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Uttarakhand Assembly Elelction 2022: नेताजी वोट फौजियों के पाएंगे, लेकिन प्रत्याशी नहीं बनाएंगे

Sat, 29 Jan 2022 02:43 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून
विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 29 Jan 2022 02:43 PM IST
सार

प्रदेश में पूर्व सैनिकों के नाम पर सियासत तो खूब हो रही है, लेकिन जब उन्हें चुनाव में प्रतिनिधित्व देने की बारी आती है तो भाजपा, कांग्रेस हो या अन्य राजनीतिक दल, सभी कन्नी काट लेते हैं।

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Uttarakhand Assembly Election 2022: political leader will get votes of soldiers, but will not make them candidates
मतदान (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

विस्तार

सैन्य बहुल उत्तराखंड में सैनिक और उनके परिवार राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट बैंक बनकर रह गए हैं। प्रदेश में पूर्व सैनिकों के नाम पर सियासत तो खूब हो रही है, लेकिन जब उन्हें चुनाव में प्रतिनिधित्व देने की बारी आती है तो भाजपा, कांग्रेस हो या अन्य राजनीतिक दल, सभी कन्नी काट लेते हैं। वर्ष 2022 के इस विधानसभा चुनाव में भी कुछ पूर्व सैनिक पुराने नेताओं के नाम अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो इस मामले में कांग्रेस-भाजपा के हाथ खाली ही हैं। दोनों ही दलों ने पूर्व सैनिक बिरादरी से किसी नए चेहरे को उम्मीदवार नहीं बनाया है।

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प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 के लिए शुक्रवार को नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो गई। इस दौरान दो राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा-कांग्रेस के दो दिग्गज नेता उत्तरखंड के चुनावी समर में पूर्व सैनिकों के नाम पर वोट मांगते नजर आए। भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रुद्रप्रयाग तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मीडिया प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने देहरादून में पूर्व सैनिकों के नाम पर लोगों से वोट की अपील की। देहरादून में इस मुद्दे पर जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि कितने पूर्व सैनिकों को पार्टी ने टिकट दिया? तो वह एक भी नाम नहीं गिना पाए। चलती रंगत में उन्होंने तीन लोगों को टिकट दिए जाने की बात जरूर कही।
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प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव ने अलग से इन नामों की जब घोषणा की तो पता चला पार्टी के वरिष्ठ नेता जोत सिंह बिष्ट, सुरेंद्र सिंह नेगी और रंजीत रावत वह पूर्व सैनिक हैं, जिन्हें पार्टी ने टिकट दिया है। सच तो यह है कि सैनिकों और पूर्व सैनिकों के नाम पर एक घंटे से अधिक समय तक की गई प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस के पास बताने के लिए एक भी नाम ऐसा नहीं था, जिसे उसने पूर्व सैनिक के नाम पर टिकट दिया हो। यही हाल भाजपा का भी है। कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी का नाम छोड़ दिया जाए तो भाजपा के पास भी दूसरा नाम बताने को नहीं है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जरूर सैनिक के बेटे हैं। इसके आलावा कोटद्वार से प्रत्याशी बनाई गर्ईं ऋतु खंडूड़ी सैन्य परिवार से ताल्लुक रखती हैं। जबकि आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री के चेहरे कर्नल अजय कोठियाल (सेनि.) ही एक मात्र पूर्व सैनिक चेहरे नजर आते हैं। 

प्रतिनिधित्व क्यों नहीं...जवाब नहीं

प्रदेश में घर-घर फौजी, हर घर फौजी की परंपरा है। यहां शायद ही कोई ऐसा परिवार हो, जो सेना से ताल्लुक न रखता हो। यहां करीब 12 फीसदी मतदाता सैन्य बहुल यानी सैन्य परिवारों से हैं। प्रदेश में सैनिक और पूर्व सैनिकों की संख्या करीब दो लाख 67 हजार है, जो उत्तराखंड के कुल मतदाताओं का लगभग 3.30 प्रतिशत है, लेकिन अगर सैनिक वोटरों के साथ यदि उनके परिजन एवं नाते-रिश्तेदारों को शामिल कर दिया जाए तो यह मत प्रतिशत बढ़कर लगभग 12 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। इस चुनाव में भी भाजपा-कांग्रेस भी सैनिक मतदाताओं को लुभाने के लिए जी-जान से जुटे हैं। लेकिन उन्हें चुनाव में प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाता, इस सवाल का जवाब किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है।

मौका मिला तो सबको चौंका दिया
उत्तराखंड की सियासत में जिन पूर्व फौजियों को मौका मिला, उन्होंने खुद को साबित किया। इनमें मेजर जनरल बीसी खंडूरी (सेनि.), ले.जन टीपीएस रावत (सेनि.), गणेश जोशी के नाम प्रमुख हैं, जिन्होंने फौज के बाद सियासत में कदम रखा तो उसकी ऊंचाइयों को भी छुआ। सियासत के मैदान में उतरे इन पूर्व सैनिकों ने मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री से लेकर कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय किया। 

रिझाने की हो रही हर कोशिश
एक अनुमान के मुताबिक सेना का हर पांचवां जवान उत्तराखंड से ताल्लुक रखता है। विधानसभा चुनाव से पूर्व भाजपा-कांग्रेस की ओर से सैन्य मतदाताओं को रिझाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। भाजपा सरकार की ओर से देहरादून में सैन्य धाम का निर्माण कराया जा रहा है। इससे पूर्व पार्टी शहीद सम्मान यात्रा निकाल चुकी है। कांग्रेस ने भी अपनी पहली चुनावी सभा, विजय सैनिक सम्मान रैली के रूप में की। इसके अलावा दोनों पार्टियों के घोषणापत्रों में हमेशा पूर्व सैनिकों की बात बढ़ चढ़कर होती है। तमाम विभाग और प्रकोष्ठ भी बनाए गए हैं। लेकिन आखिर में सवाल वहीं आकर अटक जाता है, जब सबकुछ ठीक है तो पार्टियों पूर्व सैनिकों को टिकट देकर प्रतिनिधित्व क्यों नहीं देती हैं।

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