कैसे होगा विकास?: सरकार पर निर्भर निकाय, राजस्व बढ़ाने के लिए नहीं कर रहे उपाय, वेतन के भी पड़े लाले
पिछले पांच साल में सरकार ने तमाम नए निकाय बना दिए, लेकिन इन निकायों के पास अपनी कमाई का कोई मजबूत जरिया नहीं है।
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प्रदेश में आठ नगर निगम मिलाकर कुल निकायों की संख्या 92 पहुंच चुकी है लेकिन इनमें से तमाम नए निकाय ऐसे हैं जो कि सरकार की इमदाद पर ही निर्भर हैं। यहां कर्मचारी हैं लेकिन उनके पास कोई राजस्व बढ़ाने वाले काम नहीं हैं। हालात यह हैं कि उनके वेतन भी निकाय खुद नहीं दे पा रहे। निदेशालय स्तर से वेतन जारी करना पड़ रहा है।
शहरी सुख सुविधाएं देने के लिए पिछले पांच साल में सरकार ने तमाम नए निकाय बना दिए। देहरादून में सेलाकुई से लेकर रुड़की नगर निगम से हटाकर रामनगर नगर पंचायत, इमलीखेड़ा से लेकर अल्मोड़ा और नैनीताल जैसे स्थापित निकाय आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं। इन निकायों के पास अपनी कमाई का कोई मजबूत जरिया नहीं है।
टैक्स वसूली का कोई तरीका तय नहीं हो पाया है। हालात यह हो गए हैं कि निकायों के पास पैसा ही नहीं है। वह केवल कागजों में बतौर निकाय काम कर रहे हैं लेकिन अपने क्षेत्र में विकास या अन्य योजनाओं के नाम पर सरकार पर ही निर्भर हैं। नैनीताल और अल्मोड़ा जैसे निकायों को भी वेतन के लिए सरकार का मुंह देखना पड़ रहा है।
नगर पालिकाएं अपने स्तर से नहीं जुटा पा रहीं खर्च
पांचवें राज्य वित्त आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015-16 से 2019-20 तक पांच सालों में प्रदेश की कोई भी नगर पालिका परिषद अपनी आय से वेतन, पेंशन और कार्यालय व्यय सहित बाकी खर्च नहीं उठा पाई। नैनीताल, मुनिकी रेती को तो पैसा देने के बाद भी घाटे में थी। टनकपुर और विकासनगर के सिर पर भी कर्ज था। कर्णप्रयाग की अपनी आय 70 लाख थी जो कि 2019-20 में घटकर 36.65 लाख रह गई। 2018-19 में मसूरी की आय 7.38 करोड़ थी जो कि 2019-20 में घटकर 5.03 करोड़ रह गई। नैनीताल की 2016-17 में आय 8.04 करोड़ थी जो कि 2019-20 में घटकर 5.42 करोड़ रह गई। रामनगर की 2015-16 में आय दो करोड़ थी जो कि 2018-19 में 96 लाख रह गई। श्रीनगर की आय एक करोड़ से घटकर 68 लाख रह गई।
सरकार की इमदाद से चल रहे निकाय
राज्य वित्त आयोग से इन निकायों की जान बची हुई है। 2015-16 में आयोग से सभी निकायों को 125.19 करोड़ जारी हुआ था जो कि 2019-20 में बढ़कर 263.54 करोड़ हो गया। जबकि रिपोर्ट में स्पष्ट है कि नगर पालिकाओं की कर प्राप्तियां 2015-16 में 9.59 करोड़ से 2019-20 में बढ़कर 9.61 करोड़ ही हुई।
नगर पंचातयों के बुरे हाल
ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बनने वाले निकायों के हालात तो सबसे बदतर हैं। इन नगर पंचायतों में शामिल होने वालों को शुरू में टैक्स में छूट दी जाती है। बाद में इनमें टैक्स वसूली की प्रक्रिया ही स्पष्ट नहीं हो पाती। पंचम वित्त आयोग भी अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कर चुका है कि सबसे ज्यादा शिकायतें नगर पंचायतों की हैं, जो पूरी तरह से सरकार की मदद पर ही निर्भर हैं।
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पैसा नहीं तो कैसे बनेंगे शहरी
सवाल यह है कि जिन गांवों, कस्बों को निकायों के रूप में परिवर्तित किया गया है, वहां पैसा न होने पर विकास कैसे होगा? लोगों को शहरों जैसी सुख-सुविधाएं कैसे मिलेंगी।