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Uttarakhand Assembly Elelction 2022: छोड़ा मैदान पर चेले को जिताने के लिए त्रिवेंद्र को फूंकनी पड़ेगी जान
Sat, 29 Jan 2022 02:20 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Sat, 29 Jan 2022 02:20 PM IST
सार
70 विधानसभा सीटों में अकेली डोईवाला विधानसभा सीट पर ही भाजपा में अंतिम समय तक असमंजस बना रहा। इस सीट से तीन बार के विधायक त्रिवेंद्र सिंह रावत के चुनाव लड़ने से इनकार असमंजस की मुख्य वजह माना गया।
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पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पारंपरिक डोईवाला विधानसभा के चुनावी समर में उतरने से इनकार कर दिया, लेकिन नियति ने उन्हें फिर समर में लाकर खड़ा कर दिया है। बेशक वह खुद चुनाव में नहीं हैं, लेकिन पार्टी ने उनके समर्थक बृजभूषण गैरोला को मैदान में उतारकर त्रिवेंद्र को भी परोक्ष रूप से समर में बनाए रखा है।
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70 विधानसभा सीटों में अकेली डोईवाला विधानसभा सीट पर ही भाजपा में अंतिम समय तक असमंजस बना रहा। इस सीट से तीन बार के विधायक त्रिवेंद्र सिंह रावत के चुनाव लड़ने से इनकार असमंजस की मुख्य वजह माना गया। त्रिवेंद्र के मैदान से हटने के बाद यह यक्ष प्रश्न बन गया कि उनकी जगह भाजपा किस चेहरे पर दांव लगाएगी। त्रिवेंद्र के इनकार बाद चुनाव क्षेत्र से कई दावेदार मैदान में उतर आए। लेकिन पार्टी त्रिवेंद्र जैसे हैवीवेट चेहरे की खोज में जुटी रही।
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भाजपा में शामिल हुए सीडीएस जनरल बिपिन रावत के भाई कर्नल विजय सिंह रावत का नाम अचानक डोईवाला विस सीट पर दावेदारी के तौर पर सामने आया। लेकिन कर्नल रावत ने दिलचस्पी नहीं दिखाई तो पार्टी दूसरे विकल्पों की तलाश में जुट गई। नामांकन वापसी के एक दिन पहले तक पार्टी डोईवाला के लिए जिताऊ प्रत्याशी नहीं खोज पा रही थी।
इस दौरान महिला मोर्चा की राष्ट्रीय महामंत्री दीप्ति रावत का नाम तेजी उछला तो चुनाव क्षेत्र के टिकट के दावेदारों का पारा चढ़ गया और उन्होंने बाहरी प्रत्याशी थोपे जाने पर बगावत के संकेत दे डाले। अब तक हुए चार चुनाव में भाजपा को कभी ऐसी दुविधा का सामना नहीं करना पड़ा। रातोंरात पार्टी ने स्थानीय चेहरे के तौर पर बृजभूषण गैरोला को उम्मीदवार बनाने का फैसला लिया। नामांकन दाखिल करने के आखिरी दिन पार्टी ने गैरोला को प्रत्याशी बनाए जाने की सूचना जारी की।
सूत्रों के मुताबिक, चुनाव लड़ने से इनकार करने के बाद त्रिवेंद्र ने पैनल के लिए संभावित दावेदारों के जो नाम दिए थे, उनमें एक नाम गैरोला का भी था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े गैरोला पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के करीबी रहे हैं और त्रिवेंद्र सिंह रावत के नजदीकी माने जाते हैं। वह त्रिवेंद्र सरकार में दायित्वधारी भी रहे। पार्टी ने गैरोला को उम्मीदवार बनाकर जहां बाहरी प्रत्याशी का विरोध कर रहे स्थानी दावेदारों की असंतोष को थामने का काम किया वहीं त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी डोईवाला के समर से बांध दिया है।
सियासी जानकारों के मुताबिक, लगातार चार चुनाव जीत चुकी भाजपा को अब अपने इस दुर्ग को बचाने की चुनौती है। पहली बार कांग्रेस ने भी इस सीट पर स्थानीय चेहरे गौरव चौधरी को प्रत्याशी बनाया है। दोनों दलों में स्थानीय और नए प्रत्याशी होने से डोईवाला की चुनावी जंग बहुत दिलचस्प हो गई है। इस जंग में त्रिवेंद्र सिंह रावत की भूमिका अहम मानी जा रही है। जानकारों का मानना है कि गैरोला को चुनावी चुनौती को आसान बनाने के लिए त्रिवेंद्र के कंधों पर भी जिम्मेदारी आ गई है।