामना करना पड़ा रहा है। सत्र में तीन दिनों के दौरान विपक्षी सदस्यों को महंगाई, कानून व्यवस्था सरीखे दुविधा में डालने वाले मसलों को भी उन्होंने उठाने की अनुमति दी। जिन प्रश्नों पर मंत्रियों से संतोषजनक उत्तर नहीं मिले तो पीठ से सरकार को निर्देश देने से भी नहीं हिचके। मानसून सत्र के दौरान सदन में सरकार के मंत्रियों के असंतोषजनक उत्तरों पर विपक्षी सदस्यों ने जब उनसे दखल चाहा तो उन्होंने सरकार को निर्देश दिए। स्पीकर के इस तटस्थ आचरण से सरकार को असहज होना पड़ा। उनकी इस भूमिका पर सत्ता पक्ष के सदस्य ही नहीं विपक्षी भी फिदा हैं।
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इस सत्र के दौरान अभी तक चली सदन की कार्यवाही में उनकी भूमिका से विपक्ष भी सहज दिखाई दे रहा है। इसके पीछे स्पीकर की अभी तक की तटस्थ भूमिका कारण है। नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने तो सदन में ही विवेकाधीन कोष के बहाने की उनकी तटस्थता की सराहना कर डाली। उनका कहना था कि पहली बार किसी स्पीकर ने विवेकाधीन कोष का सदस्यों में समान आवंटन किया।
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स्पीकर का कड़ा संदेश
- लीसा मामले में सरकार को पीठ से निर्देश दिए कि वह सही जानकारी सदन में दे
- परिसीमन पर उन्होंने शहरी विकास और पंचायत राज विभाग को समन्वय बनाने को कहा
-अतिक्रमण पर विपक्ष के उठाए सवालों पर उन्होंने सरकार को समाधान निकालने के निर्देश दिए
- भाजपा विधायक सुरेश राठौर को चेताया कि जरूरी नहीं कि वे जोर से बोलेंगे तो उन्हें बोलने का मौका मिल ही जाएगा
- सदस्यों के प्रोटोकॉल को लेकर भी उन्होंने सरकार को निर्देश दिए कि वे अधिकारियों को ताकीद करे
संवैधानिक पीठ पर बैठने के बाद कोई किसी दल या विचाराधारा का नहीं होता। वह सबका होता है। उसे निष्पक्षता से काम करना होता है। जब सबको समान रूप से देखेंगे तो कोई दुविधा नहीं होगी। मेरी यह कोशिश है कि अध्यक्ष पीठ जैसी दिखती है, उसे वैसा दिखना चाहिए। राज्य हित और लोक हित में मुझे यदि कड़े निर्णय भी लेने पड़े तो मैं लूंगा।
- प्रेमचंद अग्रवाल, विधानसभा अध्यक्ष
अध्यक्ष पीठ से जो निर्देश आए हैं, उसे सरकार के असहज होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह कार्यपालिका पर विधायिका के नियंत्रण का एक अच्छा रूप है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये सदस्यों की सक्रियता और जागरूकता को भी प्रकट करता है।
- प्रकाश पंत, संसदीय कार्यमंत्री
क्या होती है अध्यक्ष पीठ
विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान कई बार अध्यक्ष पीठ से सरकार को निर्देश जारी हुए। इन निर्देशों की वजह से अध्यक्ष पीठ को लेकर एक जिज्ञासा होती है। आखिर ये अध्यक्ष पीठ क्या होती है? दरअसल, अध्यक्ष पीठ सदन में सबसे ऊंचा स्थान है, जहां विधानसभा अध्यक्ष विराजते हैं। वे विधानसभा व विधानसभा सचिवालय के मुखिया(हैड) होते हैं। उन्हें संविधान, प्रक्रिया, नियमों एवं संसदीय परंपराओं के तहत बहुत अधिक अधिकार प्राप्त हैं। सभा के परिसर में उनके अधिकार सर्वोच्च होते हैं। अध्यक्ष पर सदन को व्यवस्थित संचालन की जिम्मेदारी होती है। लेकिन वे चर्चा में भाग नहीं ले सकते। सदन व्यवस्थित रखने के लिए उनके पास अनुशासनात्मक कार्रवाई के अधिकार होते हैं।