Assembly Session: फिर बिना सार्थक बहस के निपट गया सत्र, पुरानी पटकथा पर किरदार निभाते रहे सत्तापक्ष-विपक्ष
हमेशा की तरह इस बार भी विपक्ष के लिए विधेयकों और राज्य के विकास के लिए अहम बजट पर बहस या चर्चा करने से ज्यादा रुचि दूसरे मुद्दों पर रही। नतीजा यह रहा कि कटौती प्रस्ताव के जरिये सरकार से जवाब मांगने का जो मौका विपक्ष के पास था, उसका वह फायदा नहीं उठा पाया।
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विधानसभा सत्र में स्पीकर रितु खंडूरी भूषण हंगामे के बीच सदस्यों को बेशक यह नसीहत पिलाती दिखीं कि उन्हें पूरा प्रदेश देख रहा है। लेकिन सच यही है कि उत्तराखंड विधानसभा में मंत्रियों और विधायकों को शायद इसकी परवाह नहीं थी। वे अपने किरदार पुरानी पटकथा पर ही निभाते रहे।
सदन में कुछ नयापन और अनूठा देखने की उम्मीद करने वालों कोर फिर निराशा हुई। एक बार फिर बिना सार्थक बहस के चार दिन का सत्र निपट गया। हमेशा की तरह इस बार भी विपक्ष के लिए विधेयकों और राज्य के विकास के लिए अहम बजट पर बहस या चर्चा करने से ज्यादा रुचि दूसरे मुद्दों पर रही। नतीजा यह रहा कि कटौती प्रस्ताव के जरिये सरकार से जवाब मांगने का जो मौका विपक्ष के पास था, उसका वह फायदा नहीं उठा पाया।
उत्तराखंड का सदन में पिछले तमाम सत्रों में पक्ष-विपक्ष की इस नूरा कुश्ती का गवाह बन चुका है। एक बार सरकार को बिना सवालों, चर्चा और बहस के 35 मिनट के भीतर 21 विभागों की अनुदान मांगे और विनियोग विधेयक पास करा दिया गया।सदन की कार्यवाही में मंत्रियों और सदस्यों की दिलचस्पी भी बड़ा प्रश्न बनी। चलते सदन के दौरान कुछ मंत्रियों का विभागीय बैठकों में मशगूल रहना भी चौंकाने वाला था।
सत्तापक्ष के विधायकों को भी सदन की कार्यवाही से ज्यादा दिलचस्पी मुख्यमंत्री और मंत्रियों के दफ्तरों की परिक्रमा करने में ज्यादा दिखी। उन्हें जब भी मौका मिला वे चलते सदन से मुलाकातें करने निकल गए। आलम यह था कि सदन की कार्यवाही के दौरान कुछेक अवसरों पर विपक्ष ने व्यवस्था के प्रश्न उठा दिया कि मंत्री सदन में नहीं हैं। कार्यवाही के दौरान कुछ क्षण ऐसे भी दिखे जब सदन में एक भी मंत्री नहीं था।
इसके अलावा सत्र के दौरान प्रश्नकाल और कार्यस्थगन के दौरान कुछ मंत्रियों की लड़खड़ाहट ने उनके कमजोर होमवर्क की कलई खोली। सत्तापक्ष के ही विधायकों ने अपनी सरकार के मंत्रियों को प्रश्नों से निरुत्तर करने का प्रयास किया। विपक्ष भी मानों यह ठानकर आया था कि उसे सवालों के उत्तर नहीं बल्कि सरकार के मंत्रियों को निरुत्तर करना है। इसलिए कुछ अवसरों पर जवाब मिलने के बावजूद वे सवाल पर सवाल दागते दिखे।
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पूरे सदन में विपक्ष का रवैया रहा नकारात्मक : अग्रवाल
संसदीय कार्यमंत्री प्रेमचंद अग्रवाल ने कहा कि चार दिवसीय सत्र के दौरान सरकार की ओर से विपक्ष के हर सवाल का जवाब दिया गया। लेकिन पूरे सदन में जिस तरह से विपक्ष ने व्यवहार किया, वह इससे पहले कभी नहीं हुआ। वेल में आकर विपक्ष सदस्यों ने मेज पर पैर मारकर तोड़ने का प्रयास किया। सुरक्षा कर्मियों को धक्का दिया गया। मैं भी लगातार चौथी बार विधायक हूं, लेकिन विपक्ष का व्यवहार कभी ऐसा नहीं रहा। सरकार की ओर से जवाब देने के बाद विपक्ष का रवैया नकारात्मक रहा। विपक्ष मुद्दों को लपकने का प्रयास करता रहा। विपक्ष को आत्ममंथन करना चाहिए कि जनता के सरोकार से जुड़े।