Uttarakhand Election 2022: इस सीट पर नेताओं की अदला-बदली से वोटर हैरान और कार्यकर्ता मायूस
दल-बदल करते वक्त प्रत्याशी और संगठन पदाधिकारी यह भूल गए अदला-बदली का कार्यकर्ताओं और मतदाताओं पर क्या असर पड़ेगा। इस स्थिति में कई सक्रिय कार्यकर्ता निष्क्रिय नजर आ रहे हैं।
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टिहरी विधानसभा सीट पर जीत के लिए जोर आजमाइश कर रहे भाजपा और कांग्रेस को अब भीतरघात का डर सता रहा है। टिकट को लेकर पहले दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में भगदड़ मची रही। दोनों पार्टियों ने प्रत्याशियों की अदला-बदली कर सभी को हैरान कर दिया। दल-बदल की इस राजनीति से कार्यकर्ता मायूस और वोटर आहत हैं।
दल-बदल करते वक्त प्रत्याशी और संगठन पदाधिकारी यह भूल गए अदला-बदली का कार्यकर्ताओं और मतदाताओं पर क्या असर पड़ेगा। इस स्थिति में दोनों पार्टियों के कई सक्रिय कार्यकर्ता निष्क्रिय नजर आ रहे हैं। नेताओं के दल-बदल से वोटर भी कई तरह के सवाल उठा रहे हैं। मतदाताओं का कहना है कि नेताओं का अब विचारधारा और जन सरोकारों से कोई वास्ता नहीं रह गया है। बात अब मुद्दों की नहीं अपने स्वार्थों की हो रही है।
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टिकट वितरण को लेकर टिहरी विधानसभा सीट पर इस बार उलटफेर हुआ है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कांग्रेस के टिकट पर दो बार विधायक बने किशोर उपाध्याय को इस बार भाजपा ने प्रत्याशी बनाया है। जबकि भाजपा के विधायक डा. धन सिंह नेगी को कांग्रेस ने इसी सीट पर प्रत्याशी मैदान में उतारा है। डा. नेगी को भाजपा ने 2012 में भी प्रत्याशी बनाया था, लेकिन वह चुनाव हार गए थे। टिकट वितरण के बाद दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच बगावत के स्वर बुलंद हैं।
भाजपा के कुछ कार्यकर्ता कांग्रेस में और कांग्रेस के कई कार्यकर्ता भाजपा में शामिल होकर अपनी टीस बुझा रहे हैं। पूर्व मंत्री दिनेश धनै की उत्तराखंड जनएकता पार्टी भी दल-बदल की इस राजनीति को भुनाने की कोशिश में जुटी हुई है। दल-बदल की इस राजनीति से भाजपा और कांग्रेस को अब भीतरघात का डर सता रहा है। इसलिए मतदान से पहले हर हाल में रूठों को मनाने के प्रयास पार्टियों के दिग्गजों के स्तर पर चल रहा है। इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी यह आने वाला वक्त बताएगा।
क्या कहते है वोटर
मेरी 88 साल की उम्र हो गई, पहले कभी बड़े नेताओं को दल-बदल करते नहीं देखा और सुना है। क्योंकि नेता की अपनी विचारधारा होती है। छोटे कार्यकर्ता भले ही दल-बदल करते थे। अब नेता अपने स्वार्थों के लिए दल-बदल कर खुद ही लाचार हो गए हैं। लाचार लोग कैसे जनता की सेवा करेंगे।
-पारेश्वर प्रसाद भट्ट, नई टिहरी
दल-बदल कर नेता धीरे-धीरे जनता का विश्वास खुद ही खोते जा रहे हैं। जन सरकारों से किसी का कोई मतलब नहीं रह गया। अपने मन की न होने पर नेताओं को पार्टी बदलना आसान हो गया है, जिससे वोटर आहत हो रहे हैं। इसलिए लोगों का अब नेताओं से विश्वास उठना स्वाभाविक है।
-सत्य प्रसाद उनियाल, नई टिहरी
चुनाव के ऐन वक्त पर दल-बदल करना व्यक्तिगत स्वार्थ की राजनीति है। इससे समर्पित कार्यकर्ता खुद ही अपमानित होता है। कैडर मतदाता पार्टी संगठन के साथ अंत तक बना रहता है। यदि चुनाव से पहले दल-बदल होता है, तो यह समझा जा सकता है कि जनहित को देखते हुए फैसला लिया है।
-महीपाल सिंह नेगी, वरिष्ठ पत्रकार टिहरी
कार्यकर्ता दुविधा की स्थिति में हैं, जिस पार्टी और विचारधारा को कल तक कोसते थे। अब ठीक उसके विपरीत बोलकर जनता को क्या संदेश दे पाएंगे। लोग नेता पर कैसे विश्वास करें कि अगली बार वह दल-बदल नहीं करेगा।
-विक्रम बिष्ट, वरिष्ट पत्रकार टिहरी