मरघट सा सुनसान हो गया बस्तड़ी, एल्बम में अपनों को ढूढ़ रहे लोग

संजू पंत/अमर उजाला, डीडीहाट (पिथौरागढ़) Updated Sat, 09 Jul 2016 12:27 AM IST
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बस्तड़ी गांव में मलबे में लापता लोगों को तलाशते जवान
बस्तड़ी गांव में मलबे में लापता लोगों को तलाशते जवान - फोटो : फाइल फोटो

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27 परिवारों से भरापूरा, बच्चों की चुहल, किशोर-युवाओं की धमाल-चौकड़ी से गुलजार बस्तड़ी में आज मरघट सी सुनसानी है। मानवीय भूल कहें या प्रकृति का कोप अब बस्तड़ी वो बस्तड़ी नहीं रहा। जिस गांव से लोगों को अथाह प्यार था, आज उसी गांव से डर लगने लगा है। बस्तड़ी की जवानी, बचपन मलबे में दफन हो गई है, बस्तड़ी का बुढ़ापा सिसक रहा है। लोग अपने पुरखों की माटी छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं।
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बस्तड़ी गांव काफी उपजाऊ गांव था। लोग नौकरी के साथ ही खेती से गुजारा करते थे। गांव के तमाम लोग अच्छी नौकरियों में थे। बाहर नौकरी करने वाले लोग साल में गांव आकर अपनों से मिलते थे, गांव में खूब रौनक रहती थी। बस्तड़ी की इस रौनक पर 30 जून 2016 की मध्यरात्रि के बाद ग्रहण लग गया।
रात के डेढ़ बजे गांव के दाहिने ओर की पहाड़ी में बादल फटने से जमीन का एक बड़ा हिस्सा मलबे, पानी को साथ लेकर ढलान में उतर गया। देखते ही देखते गांव के चंद्र बल्लभ पुत्र हरी दत्त के मकान को जमींदोज कर गया।
बाहर सर्विस करने वाले तमाम युवा छुट्टी पर घर आए थे। सारे युवा राहत, बचाव के काम में लग गए। एक जुलाई की सुबह साढ़े बजे का समय बस्तड़ी के लिए काल बन गया। अब बारी गांव के बाएं छोर की थी। पहाड़ी दरकी मलबा गांव के केशव दत्त पुत्र विष्णु  दत्त, चंद्र बल्लभ पुत्र ईश्वरी दत्त, मोहन चंद्र पुत्र हरी दत्त, कृष्णानंद पुत्र हरीश चंद्र, माधवानंद पुत्र मोती राम के मकानों को लील गया। राहत-बचाव के काम में लगे गांव के लोग मलबे में दफन हो गए। कई परिवारों ने अपने जिगर के टुकड़ों को इस आपदा में खोया है।
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मलबे में मिले एल्बमों में अपनों को ढूढ़ रहे लोग

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