गजब: यहां एमपी-एमएलए चुन सकते हैं, लेकिन प्रधान नहीं!
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टिहरी बांध निर्माण के चलते विस्थापित सैकड़ों परिवार भूमिधरी अधिकार से वंचित हैं। टिहरी झील में न केवल इनके बसे बसाये गांव डूबे, बल्कि अपनी पंचायत चुनने का अधिकार भी डूब गया। यह लोग सांसद और विधायक तो चुन सकते हैं, लेकिन अपना ग्राम प्रधान चुनने का अधिकार इन्हें नहीं है।
करीब डेढ़ दशक से तकरीबन तीन हजार परिवार हक के लिए लड़ रहे हैं। अब मुख्य सचिव ने 23 फरवरी को तमाम पत्रावलियों सहित सचिव राजस्व के साथ हरिद्वार और देहरादून के जिलाधिकारियों की बैठक बुलाई है।
देश को रोशन करने की खातिर अपनी जड़ों से दूर हुए टिहरी बांध के विस्थापित खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं। ऋषिकेश, पशुलोक और हरिद्वार के पथरी क्षेत्र के करीब पांच हजार से अधिक परिवारों को भूमिधरी अधिकार नहीं मिले हैं।
पथरी क्षेत्र के गांव तो राजस्व में आ गए, लेकिन, ऋषिकेश और पशुलोक क्षेत्र के दर्जनों गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं मिल पाया है। इसमें मालीदेवल, गोदी सिराई, बिरानी गांव, उप्पु, डोगरा, असीना, लम्पुगड़ी आदि गांव शामिल हैं। इन गांवों में करीब 20 हजार से अधिक की आबादी रहती है।
दूसरी ग्रामसभाओं के सहारे कर रहे काम
राजस्व ग्राम न होने से विस्थापित लोग ग्राम प्रधान या दूसरे पंचायत प्रतिनिधि नहीं चुन सकते। विकास कार्यों के लिए दूसरी ग्राम सभाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रभावितों का कहना है कि बजट के संबंध में दूसरी ग्राम सभाओं की भी समस्याएं होती हैं। जिस पर इन ग्राम सभाओं से विस्थापित क्षेत्र के विकास कार्य संभव नहीं होते। सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का उन्हें फायदा नहीं मिल पाता। भूमिधरी अधिकार न होने की वजह से जमीन पर बैंक से लोन नहीं मिलता है।
करीब 15 साल पूर्व हमें पशुलोक, श्यामपुर आदि स्थानों पर विस्थापित किया गया। राजस्व ग्राम और भूमिधरी अधिकार के लिए सरकारों से सिर्फ आश्वासन मिल रहा है। इससे सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
-हरी सिंह भंडारी, अध्यक्ष विस्थापित समन्वय विकास समिति पशुलोक
टिहरी बांध विस्थापितों और प्रभावितों के हितों की घोर अनदेखी हो रही है। राजनेता और अफसर सिर्फ आश्वासन दे रहे हैं। इस संबंध में राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी शिकायत पर संज्ञान लिया है।
-दिनेश डोभाल, अध्यक्ष टिहरी बांध प्रभावित पुनर्वासित जन संयुक्त समिति