पहाड़ की इन बेटियों ने जज्बे से पाया मुकाम, पढ़ें इनकी कहानी...
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देहरादून की हिरेशा ने आईटी छोड़ मशरूम की खेती को करियर बनाया है। अब वे पहाड़ की अन्य महिलाओं को भी इसका प्रशिक्षण देकर इस क्षेत्र में उन्हें आत्मनिर्भर बना रही हैं। उनका कहना है कि पहाड़ के खाली और खंडहर बन चुके घरों में इसे उगाकर विरान बने इन गांवों को फिर आबाद किया जा सकता है।
वनस्पति विज्ञान से मास्टर डिग्री लेने के बाद हिरेशा ने अहमदाबाद और दिल्ली में आईटी कंपनी चलाई जो अब मेडिसनल मशरूम सिताके सहित इसकी पांच प्रजातियां उगा रही हैं। राजभवन में लगी पुष्प प्रदर्शनी में भी स्टॉल लगाकर उन्होंने लोगों को इसके प्रति जागरूक किया। शिमला बाईपास रोड निवासी हिरेशा ने 2010 में शौकिया तौर पर 25 बैग कंपोस्ट से मशरूम उत्पादन शुरू किया। जिनका आज अपर छरबा देहरादून में एक करोड़ रुपये का प्लांट है।
हिरेशा दूरदराज से आने वाले लोगों खासकर महिलाओं को इसके उत्पादन की निशुल्क जानकारी देती हैं, जो प्रदेश भर में अब तक डेढ़ हजार से अधिक महिलाओं को इसकी जानकारी दे चुकी हैं। हिरेशा बताती है कि वह चाहती है कि खंडहर बन चुके पहाड़ के दूरदराज के गांवों घरों में लोग फिर लौटे और इसकी खेती करें। पहाड़ में बंद पड़े घरों का इसकी खेती में उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए बहुत कम धनराशि 10 हजार रुपये से लेकर एक करोड़ तक के प्रोजेक्ट लगाए जा सकते हैं। इसमें सरकार की ओर से भी 50 फीसदी सब्सिडी दी जाती है।
राजभवन में किया लोगों को जागरूक
राजभवन में आयोजित पुष्प प्रदर्शनी में हिरेशा अपना स्टॉल लगाकर यहां आने वाले लोगों को बटन मशरूम और मेडिसनल मशरूम सिताके के प्रति जागरूक किया। इन दिनों वह मशरूम की विभिन्न पांच प्रजातियां उगा रही हैं।
मशरूम से तैयार कर रही विभिन्न उत्पाद
मशरूम का उत्पादन कर रही है हिरेशा न सिर्फ मशरूम की विभिन्न प्रजातियां उगा रही हैं बल्कि वह इसका अचार, पापड़ एवं कुछ अन्य उत्पाद भी तैयार कर रही है। उन्होंने मेलो के नाम से कंपनी खोली है। जिसमें वह 18 से 20 लोगों को रोजगार दे रही हैं।
महिलाओं ने ठानी, गांव को बनाएंगी स्मार्ट
महेश्वर प्रसाद सिंह / अमर उजाला, देहरादून
उत्तराखंड की आधी आबादी हर क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर देश, दुनिया में उत्तराखंड का नाम रोशन कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग जैसे तमाम क्षेत्रों में पुरूषों को पछाड़ अपना अलग मुकाम हासिल कर रही है। समाज सेवा करने में भी यहां की महिलाएं पीछे नहीं है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर हम ऐसे ही एक महिलाओं के समूह से आपको परिचित कराने जा रहे है, जिन्होंने सरकारी उदासीनता से विकास से दूर अपने गांव को स्मार्ट बनाने का बीड़ा उठाया है।
छावनी परिषद गढ़ी क्षेत्र से सटे विलासपुर कांडली की महिलाओं ने गांव को स्मार्ट बनाने की ठानी। प्रथम चरण में इन्होंने सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करना प्रमुखता में रखा। शुरूआती दौर में इन महिलाओं को स्थानीय लोगों का साथ नहीं मिला। लेकिन इन महिलाओं ने हार नहीं मानी और अपने मकसद को कामयाब बनाने को अड़ी रही। उनका ये दृढ़ संकल्प रंग लाया और महिला संचय समिति की मदद से एक मार्च से कूड़ा उठान का कार्य शुरू किया।
महिलाओं के काम से खुश होकर कुछ लोग उनके साथ जुड़ गए है। समिति की अध्यक्ष शोभा, सचिव माधुरी राई, उपाध्यक्ष राजकुमारी थापा, कोषाध्यक्ष राजकौर, गांव की प्रधान मोना, समिति की सदस्य बीना बिष्ट, सीमा क्षेत्री, सुधा, आशा, कलावती, मंजू थापा आदि कहती है क्षेत्र में सफाई व्यवस्था दुरुस्त न होने, पथ प्रकाश की समुचित व्यवस्था न होने पर उन्होंने स्वयं गांव को स्मार्ट बनाने की ठानी।
बताया कि उनकी प्राथमिकता डोर टू डोर कूड़ा उठाकर गांव को स्वच्छ बनाने और फिर सीसीटीवी कैमरे और एलईडी लाइटें लगवाने का प्लान है। महिलाएं मानती हैं कि इसके लिए बजट जुटाना आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है। जनप्रतिनिधियों और सरकार की योजनाओं के सहारे इस चरण को पूरा करने का इरादा रखने वाली यह महिलाएं कई संस्थाओं से संपर्क भी कर रही हैं। जो इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि उनकी यह पहल आने वाले दिनों में उनके गांव को प्रदेश का पहला स्मार्ट गांव बनाएगी।
सुनीता फैला रहीं शिक्षा का उजियारा
सुनीत द्विवेदी / अमर उजाला, देहरादून
यदि व्यक्ति के अंदर जज्बा और साहस हो तो वह कुछ भी हासिल कर सकता है। उसके सामने आने वाली तमाम मुश्किलें आसान हो जाती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ राजपुर रोड निवासी सुनीता प्रकाश के साथ। जो बिना किसी मदद के गरीब बच्चों में शिक्षा का प्रकाश फैला रही हैं।
इसकी शुरुआत करीब 20 साल पहले हुई, जब सुनीता प्रकाश ऋषिकेश गई थीं। इस दौरान उनकी नजर गरीब बच्चों पर पड़ी। जो काम कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि वह पढ़ाई नहीं करते हैं। इसके बाद सुनीता घर आ गईं, लेकिन मन में उन्हीं मासूमों की तस्वीर बार-बार उभर रही थी। उन्होंने मन में ठान लिया कि वह गरीब बच्चों की पढ़ाई कराएंगी। यह दृढ़ निश्चय ही था, अब तक वह 100 से अधिक बच्चों को कैंप लगाकर शिक्षा दे चुकी हैं।
इसके अलावा करीब छह बच्चों की शिक्षा का पूरा खर्च वहन कर रही हैं। इस कार्य में उन्होंने किसी से आर्थिक मदद भी नहीं ली। वह बताती हैं कि उनके प्रयास से गरीब बस्ती के लोगों में जागृति पैदा हो रही है। कभी मिट्टी में दिनभर खेलने वाले बच्चे आज साफ-सुथरे होकर आ रहे हैं। पढ़ना-लिखना सीख रहे हैं। उन्होंने इसका श्रेय पति प्रेम प्रकाश, पिता मनमोहन, मां लक्ष्मी को दिया।
पैसा नहीं बच्चों में जागृति लाना उद्देश्य
सुनीता कहती हैं कि उनका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, बल्कि गरीब बच्चों को साक्षर बनाना है। जिससे उनका भविष्य उज्ज्वल हो सके। पहले तो लोगों को समझाना मुश्किल था, लेकिन अब उनमें उत्साह है। पौड़ी में वर्ष 2007 में सुनीता ने प्रिंसिपल से बात कर जीजीआईसी में शौचालय का निर्माण कराया।
महिलाओं को भी बना रहीं आत्मनिर्भर
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने पिछले साल से उन्हें सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलवाना शुरू कर दिया है। वर्तमान में उनके कैंप में 35 महिलाएं प्रशिक्षण ले रही हैं। इनमें से अच्छा कार्य करने वाली महिला को फैशन डिजाइनिंग का कोर्स भी कराया जाएगा।
17 गरीब कन्याओं की एफडी की
नवंबर 2016 में उन्होंने 17 गरीब कन्याओं की एफडी कराई। इस साल से वो बेसहारा लड़के-लड़कियों की एफडी कराएंगी। उनके मुताबिक गरीब बच्चों को बालिग होने के बाद सरकारी केंद्रों से बाहर कर दिया जाता है। ऐसे में उनके सामने काफी दिक्कतें आती हैं। यदि उनके पास एफडी रहेगी तो काफी राहत मिलेगी।
दिव्यांगों के लिए मां से भी कहीं बढ़कर है जोह
