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Dehradun News: बरसात का मौसम जंगल और नदियों के पास बसे गांवों के अस्तित्व पर संकट

Mon, 22 Jul 2024 05:41 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Mon, 22 Jul 2024 05:41 AM IST
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The rainy season is a threat to the existence of villages located near forests and rivers
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IIसैकड़ों बीघा जमीन हो चुकी दरियाबुर्द, साल-दर-साल घर मकानों को भी काफी नुकसान
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Iकालसी वन प्रभाग की तिमली रेंज के संरक्षित वन क्षेत्र और शिवालिक की पहाड़ियों की तलहटी में बसे गांव बरसात के मौसम में आपदा के मुहाने पर होते हैं। जंगल क्षेत्र से निकलने वाला पानी, पत्थर व मलबा इन्हीं गांवों से होते हुए आसन और यमुना तक पहुंचता है। तेज बहाव के साथ आने वाला मलबा और पानी क्षेत्र में भारी तबाही का कारण भी बनता है। साल-दर-साल गांवों पर टूटने वाला आपदा का कहर अब तक कई सौ बीघा जमीन का दरियाबुर्द कर चुका है। मलबा बड़ी संख्या में घर-मकानों को अपना निशाना बना चुका है। इस प्रकार की स्थिति में बरसात का मौसम गांवों के अस्तित्व पर हर साल खतरा बनता रहा है।
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Iग्राम कुंजाग्रांट, कुंजा, मटकमाजरी, कुल्हाल, आदुवाला समेत कई गांवों के लिए बरसात का मौसम बेहद घातक साबित होता है। लगभग 8000-10000 की आबादी वाले इस ग्रामीण क्षेत्र में हर साल बरसात के पानी से बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। ग्रामीण क्षेत्र की सड़कें, घर-मकान, स्कूल, नालों के पुश्ते और व्यापक स्तर पर कृषि भूमि को नुकसान पहुंचता है। ग्रामीण क्षेत्र के ऊंचाई वाले किनारे पर स्थित शिवालिक की पहाड़ियों और संरक्षित वन क्षेत्र से बांसवाला, राजूवाला, पथरौली, कोठवाला, जामुनवाला आदि नाले घनी आबादी के बीच से होकर गांवों के दूसरे किनारे पर स्थित आसन और यमुना नदी में गिरते हैं। बरसात के दिनों में नालों में बहकर आने वाला मलबा और पानी ओवरफ्लो होकर नुकसान का कारण बनता है।
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Iगांवों के दूसरे सिरे पर यमुना और आसन नदियों का बढ़ने वाला जलस्तर ग्रामीणों की कृषि भूमि पर कहर बनकर टूटता है। हर साल कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा दरियाबुर्द हो जाता है। आसन बैराज की ईको समिति के अध्यक्ष व कुंजाग्रांट के पूर्व प्रधान मोहम्मद आरिफ का कहना है ‘बरसात के दिनों में होने वाले नुकसान को रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर से योजना बनाकर काम किया जाना चाहिए। अन्यथा, किसी भी दिन प्राकृतिक आपदा का कहर गांवों के अस्तित्व को समाप्त कर सकता है।’ संवाद
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I14 साल पहले हुई थी तबाही
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Iबरसाती नालों में आने वाला मलबा और तेज बहाव का पानी 14 साल पहले मटक माजरी में तबाही मचा चुका है। वर्ष 2010 के बरसात के मौसम में जंगल से निकलने वाले एक नाले के पानी ने बीस घरों को अपने साथ बहा लिया था। इनमें रहने वाले परिवारों को छह महीने तक प्रशासन के बनाए शिविरों में शरण लेनी पड़ी थी। इसी क्रम में पिछले साल बरसात में जंगल से आने वाले पानी और मलबे ने कुंजाग्रांट गांव में आठ घरों को व्यापक स्तर पर नुकसान पहुंचाया था। ग्राम पंचायत कुल्हाल के प्रधान मोहम्मद सलीम, कुंजा के पूर्व प्रधान मोहम्मद गालिब ने बताया आपदा के समय में मौके पर आने वाले अधिकारी नालों की मरम्मत, निर्माण आदि की बात करते हैं लेकिन इसके बाद मौके पर इस प्रकार का कोई कार्य नहीं किया जाता है। संवाद

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Iग्राम कुंजाग्रांट, कुंजा व मटकमाजरी आदि की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए वन विभाग, सिचाई विभाग, लोक निर्माण विभाग, पंचायत राज विभाग के अधिकारियों से जानकारी करके आबादी व कृषि भूमि को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। - विनोद कुमार, एसडीएम, विकासनगर।I
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