{"_id":"59913cff4f1c1bde068b46ef","slug":"special-story-on-death-of-gorakhpur-medical-college","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की तरह यहां भी हो सकते हैं '62' मर्डर, पढ़िए चौंकाने वाली पड़ताल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की तरह यहां भी हो सकते हैं '62' मर्डर, पढ़िए चौंकाने वाली पड़ताल
विजेंद्र श्रीवास्तव/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 15 Aug 2017 08:23 AM IST
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बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज
- फोटो : ANI
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गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में हुई 62 मौतों ने उत्तर-प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है, लेकिन यहां भी हालात इससे जुदा नहीं हैं।
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श्रीनगर, दून और हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में अव्यवस्थाओं का बोलबाला है। मेडिकल कालेजों में दवाओं की कमी है। मशीनें पुरानी होने के साथ दगा दे रही हैं। अस्पताल स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं। किसी आपात स्थिति में मेडिकल कालेज प्रबंधन को अपने स्तर से तत्काल कोई खरीद और भुगतान करने के लिए यूजर चार्ज तक खर्च करने के अधिकार नहीं है। इस पर शासन ने रोक लगा रखी है।
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मशीनों की हालत खराब
सिर की चोट आदि की जांच के लिए अहम सीटी स्कैन मशीन दून मेडिकल कॉलेज में खराब है। इसके अलावा डायलिसिस, वेंटीलेटर और डिजिटल एक्सरे भी ठीक होने की राह देख रहे हैं। जबकि सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज में सीटी स्कैन मशीन की वार्षिक मरम्मत के लिए वित्तीय स्वीकृति का इंतजार है।
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सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज के ही स्वामीराम कैंसर इंस्टीट्यूट में सीटी स्कैन मशीन लगी थी, इसकी वार्षिक मरम्मत से जुड़ा काम निजी क्षेत्र की संस्था हंस के माध्यम से कराना पड़ा है। यहां डायलिसिस की मशीन की हालत ये हैं कि मुश्किल से एक या दो मशीनों से रोगियों की डायलिसिस हो रही है। जबकि, श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड मशीन मौजूद हैं। मशीनें ठीक भी हैं, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट की तैनाती नहीं होने से इन मशीनों से काई भी जांच नहीं हो रही है।
दवाओं का आ सकता संकट
डेमो पिक
मेडिकल कॉलेजों में दवाओं को लेकर भारी झोल है। सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज में दवाओं का संकट गहरा रहा है। बताते हैं कि अस्पताल में करीब एक महीने की दवा की व्यवस्था है। नई दवाओं के लिए टेंडर आदि होना है, जो लटका हुआ। श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में 106 दवाएं हैं, जो सभी को उपलब्ध हो सकती है।
बाकी दवा मरीजों को बाहर से खरीदना होता है। बीपीएल मरीजों के लिए कॉलेज प्रबंधन खुद लोकल पर्चेज करता है। दून मेडिकल कॉलेज में दवाओं की स्थिति बेहतर है। मेडिकल कॉलेजों के लिए कोई दवा की नीति नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की स्वास्थ्य औषधि नीति के हिसाब से ही दवाओं की खरीद होती है।
हर मेडिकल कॉलेज अपने-अपने हिसाब से दवाओं का टेंडर करता है। दवाओं की मात्रा कम होने के कारण कंपनियां रुचि कम लेती है, कई बार टेंडर सफल नहीं हो पाते हैं। चिकित्सा-शिक्षा निदेशालय की तरफ से तीनों सरकारी मेडिकल कॉलेज का एकीकृत और दवा खरीद के नियम बनाने का प्रस्ताव भेजा गया। इस पर शासन चुप्पी साधे बैठा है।
बाकी दवा मरीजों को बाहर से खरीदना होता है। बीपीएल मरीजों के लिए कॉलेज प्रबंधन खुद लोकल पर्चेज करता है। दून मेडिकल कॉलेज में दवाओं की स्थिति बेहतर है। मेडिकल कॉलेजों के लिए कोई दवा की नीति नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की स्वास्थ्य औषधि नीति के हिसाब से ही दवाओं की खरीद होती है।
हर मेडिकल कॉलेज अपने-अपने हिसाब से दवाओं का टेंडर करता है। दवाओं की मात्रा कम होने के कारण कंपनियां रुचि कम लेती है, कई बार टेंडर सफल नहीं हो पाते हैं। चिकित्सा-शिक्षा निदेशालय की तरफ से तीनों सरकारी मेडिकल कॉलेज का एकीकृत और दवा खरीद के नियम बनाने का प्रस्ताव भेजा गया। इस पर शासन चुप्पी साधे बैठा है।
