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संविधान पर हमला बर्दाश्त नहीं

Wed, 26 Feb 2020 01:27 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Wed, 26 Feb 2020 01:27 AM IST
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Suggestion letter sent to the President on NRC, CAA and NPR
प्रेस क्लब में पत्रकारों से वार्ता करते हुए एसएस पांगती ।
प्रदेश के बुद्धिजीवी, लेखक, सेवानिवृत्त अधिकारियों ने मंगलवार को राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) व नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर पत्रकार वार्ता की, जिसमें उन्होंने कहा कि संविधान पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने एनआरसी और एनपीआर को लेकर अपने सुझाव भेजे।
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प्रेस क्लब में आयोजित प्रेसवार्ता में सेवानिवृत्त आईएएस एसएस पांगती ने कहा कि देश में वर्ष 1955 में ही नागरिकता संबंधी एक्ट बन गया था। जो 2003 में संशोधित हुआ। सरकार ने जल्दबाजी में एनआरसी लागू कर दिया जबकि उसे पहले इस पर होमवर्क करना चाहिए था।
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इस दौरान सेवानिवृत्त आईएएस चंद्र सिंह, शिक्षाविद डॉ. एसके कुलश्रेष्ठ, डॉ. एनएन पांडेय, इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक, साहित्यकार वीरेन पैन्यूली, डॉ. सुभाष पंत आदि ने भी विचार रखे।
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राष्ट्रपति को भेजे सुझाव पत्र के बिंदु
- नागरिकता नियमावली के अनुसार एनपीआर पहले बनेगा, उसी के आधार पर एनआरसी बनाया जाएगा।
- सीएए के कुछ प्रावधान धर्म के आधार पर विवेधकारी हैं, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
- एनपीआर के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान किसी भी व्यक्ति की नागरिकता पर कोई भी अधिकारी या कर्मचारी अस्पष्ट के आधार पर आपत्ति लगा सकता है।
- एनपीआर के चलते जब इसका कार्य चलेगा तो लोगों को घंटों लाइन में लगकर रजिस्ट्रेशन कराना पड़ेगा।
- मूल नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत नागरिकता पंजीयन के लिए व्यक्ति को कोई भी प्रार्थना पत्र देने की जरूरत नहीं होती।
- प्रधानमंत्री ने कहा कि इस पर कोई चर्चा नहीं हुई, जबकि गृहमंत्री ने बयान दिया कि एनआरसी पूरे देश में लागू होगा। ऐसे में एनपीआर और एनआरसी की प्रक्रिया को रद किया जाना चाहिए।
- यह देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए घातक है।
- नागरिकता संशोधन अधिनियम कुछ समुदायों की नागरिकता को बचाने के लिए लाया जा रहा है, यह सोच संविधान और जनविरोधी है।
- शरणार्थियों के लिए निष्पक्ष कानून बने, लेकिन उनके नाम पर धार्मिक भेदभाव करना गलत है।
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