फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   the natives of Uttarakhand

केवल ये लोग होंगे उत्तराखंड के मूल निवासी

Tue, 04 Mar 2014 10:46 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 04 Mar 2014 10:46 AM IST
विज्ञापन
the natives of Uttarakhand

वर्ष 1985 से उत्तराखंड प्रदेश की सीमा के भीतर वास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्थाई निवास व जाति प्रमाण पत्र पाने का हकदार होगा।

विज्ञापन


पढ़ें, कैलास मानसरोवर यात्रा के बारे में जानें सबकुछ

इस मामले में सुनवाई के दौरान एक याचिका को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले को बहाल रखा।

उच्च न्यायालय नैनीताल के निर्णय को चुनौती

the natives of Uttarakhand

जस्टिस सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय व जस्टिस कुरियन जोसफ की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान देहरादून निवासी रविंद्र जुगरान की उस याचिका को खारिज कर दिया।

पढ़ें, अब जाकर रामनगर में शांत हुई फेसबुक की 'आग'

जिसमें उच्च न्यायालय नैनीताल के निर्णय को चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने मूल निवास, स्थाई निवास व जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए हर उस व्यक्ति को पात्र माना जो 1985 से उत्तराखंड राज्य (राज्य का गठन 2000 में हुआ) में निवास कर रहा है।

पढ़ें, 'गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाने की ओर बढ़े रावत'

रविंद्र जुगरान ने उच्च न्यायालय केइस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को इसलिए भी खारिज कर दिया क्योंकि इसी विषय की एक याचिका पहले भी खारिज हो चुकी है।

विज्ञापन
विज्ञापन

यह है मामले की पृष्ठभूमि

the natives of Uttarakhand

- 17 अगस्त 2012 को नैनीताल उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जो व्यक्ति राज्य गठन के समय नौं नवम्बर 2000 से निवास कर रहा है उसे मूल, स्थाई निवास के साथ ही जाति प्रमाण पत्र पाने का अधिकार है।

पढ़ें, अब जाकर रामनगर में शांत हुई फेसबुक की 'आग'

- 25.05.2013 को उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने एकल पीठ के इस निर्णय में बदलाव करते कट-आफ-डेट केरूप में वर्ष 1985 को समय सीमा माना।

पढ़ें, 'गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाने की ओर बढ़े रावत'

- याचिकाकर्ता ने सितम्बर 2013 में उच्च न्यायालय के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।
- 03 मार्च 2014 को सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय नैनीताल के निर्णय को बहाल रखा।

पढ़ें, 'आपदा के दौरान बाप-बेटे का नहीं था': जनरल चैत

मुझे आज काफी उम्मीद थी लेकिन निर्णय मेरे विषय के अनुकूल नहीं आ सका। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ मैं रिव्यू दाखिल करुंगा।
- रविंद्र जुगरान, याचिकाकर्ता

विज्ञापन

40 फीसदी आबादी वंचित थी अभी तक

the natives of Uttarakhand

उत्तराखंड के नैनीताल व देहरादून जिले के मैदानी भाग और हरिद्वार व ऊधमसिंहनगर जिले में प्रमाण पत्र नहीं बनाए जा रहे थे।

पढ़ें, अब जाकर रामनगर में शांत हुई फेसबुक की 'आग'

क्योंकि इस बात का दबाव था कि जो व्यक्ति 1950 से राज्य में रह रहा है उसे ही यह हक मिले। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद चार मैदानी जिलों में वास करने वाली राज्य की लगभग 40 फीसदी आबादी को इसका लाभ मिलेगा।

पढ़ें, 'गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाने की ओर बढ़े रावत'

अब वह हर व्यक्ति उपरोक्त प्रमाण पत्रों को पाने का हकदार होगा जो कि 1985 से वर्तमान उत्तराखंड राज्य की भौगोलिक सीमाओं के भीतर निवास कर रहा है।

पढ़ें, 'आपदा के दौरान बाप-बेटे का नहीं था': जनरल चैत

इन्हें सरकारी नौकरी व शिक्षण संस्थाओं में दाखिले के लिए इन प्रमाण पत्रों से लाभ मिलेगा। जिससे अभी तक ये लोग वंचित थे।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed