काश इनके जैसा हो हर शिक्षक, सरकारी स्कूल को बनाया मिसाल
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राजधानी के जूनियर हाईस्कूल देहरा के प्रधानाध्यापक हुकुम सिंह बगैर किसी सरकारी मदद के गरीब और अनाथ बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय चला रहे हैं। खास बात यह है कि प्रदेश में सरकारी स्कूलों में जहां हर साल छात्रों की संख्या घट रही है और साढ़े चार हजार स्कूल बंदी की कगार पर हैं।
वहीं, इनके विद्यालय में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। शिक्षक हुकुम सिंह की जिद ही थी, जो बंदी की कगार पर पहुंच चुका स्कूल आज फिर खिलखिला रहा है।
दून के सबसे पुराने विद्यालयों में से एक राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय देहरा में वर्ष 2008 में 16 छात्र पंजीकृत थे, लेकिन मुश्किल से पांच छात्र स्कूल आते थे। घटती छात्र संख्या के चलते स्कूल बंदी की कगार पर था।
अपने वेतन और लोगों के सहयोग से उठा रहे खर्च
उन्होंने जर्जर हाल हो चुके स्कूल के लिए सरकार का मुंह ताके बगैर जनता से सहयोग लिया और इसे आवासीय विद्यालय के रूप में संचालित किया। अब उनके इस आवासीय विद्यालय में अनाथ, गरीब एवं स्कूल से बाहर रह गए 162 बच्चे अध्ययनरत हैं।
इस स्कूल के शिक्षकों का वेतन शिक्षा विभाग देता है, लेकिन आवासीय विद्यालय पर जो खर्च आता है, उसका वहन शिक्षक हुकुम सिंह अपने वेतन एवं कुछ अन्य लोगों के सहयोग से उठा रहे हैं।
दून का सबसे पुराना विद्यालय
दून के सबसे पुराने विद्यालयों में से एक राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय देहरा की स्थापना वर्ष 1816 में तहसील मिडिल स्कूल के नाम से पलटन बाजार में हुई। जहां वर्तमान में कोतवाली है। 1953 में यह स्कूल राजपुर रोड में स्थानांतरित किया गया।
इनका मिला सहयोग
स्कूल संचालन के लिए पूर्व उपजिलाधिकारी रमेश चंद्र तिवाड़ी, आसरा ट्रस्ट, डायट की शिक्षिका संगीता कुकरेती, सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी तेजेंद्र सोडी, र्साइं कृपा समिति आदि स्थानीय लोगों एवं संस्थाओं ने सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया।
जब मैं इस स्कूल में आया था, मेरे सामने जर्जर हाल स्कूल भवन और घटती छात्र संख्या चुनौती थी। मैंने इसे स्वीकारते हुए कुछ लोगों की मदद से स्कूल को आवासीय विद्यालय के रूप में संचालित करने का निर्णय लिया।
-हुकुम सिंह उनियाल, शिक्षक