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एक दिन में कई मौसम देखने हैं तो इस जन्नत में आइए

Wed, 19 Aug 2015 09:43 AM IST
अमरनाथ/ अमर उजाला, मुक्तेश्वर (नैनीताल)
अमरनाथ/ अमर उजाला, मुक्तेश्वर (नैनीताल) Updated Wed, 19 Aug 2015 09:43 AM IST
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tourist place mukteshwar in nainital.

मायानगरी मुंबई और नैनीताल जिले में स्थित भगवान शिव की नगरी मुक्तेश्वर में वैसे तो जमीन-आसमान का अंतर है, लेकिन कहा जाता है कि मुंबई का फैशन और मुक्तेश्वर का मौसम दिन भर में कई बार रूप बदलता है।

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एक नगरी समुद्र के तट पर है तो दूसरी समुद्र तल से 7500 फीट की ऊंचाई पर है। इसी तरह मौसम और मोहब्बत से जोड़कर फिल्म सिंदूर में आनंद बक्शी के लिखे गीत ‘पतझड़, सावन, बसंत, बहार एक बरस में मौसम चार, पांचवां मौसम प्यार का’ और यहां के मौसम में कुछ अंतर है।
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15 अगस्त आजादी के दिन यहां पांचों मौसम देखने को मिले। लोगों का कहना है कि सावन में लगातार कई दिन तक लगने वाली झड़ी अब नहीं लगती। बीते शनिवार और रविवार की छुट्टी होने से बरसात में भी यहां के कारोबारियों और लोगों के चेहरे पर जहां चमक दिखी।
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दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुड़गांव से आने वाले सैलानियों के लिए सेब के बगीचों में घूमना और उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले खास तरह के फूलों और देवदार के घने वन के बीच कुछ पल गुजारना सुकून देने वाला रहा।

प्रमुख पर्यटन स्थल चौली की जाली पहुंचकर कुदरत की गोद में अपनों के साथ सेल्फी लेकर सैलानियों ने खूब लुत्फ उठाया, लेकिन बार-बार नेटवर्क गायब होने से वे मोबाइल फोन के जरिए अपनों को संदेश नहीं दे पाए। बता दें कि इन वादियों से सटे इस खूबसूरत स्थल पर किसना, बाज बर्ड इन डेंजर, सिर्फ तुम और मासूम फिल्मों की शूटिंग यहां की गई है।

उन्हें तब मायूसी हाथ लगी जब वे आसमान छूती हिमालयी चोटी नंदादेवी (26645 फीट) के साथ-साथ त्रिसूल (23360 फीट), पंचाचूली (22650 फीट) आदि को नग्न आंखों से नहीं देख सके।

कभी धूप, कभी छांव, कभी बारिश तो कभी बादलों का आना-जाना इस कदर लगा रहा कि बर्फ से लदी धवल चोटियां देखना मुमकिन नहीं हो पाया। यहां कई जगहों पर बने हिमालय व्यू प्वाइंट अभी शो पीस बने हैं। बताया जाता है कि अक्टूबर-नवंबर से फरवरी-मार्च के बीच 450 किमी लंबी हिमालयी श्रृंखला यहां से साफ-साफ दिखती है।

मुक्तेश्वर में ये भी है खास

tourist place mukteshwar in nainital.

बताया जाता है कि शोध में मौसम की अनुकूलता के चलते ही ब्रिटिश शासनकाल में यहां 3000 एकड़ में इम्पीरियल बैक्टेरियोलॉजिकल लेबोरेट्री की स्थापना की गई, जिसका नाम बदलकर 1925 में इम्पीरियल इंस्टीट्यूट ऑफ वेटरीनरी रिसर्च रखा गया। आजादी के बाद इसका नाम इंडियन वेटरीनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट रखा गया।

उद्देश्य था कि पशुओं को संक्रामक बीमारियों से बचाकर उन्हें संरक्षित किया जाए। पर्वतीय पशुओं को संरक्षित करने और उनकी संख्या बढ़ाने की भी जिम्मेदारी दी गई, लेकिन स्थानीय लोग इस बात से दुखी हैं कि इतना बड़ा राष्ट्रीय संस्थान होते हुए भी उनके पशुओं का समय पर इलाज नहीं हो पाता और न ही जरूरत के मुताबिक दवाएं मिल पाती हैं।

उन्नत नस्ल की बकरियां पालना अब भी उनके लिए सपना ही है। दूसरी तरफ क्षेत्रवासी प्रकाश चंद सुयाल ने बताया कि आईवीआरआई की वजह से ही यहां की जैव विविधता और पर्यावरण सुरक्षित है। उनका कहना है कि शायद फल पट्टी में घट रहे पेड़-पौधे और तेजी से बन रहीं बहुमंजिली इमारतों की वजह से सावन की वो झड़ी अब नहीं लगती, जो लगातार कई दिनों तक बरसती थी।

कुमाऊं में फल पट्टी के नाम से मशहूर रामगढ़ से मुक्तेश्वर तक का इलाका, जिसे बाउल ऑफ फ्रूट भी कहते हैं। मौसम की मेहरबानी से इस बार सेब, नाशपाती, पुलम, आडू आदि खूब फले-फूले हैं। यहां कभी फ्रीज रखने की जरूरत नहीं पड़ती, पर इतनी बड़ी फल पट्टी और आलू उत्पादन का क्षेत्र होते हुए भी कोई कोल्ड स्टोर नहीं होने से बागवान मायूस हैं।

काश्तकार विशन सिंह बिष्ट और जीवन सिंह कार्की का कहना है कि कोल्ड स्टोर और सरकारी फल प्रसंस्करण उद्योग न होने से फलों और आलू को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ता है, जिससे कई बार उन्हें घाटा उठाना पड़ता है। अभी तक नेताओं ने कोरे वादे करने के अलावा कुछ नहीं किया है।

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