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Dehradun News: स्टोर में एलाइजा मशीन, रैपिड जांच से खानापूर्ति
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उप जिला अस्पताल : रैपिड जांच में अब तक मिले 102 पॉजिटिव
एलाइजा जांच न होने से सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हुए मामले
उप जिला अस्पताल में करीब एक साल से एलाइजा मशीन पैथोलॉजी विभाग के स्टोर रूम रखी है। वहींं जांच के लिए प्रयोग होने वाला रिएजेंट भी खराब हो चुका है। डेंगू के संदिग्ध लक्षण वाले मरीजों की केवल रैपिड जांच की जा रही है। रैपिड जांच के मामले सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हो रहे हैं।
शनिवार को अस्पताल में मामले की पड़ताल के दौरान बड़ा खुलासा हुआ। अस्पताल को करीब एक साल पहले एलाइजा मशीन मिली थी। एलाइजा मशीन की टेस्टिंग हुई और इससे कुछ जांचें भी की गई है, लेकिन इसके बाद मशीन को पैथोलॉजी विभाग के स्टोर रूम के एक पेटी में बंद कर रख दिया गया।
एलाइजा जांच में उपयोग होने वाले रिएजेंट की बोतल खुलने के बाद उसको निर्धारित समय पर उपयोग करना होता है। लंबे समय से प्रयोग न होने के चलते रिएजेंट खराब हो गया है। अस्पताल प्रशासन कभी तकनीकी कमी तो कभी लैब तकनीशियन के टोटे का हवाला देकर एलाइजा जांच से अपना पल्ला झाड़ रहा है।
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रैपिड जांच में मरीज की मौत तो नहीं होती दर्ज
स्वास्थ्य विभाग रैपिड जांच को डेंगू की पुष्टि नहीं मानता है। रैपिड पॉजिटिव विभाग की नजर में केवल डेंगू संदिग्ध मरीज होते हैं। केवल एलाइजा जांच में पॉजिटिव आने वाले मरीज को ही सरकारी आंकड़ों में दर्ज किया जाता है। ऐसे में संदिग्ध मरीजों की मौत हो जाए तो सरकारी आंकड़ों में वह दर्ज नहीं होती है। यही कारण है डेंगू से हकीकत में हुई मौतों और सरकारी आंकड़ों में जमीन आसमान का अंतर होता है।
छोटे अस्पतालों में केवल रैपिड जांच
उप जिला अस्पताल विकासनगर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कालसी, सीएचसी साहिया और सीएचसी चकराता में मरीजों की केवल रैपिड जांच होती है। कई बार संक्रमण कम न होने और अन्य दिक्कतों के चलते मरीज देहरादून के अस्पतालों में उपचार के लिए पहुंचते हैं। इसके बाद मामले देहरादून में ही रिपोर्ट होते हैं। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर केवल रैपिड जांच के आंकड़े हैं, जो स्वास्थ्य विभाग की नजर में संदिग्ध मरीज हैं।
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एलाइजा जांच न होने से सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हुए मामले
उप जिला अस्पताल में करीब एक साल से एलाइजा मशीन पैथोलॉजी विभाग के स्टोर रूम रखी है। वहींं जांच के लिए प्रयोग होने वाला रिएजेंट भी खराब हो चुका है। डेंगू के संदिग्ध लक्षण वाले मरीजों की केवल रैपिड जांच की जा रही है। रैपिड जांच के मामले सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हो रहे हैं।
शनिवार को अस्पताल में मामले की पड़ताल के दौरान बड़ा खुलासा हुआ। अस्पताल को करीब एक साल पहले एलाइजा मशीन मिली थी। एलाइजा मशीन की टेस्टिंग हुई और इससे कुछ जांचें भी की गई है, लेकिन इसके बाद मशीन को पैथोलॉजी विभाग के स्टोर रूम के एक पेटी में बंद कर रख दिया गया।
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एलाइजा जांच में उपयोग होने वाले रिएजेंट की बोतल खुलने के बाद उसको निर्धारित समय पर उपयोग करना होता है। लंबे समय से प्रयोग न होने के चलते रिएजेंट खराब हो गया है। अस्पताल प्रशासन कभी तकनीकी कमी तो कभी लैब तकनीशियन के टोटे का हवाला देकर एलाइजा जांच से अपना पल्ला झाड़ रहा है।
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रैपिड जांच में मरीज की मौत तो नहीं होती दर्ज
स्वास्थ्य विभाग रैपिड जांच को डेंगू की पुष्टि नहीं मानता है। रैपिड पॉजिटिव विभाग की नजर में केवल डेंगू संदिग्ध मरीज होते हैं। केवल एलाइजा जांच में पॉजिटिव आने वाले मरीज को ही सरकारी आंकड़ों में दर्ज किया जाता है। ऐसे में संदिग्ध मरीजों की मौत हो जाए तो सरकारी आंकड़ों में वह दर्ज नहीं होती है। यही कारण है डेंगू से हकीकत में हुई मौतों और सरकारी आंकड़ों में जमीन आसमान का अंतर होता है।
छोटे अस्पतालों में केवल रैपिड जांच
उप जिला अस्पताल विकासनगर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कालसी, सीएचसी साहिया और सीएचसी चकराता में मरीजों की केवल रैपिड जांच होती है। कई बार संक्रमण कम न होने और अन्य दिक्कतों के चलते मरीज देहरादून के अस्पतालों में उपचार के लिए पहुंचते हैं। इसके बाद मामले देहरादून में ही रिपोर्ट होते हैं। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर केवल रैपिड जांच के आंकड़े हैं, जो स्वास्थ्य विभाग की नजर में संदिग्ध मरीज हैं।