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वो तीन दिन: जब केदारनाथ में आई थी मौत की लहर

Mon, 16 Jun 2014 01:11 AM IST
संदीप थपलियाल/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
संदीप थपलियाल/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग Updated Mon, 16 Jun 2014 01:11 AM IST
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three days of kedarnath disaster

उत्तराखंड में 15 जून 2013 से जो बारिश शुरू हुई, उसने तीन दिन में जो कहर बरपाया, वो भुलाया नहीं जा सकेगा। 15 जून 2013 से जो बारिश शुरू हुई, उसने थमने का नाम ही नहीं लिया। नदियां जब अपने जल स्तर से उफान मारने लगीं, तो रास्त टूटने लगे। 16 जून की सुबह से ही लगने लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ होने वाला है।

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हालांकि रुद्रप्रयाग जिला पहले भी कई बार आपदा की मार झेल चुका है लेकिन इतनी बड़ी गड़बड़ हो जाएगी, किसी को अंदेशा नहीं था।

अगले तीन दिन स्थानीय निवासियों, तीर्थयात्रियों और प्रशासन पर इतने भारी पड़े कि केदारनाथ जलप्रलय के नाम से इतिहास बन गया। हजारों लोग असमय मौत के मुंह में समा गए।
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केदारनाथ से लेकर रुद्रप्रयाग तक नदियों में आई बाढ़ ने पूरा भूगोल बदल दिया। सैकड़ों लोग बेघर हो गए, तो हजारों यात्री केदारघाटी में कई दिन तक फंसे रह गए।

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नदी में मलबे के साथ बहने लगीं ज‌िंदग‌ियां

three days of kedarnath disaster

16 जून से अतिवृष्टि के कारण अलकनंदा और मंदाकिनी नदी के प्रवाह ने रौद्र रुप ले लिया। नदी में बहते पेड़, जानवर और गैस सिलेंडर अतिवृष्टि की कहानी बयां करने लगे।

शाम होते-होते मंदाकिनी नदी खतरे के निशान को पार कर गई। नदी में अचानक हजारों गैलन (पानी मापने की मात्रा) पानी बढ़ गया। केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कुंड में बारिश होने से पूर्व मात्र 60 क्यूसेक (क्यूबिक फीट प्रति सेकेंड) पानी बह रहा था।

15 जून को हल्की बारिश से पानी 120 क्यूसेक हो गया लेकिन 16 जून को भारी बारिश से पानी की मात्रा में 10 गुना से अधिक वृद्धि हो गई। कुंड में पानी की मात्रा 1400 क्यूसेक पर पहुंच गई।

रुद्रप्रयाग संगम स्थल पर सीडब्लूसी (केंद्रीय जल आयोग) के साइन बोर्ड के अनुसार, पांच सितंबर 1985 को मंदाकिनी का जल स्तर सर्वाधिक 628.4 मीटर तक पहुंचा था। 16 जून को यह रिकार्ड भी टूट गया।

इसके बाद तो जल स्तर मापने वाले स्थान ही बह गए। नदियों का जल स्तर देख जिला प्रशासन ने नदी किनारे के घरों को खाली करने के निर्देश देते हुए प्रभावितों को स्कूलों में शिफ्ट करना शुरू कर दिया। 16 जून के दिन से नदियों में बने झूला पुल भी टूटने लगे।

रामबाड़ा में सैकड़ों को बहा ले गई मंदाकिनी

three days of kedarnath disaster

खतरा भांप प्रशासन ने हाई अलर्ट घोषित कर दिया। तीर्थयात्रियों से सुरक्षित स्थानों में रुकने की अपील की है। ऋषिकेश पुलिस बैरियर को यात्रा रोकने के लिए कह दिया गया।

केदारनाथ में भारी बारिश से स्थिति बिगडऩे लगी। तीर्थयात्री मौसम खुलने के इंतजार में रुकने लगे। लेकिन होनी को कुछ और इंतजार था। केदारनाथ पैदल मार्ग पर भीमबली और रामबाड़ा में मंदाकिनी नदी और गदेरों के बहाव में दुकानें बहने लगी।

भूस्खलन से रामबाड़ा का नामोनिशान मिट गया। जो लोग समय पर पैदल मार्ग छोड़कर पहाड़ी पर चढ़ गए, वह बच गए। लेकिन इनमें से कईयों ने भूख-प्यास और हाइपोथर्मिया से दम तोड़ दिया। सैकड़ों लोग बाढ़ में बह गए।

गौरीकुंड में मंदाकिनी नदी का जल स्तर इतना बढ़ गया कि घोड़ा पड़ाव के समीप टापू की स्थिति बन गई। आईटीबीपी और पुलिस की रेसक्यू टीम ने यहां फंसे 35 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया।

गौरीकुंड पार्किंग में खड़े वाहन बहने लगे। 16 जून की रात केदारनाथ धाम में मंदाकिनी और सरस्वती नदी सहित अन्य छोटी-बड़ी नदियां पूरे ऊफान में आने से तबाही मचाने लगी।

केदारनाथ बन गया मौत का टापू

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रात में ही सवा आठ बजे केदारनाथ मंदिर के पीछे शंकराचार्य समाधि स्थल, लंगर सहित अन्य धर्मशालाएं बाढ़ में आए मलबे से ध्वस्त हो गई जिसमें कई लोगों की जान चली गई।

लोगों ने केदारनाथ मंदिर में भागकर जान बचाई लेकिन यहां भी मुसीबत से पीछा नहीं छूटा। 17 जून की सुबह लगभग सात बजे धाम में जमा सैकड़ों लोगों ने ऊपर से पानी के सैलाब को आते देखा। इसके बाद लोग जान बचाने इधर-उधर भागने लगे।

कुछ लोग पहाडिय़ों पर चढ़ गए तो कुछ भवनों की छत में चढ़ गए। मंदिर के चारों ओर स्थित भवन मलबे में दब गए। केदारनाथ की स्थिति टापू की बन गई। भवनों पर चढ़े लोग पानी में बहने लगे।

केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड में कनेक्टिविटी की दिक्कत के कारण वास्तविक स्थिति का अंदाजा नहीं लग पा रहा था। सेना और आईटीबी की टीम आगे नहीं बढ़ पा रही थी।

16 जून से मीडियाकर्मियों, पुलिस प्रशासन के फोन लगातार बजने लगे। कोई यात्री अपने रिश्तेदारों को बचाने की गुहार लगाता। तो कोई स्थानीय व्यक्ति अपने परिजनों के घर छोड़कर जगलों में जाने की बात कहकर बच्चों के लिए दूध-ब्रेड का इंतजाम करने का अनुरोध करता।

जब पायलट ने देखा नजारा तो उड़े होश

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17 जून की शाम चार बजे केदारनाथ में कुछ देर मौसम ठीक होने पर निजी एवीएशन कंपनी के पायलट ने उड़ान भरने का साहस किया लेकिन जब उसने रामबाड़ा की स्थिति देखी, तो वापस लौट आया।

उसी ने सूचना दी कि केदारनाथ में बहुत बड़ा हादसा हो गया। इसके बाद हवा में चल रहे शासन ने गंभीरता दिखाई। सेना, एनडीआरएफ, एअर फोर्स और आईटीबीपी की मदद ली गई।

18 जून की सुबह से लोगों को निकालने और फूड पैकेट्स गिराने का काम प्रारंभ हो गया। रुद्रप्रयाग से हेलीकॉप्टर से सेना के जवान खाद्यान्न लेकर केदारनाथ को रवाना कर दिए गए। वहीं गौरी गांव, जंगलचट्टी के ऊपर, मुंडकटिया और केदारनाथ में तीन दिनों से बारिश में भीगे भूखे-प्यासे लोगों का धैर्य चूकने लगा।

आसमान से गुजरते हुए हेलीकॉप्टर को देखते हुए उनको लगता कि शायद वह मददगार उन्हें लेने आए हैं लेकिन हेलीकॉप्टर सीधे उड़ जाते। हेलीकॉप्टर से खाने की सामग्री भी गिराई जाती लेकिन वह सही जगह नहीं पहुंच पाती।

स्थानीय लोगों ने खाना खिलाकर ‌रखा जिंदा

three days of kedarnath disaster

चंद्रापुरी, अगस्त्यमुनि, केदारनाथ, गौरीकुंड, जंगलचट्टी आदि स्थानों पर फंसे हुए लोगों को निकालने में हो रही देरी होने से उनके सगे संबंधियों का सब्र जवाब देने लगा।

१८ जून की शाम तक फंसे हुए लोगों को फाटा, रुद्रप्रयाग और गुप्तकाशी पहुंचाया जाने लगा। केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग के ध्वस्त होने से लोगों को मयाली-गुप्तकाशी मोटर मार्ग से बाहर निकाला जाने लगा।

जंगलों में फंसे लोग चल-फिरने में थोड़ा बहुत सक्षम थे, वह किसी तरह भूखे प्यासे नदी में गिराई गई लकडिय़ों को पकड़-पकड़कर सुरक्षित स्थानों में पहुंच पाए।

ऐसे में त्रियुगीनारायण, गौरीगांव, गुप्तकाशी समेत अन्य स्थानों में स्थानीय लोग आपदा से बचकर आए लोगों के लिए मददगार साबित हुए। महिलाओं ने भूखे यात्रियों को रोटी बनाकर खिलाई, तो पुरुषों ने अन्य व्यवस्था की।

...तो कम हो सकता था नुकसान

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16 से 18 जून 2013 के तीन दिन हमें बहुत कुछ सबक दे गए। भले ही प्राकृतिक आपदा पर किसी का वश नहीं है लेकिन इसके नुकसान को कम किया जा सकता है।

आपदा के वक्त शासन-प्रशासन का कोई तालमेल नहीं दिखा। लोगों तक सही जानकारी पहुंचाने में शासन असफल रहा। आपदा में बच गए, जो लोग बचाए जा सकते थे, वो बच सकते थे।

जंगलों में पहुंचे मासूम बच्चों ने कोई मदद नहीं मिलने पर दम तोड़ा। इन पहाडिय़ों पर बचाव दलों को उतारा जा सकता था। भले ही ऐसी आपदा सदियों में आती हो, लेकिन बहुत कुछ ऐसा था, जो मानव के हाथ में था। वह भी नहीं किया जा सका।

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