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भारतीय टीम की उपेक्षा देख भर आई आंखें
अंशुल डांगी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 02 Mar 2014 01:30 PM IST
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न कोई पूछने वाला और न कोई बताने वाला। दुनियाभर से जुटे खिलाड़ियों के बीच हम अनजान से घूम रहे थे।
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जैसे बिना बुलाए वहां चले गए हों
हाथों में तिरंगा थामे बिना हमने रूस के सोचि में आयोजित विंटर ओलंपिक में भाग तो लिया, लेकिन लगा जैसे बिना बुलाए वहां चले गए हों। यह कहना था सेना के खिलाड़ी नदीम इकबाल का।
औली में सीनियर पुरुष वर्ग की 15 किमी फ्री स्टाइल क्रॉस कंट्री में थककर चूर होने के बावजूद रजत जीतने वाले नदीम ने बताया कि यहां गोल्ड न जीतने का गम तो है, लेकिन यह सोचि ओलंपिक से कहीं कम है।
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जम्मू के राजौरी निवासी नदीम ने बताया कि फरवरी में संपन्न ओलंपिक में वह फ्री स्टाइल वर्ग में प्रतिभाग के लिए गए थे, लेकिन उन्हें क्लासिक वर्ग में डाल दिया गया। इससे उनका प्रदर्शन ठीक नहीं रहा।
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भारतीय टीम की उपेक्षा
एशियन चैंपियनशिप 2011 और वर्ल्ड स्की चैंपियनशिप 2012 में प्रतिभाग कर चुके नदीम ने बताया कि भारत में ही प्रतिभागी भारतीय टीम की उपेक्षा शुरू हो गई थी।
इंडियन ओलंपिक फेडरेशन के बाहर होने के कारण स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की मदद से वे ओलंपिक में चले तो गए, लेकिन वहां देश के तौर नहीं बल्कि व्यक्तिगत खिलाड़ी के तौर पर उन्हें मौका दिया गया। ऐसे में किसी ने मदद भी नहीं की।
16 फरवरी को फ्लैग सेरेमनी हुई तो वहां प्रतिभागी दूसरे देशों के झंडे फहराए गए, लेकिन टीम होने के बावजूद भारतीय तिरंगा गायब देख बहुत दर्द हुआ। नदीम ने बताया कि बाकी सभी देशों को वालंटियर दिए गए, लेकिन भारतीय टीम को नहीं।
इससे स्पर्धा की जानकारी के लिए खिलाड़ियों को खुद दौड़भाग करनी पड़ी। टीम के साथ मैनेजर भी नहीं थे, सिर्फ कोच ताशी लुंडुप साथ रहे।
भत्ते में भी 30 फीसदी कटौती
नदीम ने बताया कि विंटर गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया को सरकार से पैसा मिला था, लेकिन फेडरेशन ने खिलाड़ियों को उपकरणों के लिए एक पैसा नहीं दिया। बताया कि ओलंपिक में उन्हें अपनी जेब से एक लाख से अधिक रकम खर्च करनी पड़ी।
सेना से मदद मिली तो काम चला, वर्ना बहुत दिक्कत आती। नदीम ने बताया कि फेडरेशन ने खिलाड़ियों को प्रतिदिन मिलने वाले भत्ते 50 डालर में भी तीस फीसदी कटौती कर दी।
परिवारवाद का है बोलबाला
नदीम का कहना है कि देश में स्कीइंग खेल में परिवारवाद हावी है। फेडरेशन के पदाधिकारी और सदस्य अपने मित्रों, परिजनों को ही आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं।
दूसरे खिलाड़ियों को मदद नहीं दी जाती। इससे प्रतिभावान खिलाड़ियों को मौका नहीं मिल पाता।