गौरव मिश्रा / अमर उजाला, देहरादून
हजारों विशेष बच्चों (दिव्यांगों) के लिए जोह सिर्फ मां नहीं बल्कि उनकी पूरी दुनिया है। जोह 36 साल ऐसे ही बच्चों को मां से ज्यादा प्यार दे उनकी परवरिश कर उनकी जिंदगी संवार रहीं है। अमेरिका से भारत आकर जोह चोपड़ा ने देश में व्याप्त गरीबी और खास तौर पर बेहद गरीब और दिव्यांग बच्चों का नारकीय जीवन देख उनका जीवन बदलने का संकल्प लिया।
जोह बताती हैं कि उस समय किसी के घर अगर विशेष बच्चा पैदा होता था तो उसे मृत समान ही समझा जाता था। फिर अगर किसी गरीब परिवार में ऐसा बच्चा हो जाता तो फिर उसे कुदरत के भरोसे छोड़ देते। जोह इन बच्चों को ईश्वर तुल्य मानती हैं। करुणा विहार और लतिका राय फाउंडेशन के बैनर तले पिछले तीन दशकों से अधिक वक्त से जोह उनके साथी विशेष बच्चों की शिक्षा समेत संपूर्ण विकास के लिए काम कर रही हैं।
देहरादून या उत्तराखंड के ही नहीं बल्कि देश भर के विशेष बच्चें और यहां तक बड़ी उम्र के लोग नवजीवन पा चुके हैं। बच्चों, किशोरों, युवाओं की शिक्षा-स्वास्थ्य के साथ ही उनकी आजीविका के बारे में भी उनके स्तर जो किया गया है वह असंभव सा लगता है। इस उम्र में भी वह उसी जोश व उत्साह के साथ काम करती हैं जो पहले था।
पति का भी अहम योगदान
जोह चोपड़ा के पति डा. रवि चोपड़ा देश ही नहीं बल्कि दुनिया के जाने माने लोक वैज्ञानिक हैं। जोह के उनके जुनून, दीवानगी और मिशन को आगे बढ़ाने में डा. चोपड़ा का भी अहम योगदान रहा है। जोह चोपड़ा का कहना है कि उनके पति का हमेशा ही उनका अमूल्य सहयोग मिला। जिस कारण वो अपने मकसद में कामयाब हो सकी। कहा कि प्रेम और करुणा का जीवंत पाठ उन्होंने अपनी मां से सीखा।
किशोरावस्था में हुई एक घटना का जिक्र करते हुए वह बोली कि मां ने उन्हें प्रेम और करुणा से प्रेरित होकर काम करने की सीख दी थी। वह कहती हैं कि हालात चाहे कितने भी विषम, भयावह क्यों न हों उन पर जीत पाई जा सकती है। प्रेम, करुणा, विश्वास, साहस, धैर्य की बदौलत असंभव को संभव करना मुमकिन है। जरूरत बस कूद पड़ने की होती है। उनके यहां पर सौ से अधिक लोग रोजगार पा रहे हैं। उनके लिए भी ये सिर्फ रोजगार का साधन नहीं बल्कि जिंदगी का मकसद है।
चालीस हजार की नौकरी छोड़ी, अब कमा रही एक लाख
दून की दो बेटियों ने नौकरी छोड़कर स्वरोजगार की राह चुनी है। अपनी मेहनत के जरिये कभी चालीस हजार रुपये महीने की नौकरी करने वाली बेटियां आज एक लाख रुपये तक कमा रही हैं। इतना ही नहीं उन्होंने कई अन्य युवाओं को रोजगार भी उपलब्ध कराया है। रस्यांण के नाम से वह पहाड़ी अनाज और उससे बने पकवान बेच रही हैं। साथ ही शादियों और पार्टियों में पहाड़ी खाने की कैटरिंग का काम भी कर रही हैं।
मूलत: पाटीसैण, पौड़ी निवासी अर्चना ने सुद्धोवाला पॉलिटेक्निक से इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स किया। इसके बाद वह नेहरू कॉलोनी में एक आर्किटेक्ट के साथ काम करने लगी। वहीं पौड़ी की स्वाति डोभाल एमबीए करने के बाद गुड़गांव (अब गुरुग्राम) में नौकरी करती थी। पहाड़ से जुड़े होने के चलते उन्हें पहाड़ी खान-पान का बेहद शौक था। 2012 के अंत में दिल्ली के निर्भया कांड के बाद देहरादून में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान दोनों की मुलाकात हुई। उसके बाद दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई। दोनों ने सोचा कि क्यों न दून में अपना कोई कारोबार शुरू किया जाए। हालांकि उनके घरवाले इसके लिए तैयार नहीं थे, इसलिए उन्होंने तय किया कि कारोबार जमने तक वह किसी को इसके बारे में नहीं बताएंगी।
