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नमामि गंगे परियोजना के भगीरथ बनेंगे त्रिवेंद्र
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 19 Mar 2017 12:39 PM IST
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Trivendra Singh
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मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के अभियान नमामि गंगा परियोजना के भगीरथ बनेंगे। वह केंद्रीय नमामि गंगे समिति के सदस्य हैं और उत्तराखंड में परियोजना की मॉनीटरिंग की जिम्मेदारी भी उन पर ही है।
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उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने के बाद यह परियोजना उनकी प्राथमिकता पर रहेगी। इसके साथ ही राज्य और केंद्र की मत भिन्नता के चक्कर में नमामि गंगे परियोजना में जहां अटकाव पैदा हो रहा है, उसके जल्दी ही दूर होने की उम्मीद पैदा हो गई है।
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नमामि गंगे परियोजना गोमुख से गंगा सागर तक पांच राज्य उत्तराखंड, यूपी, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में चल रही है। गंगा का उद्गम स्थल होने के कारण उत्तराखंड सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। उत्तराखंड में होने वाले कार्य अन्य राज्यों में अभियान की दिशा तय करेंगे। लेकिन, उत्तराखंड में नमामि गंगे का कार्य गति नहीं पकड़ पा रहा है। राज्य और केंद्र के बीच कार्यदायी एजेंसियों, कार्ययोजना और विभिन्न छोटी परियोजनाओं को लेकर मतभेद होने से काम अटक गया।
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प्रदेश शासन ने नमामि गंगे की कार्यदायी एजेंसी उत्तराखंड पेयजल निगम को बनाया। पेयजल निगम ने ही एक्शन प्लान भी तैयार किया था, लेकिन केंद्र सरकार ने पेयजल निगम को खारिज करके वेप्कास को जिम्मेदारी दे दी। इस पर निगम की सारी कवायद बेकार चली गई।
दिसंबर, 2015 में एनजीटी के आदेश के बाद बजट न मिलने के कारण नमामि गंगे का काम अटका रहा। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने तथा नमामि गंगे समिति के सदस्य त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री बनने से परियोजना की राह आसान हो गई है। इसके साथ ही राज्य को परियोजना के प्रोजेक्ट भी मिलेंगे, जिससे काम में तेजी आएगी। परियोजना के मद का जो बजट केंद्र ने अभी तक जारी नहीं किया है, उसके भी जल्द मिलने की उम्मीद है।
दबाव के आगे बिखरा संतुलन
प्रचंड बहुमत के तमाम सुखद पहलुओं से बीजेपी इन दिनों रूबरू है, लेकिन स्याह पहलु से भी उसका सामना होने लगा है। मंत्रिमंडल गठन के दौरान दबाव के आगे पार्टी का संतुलन बिखर गया। छह जिले त्रिवेंद्र सिंह रावत मंत्रिमंडल से एकदम गायब हैं।
असंतुलन का हाल देखिए, पौड़ी जिले से तीन-तीन मंत्री बनाए गए हैं, लेकिन नैनीताल जैसे बडे़ जिले से कोई मंत्री नहीं है। ये ही नहीं, रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर और चंपावत का भी मंत्रिमंडल से सफा चट मामला है। बीजेपी के भीतर से ही असंतोष के स्वर फूटने लगे हैं। पार्टी की दिक्कत ये है कि अब उसके पास मंत्रिमंडल में एडजस्टमेंट के लिए सिर्फ दो पद बचे हुए हैं। इसके अलावा, स्पीकर और डिप्टी स्पीकर पद के जरिये भी वह इस असंतुलन को थोड़ा कम कर सकती है, लेकिन फिर भी सारे जिले कवर नहीं हो पाएंगे।
त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में पांच मंत्री गढ़वाल मंडल से हैं, जबकि कुमाऊं मंडल के हिस्से चार मंत्री आए हैं। दोनों मंडलों से एक-एक राज्य मंत्री बनाए गए हैं। पौड़ी जिले को अकेले तीन मंत्री मिले हैं, जिसमें सतपाल महाराज और डा. हरक सिंह रावत कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं, जबकि डा. धन सिंह रावत को राज्य मंत्री बनाया गया है। पौड़ी के बाद ऊधमसिंहनगर ऐसा जिला रहा है, जिसके सबसे ज्यादा दो मंत्री बने हैं। इस जिले से यशपाल आर्य और अरविंद पांडे को मौका मिला है।
हरिद्वार जिले से मदन कौशिक, पिथौरागढ़ से प्रकाश पंत, टिहरी से सुबोध उनियाल और अल्मोड़ा से रेखा आर्य को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। जातीय हिसाब से भी देखें, तो त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल का संतुलन गड़बड़ाया हुआ दिखता है। राजपूत, ब्राह्मण और दलितों के प्रतिनिधित्व का ख्याल रखा गया है, लेकिन पंजाबी, बनिया, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी श्रेणी से कोई मंत्री नहीं बन पाया है। जातीय असंतुलन का बड़ा उदाहरण भी पौड़ी जिले से ही निकला है, जहां से मंत्री बनाए गए तीनों विधायक राजपूत हैं।
पद सीमित, अब कितने जिले होंगे एडजस्ट
राज्य मंत्रिमंडल में अब मंत्रियों के सिर्फ दो पद शेष रह गए हैं। इसके अलावा, स्पीकर और डिप्टी स्पीकर पद से भी जिलों को प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। मगर इसके बावजूद, दो जिलों का सरकार में प्रतिनिधित्वविहीन रहना तय है। मंत्रिमंडल में जिलों की उपेक्षा पर न खुद बीजेपी के नेता मुखर होने लगे हैं। बीजेपी के चमोली जिले के मीडिया प्रभारी रमेश मैखुरी का कहना है कि सीमांत जिले की उपेक्षा कतई अच्छा फैसला नहीं है। इससे पार्टी को नुकसान होगा।