मरघट सा सुनसान हो गया बस्तड़ी, एल्बम में अपनों को ढूढ़ रहे लोग
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
27 परिवारों से भरापूरा, बच्चों की चुहल, किशोर-युवाओं की धमाल-चौकड़ी से गुलजार बस्तड़ी में आज मरघट सी सुनसानी है। मानवीय भूल कहें या प्रकृति का कोप अब बस्तड़ी वो बस्तड़ी नहीं रहा। जिस गांव से लोगों को अथाह प्यार था, आज उसी गांव से डर लगने लगा है। बस्तड़ी की जवानी, बचपन मलबे में दफन हो गई है, बस्तड़ी का बुढ़ापा सिसक रहा है। लोग अपने पुरखों की माटी छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं।
बस्तड़ी गांव काफी उपजाऊ गांव था। लोग नौकरी के साथ ही खेती से गुजारा करते थे। गांव के तमाम लोग अच्छी नौकरियों में थे। बाहर नौकरी करने वाले लोग साल में गांव आकर अपनों से मिलते थे, गांव में खूब रौनक रहती थी। बस्तड़ी की इस रौनक पर 30 जून 2016 की मध्यरात्रि के बाद ग्रहण लग गया।
रात के डेढ़ बजे गांव के दाहिने ओर की पहाड़ी में बादल फटने से जमीन का एक बड़ा हिस्सा मलबे, पानी को साथ लेकर ढलान में उतर गया। देखते ही देखते गांव के चंद्र बल्लभ पुत्र हरी दत्त के मकान को जमींदोज कर गया।
बाहर सर्विस करने वाले तमाम युवा छुट्टी पर घर आए थे। सारे युवा राहत, बचाव के काम में लग गए। एक जुलाई की सुबह साढ़े बजे का समय बस्तड़ी के लिए काल बन गया। अब बारी गांव के बाएं छोर की थी। पहाड़ी दरकी मलबा गांव के केशव दत्त पुत्र विष्णु दत्त, चंद्र बल्लभ पुत्र ईश्वरी दत्त, मोहन चंद्र पुत्र हरी दत्त, कृष्णानंद पुत्र हरीश चंद्र, माधवानंद पुत्र मोती राम के मकानों को लील गया। राहत-बचाव के काम में लगे गांव के लोग मलबे में दफन हो गए। कई परिवारों ने अपने जिगर के टुकड़ों को इस आपदा में खोया है।
मलबे में मिले एल्बमों में अपनों को ढूढ़ रहे लोग
आपदा से तबाह बस्तड़ी में अब मकानों के मलबे से मिली फोटो एलबमों में लोग अपनों को ढूंढ रहे हैं। पुरानी बातें याद कर लोग रो पड़ रहे हैं। हादसे की जानकारी मिलने के बाद जयपुर (राजस्थान) से बस्तड़ी पहुंचे राजेश जोशी हादसे में अपने कई नातेदारों को खोने से विचलित हैं।
मामी दीपा भट्ट, ममेरी बहन रिया भट्ट, मौसी सरस्वती देवी (65), नानी रमुली देवी (83) मलबे में दफन हो गए। मामा चंद्र बल्लभ भट्ट घटना के दिन हल्द्वानी एक विवाह समारोह में गए थे, वह बच गए। राजेश ने कक्षा सात तक बस्तड़ी में रहकर पढ़ाई की है। मकान के मलबे में आर्मी को एक एलबम मिली थी। बदहवास राजेश एलबम में फोटो देख अपनों के साथ बिताए गए लमहों को याद कर रो पड़ते हैं।
Published By: Vivek SIngh