सबसे पहले उन्होंने टिफिन घर-घर पहुंचाने का काम शुरू किया। हालांकि उनके लिए शुरूआत बेहद खराब रही। अलग-अलग जगह टिफिन पहुंचाने जाने के दौरान उन्हें कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी। उन्होंने टिफिन बांटने के लिए कुछ युवक रखे लेकिन वह ठीक से काम नहीं कर पाए। इस पर दोनों ने सोचा कि वह बिना घबराए खुद ही टिफिन बांटने जाएंगी। खाने की बेहतर क्वालिटी और कम दाम के चलते जल्द ही उनका काम चल निकला। फिर उन्होंने पहाड़ के पारंपरिक अनाज और पकवानों को लोगों तक पहुंचाने के लिए रस्यांण नाम से सोसाइटी बनाई। इसके जरिये वह पहाड़ के अलग-अलग क्षेत्रों से उत्पाद लाते और दून व अन्य स्थानों पर बेचते।
किसी ने उन्हें शादी में पहाड़ी व्यंजन परोसने का काम दिया। उन्होंने डिमांड पर तमाम तरह के पहाड़ी पकवान बनाए, जिन्हें लोगों ने खूब पसंद किया। अब तो उनके पास पहाड़ी खान-पान और कैटरिंग के खूब ऑर्डर आने लगे हैं। उन्होंने जोगीवाला में सांझा चूल्हा के नाम से छोटा रेस्त्रां भी खोला है। हालांकि वह गढ़वाली थीम बेस एक रेस्त्रां खोलना चाहती हैं, जहां सभी तरह के पहाड़ी व्यंजन उपलब्ध हों।
बेटे से कम नहीं बाबुल की ये बेटी
दीपा शर्मा भट्टराई / अमर उजाला, देहरादून
साल 2009 में कौलागढ़ निवासी कमल किशन यादव को बीमार होने पर रोडवेज की नौकरी छोड़नी पड़ी। तीन बेटियों की पढ़ाई पूरी कराने के साथ साथ घर का खर्च तक चलाना मुश्किल हो गया। इस मुश्किल से निपटने को सब्जी बेचकर घर चलाने और बेटियों की पढ़ाई करने का मन बनाया।
पर बाबुल की एक होनहार बेटी ने बीमारी की हालत में उनको यह काम करने से मना कर दिया और स्वयं परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम इसी बेटी (चेतना यादव) की पापा को कभी बेटा न होने की कमी महसूस न होने देने की कहानी से रूबरू करा रहे हैं। जो आज अपनी मेहनत के दम पर बैंक ऑफ बड़ौदा में कार्यरत है।
कौलागढ़ देहरादून निवासी कमल किशन यादव रोडवेज में कार्यरत थे, लेकिन अक्सर बीमार रहने के कारण उन्हें 2009 में नौकरी छोड़नी पड़ी। उनको और उनकी पत्नी ऊषा यादव को परिवार की चिंता सताने लगी। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने सब्जी बेचकर परिवार चलाने का मन बनाया। लेकिन स्कूल की पढ़ाई कर रही उनकी दूसरे नंबर की बेटी चेतना यादव (28) ने उनको बीमारी की हालत में ऐसा नहीं करने दिया। चेतना ने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। ट्यूशन से जो पैसे आते, उसी से वो अपनी व बहन की पढ़ाई और घर का खर्च उठाती।
इस तरह चेतना ने बीएससी की पढ़ाई पूरी की। ट्यूशन पढ़ाने के साथ ही उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी और वर्ष 2012 में चेतना का बैंक में सिलेक्शन हो गया। आज वह बैंक ऑफ बड़ौदा में कार्यरत हैं। चेतना के पिताजी कमल किशन कहते हैं कि मेरी बेटी ने बेटा बनकर पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाई। अब वह छोटी बेटी स्वाति के बेहतर भविष्य के लिए उसे गाइड कर रही है। चेतना कहती हैं कि बेटा और बेटी दोनों बराबर हैं। उनमें कभी फर्क नहीं समझना चाहिए। बेटियों को इंडिपेंडेंट होना चाहिए ताकि उन्हें किसी भी बुरी स्थिति में किसी पर निर्भर ना होना पड़ा। चेतना कहती हैं कि पापा और मम्मी का हमेशा सपोर्ट मिला और आज मैं इस मुकाम पर हूं। वर्ष 2016 में शादी हो गई। अब भी मायके और छोटी बहन की पूरी जिम्मेदारी निभाऊंगी।