नर्सिंग स्टाफ की कमी
श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में बेडों की क्षमता 506 है। यहां 24 घंटे नर्सिंग स्टाफ (तीन शिफ्ट में) की तैनाती के लिए 350 नर्स के पद सृजित हैं, जबकि तैनात 140 हैं। 210 पद रिक्त हैं। इसी तरह नर्सिंग स्टाफ की कम 700 बेड की क्षमता वाले सुशीला तिवारी अस्पताल में बनी हुई है। यहां पर 100 स्वीकृत पदों पर नर्सिंग स्टाफ की भर्ती होनी है, जिसका प्रस्ताव भी जा चुका है। लेकिन, आज तक भर्ती नहीं हो सकी है। कमोबेश इसी तरह के हालात दून मेडिकल कॉलेज में भी हैं।
यूजर चार्ज पर पाबंदी
देहरादून, श्रीनगर और सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती, पर्चा, जांच आदि के लिए रोगी से जो राशि ली जाती है, वह यूजर चार्ज के रूप में जमा होती है। हर साल करीब 30 करोड़ तक तीनों मेडिकल कॉलेज से यूजर चार्ज के तौर पर राशि जमा हो जाती है। पहले आपात स्थिति में कॉलेज प्रबंधन को इस राशि को खर्च करने का अधिकार था, लेकिन दो साल पहले शासन ने यूजर चार्ज की राशि खर्च करने पर पाबंदी लगा दी।
अगर गोरखपुर जैसे हालात हो जाएं और मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को आपात स्थिति में कोई भी चीज खरीदनी हो, तो यूजर चार्ज की राशि का उपयोग नहीं कर सकता है। हालांकि चिकित्सा-शिक्षा निदेशालय की तरफ से शासन को सशर्त और कुछ आपात स्थिति में मेडिकल कालेज प्रबंधन को यूजर चार्ज की राशि खर्च करने की अनुमति देने का प्रस्ताव भेजा गया है, इस पर भी कोई फैसला नहीं हुआ।
यूजर चार्ज पर पाबंदी
देहरादून, श्रीनगर और सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती, पर्चा, जांच आदि के लिए रोगी से जो राशि ली जाती है, वह यूजर चार्ज के रूप में जमा होती है। हर साल करीब 30 करोड़ तक तीनों मेडिकल कॉलेज से यूजर चार्ज के तौर पर राशि जमा हो जाती है। पहले आपात स्थिति में कॉलेज प्रबंधन को इस राशि को खर्च करने का अधिकार था, लेकिन दो साल पहले शासन ने यूजर चार्ज की राशि खर्च करने पर पाबंदी लगा दी।
अगर गोरखपुर जैसे हालात हो जाएं और मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को आपात स्थिति में कोई भी चीज खरीदनी हो, तो यूजर चार्ज की राशि का उपयोग नहीं कर सकता है। हालांकि चिकित्सा-शिक्षा निदेशालय की तरफ से शासन को सशर्त और कुछ आपात स्थिति में मेडिकल कालेज प्रबंधन को यूजर चार्ज की राशि खर्च करने की अनुमति देने का प्रस्ताव भेजा गया है, इस पर भी कोई फैसला नहीं हुआ।
एक अफसर पर कई चार्ज, कैसे संभाले हालात
ऑफिस
- फोटो : demo pics
सरकार स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा को लेकर कितना गंभीर है, उसको अधिकारियों के कार्य बंटवारे से देखा जा सकता है। अपर सचिव डॉ. पंकज कुमार पांडेय के पास स्वास्थ्य, चिकित्सा-शिक्षा के अलावा तकनीकी शिक्षा, महानिदेशक सूचना समेत कई अन्य और विभागों की जिम्मेदारी है।
अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश के पास चिकित्सा, स्वास्थ्य के अलावा लोक निर्माण विभाग समेत कई अन्य विभाग और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां है। पिछली सरकार में अलग स्वास्थ्य मंत्री थे, लेकिन इस बार स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी खुद मुख्यमंत्री के पास है।
गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की तुलना हमारे मेडिकल कॉलेज काफी नए हैं, यहां पर कुछ कमी हो सकती है। इसके बाद भी दून, सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज यूपी के बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज कर रहे हैं, जो हमारे संस्था के प्रति विश्वास को दर्शाते हैं। इसके अलावा जो कमियां है, उसे छह महीने के अंदर दूर कर लिया जाएगा।
- ओमप्रकाश, अपर मुख्य सचिव
अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश के पास चिकित्सा, स्वास्थ्य के अलावा लोक निर्माण विभाग समेत कई अन्य विभाग और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां है। पिछली सरकार में अलग स्वास्थ्य मंत्री थे, लेकिन इस बार स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी खुद मुख्यमंत्री के पास है।
गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की तुलना हमारे मेडिकल कॉलेज काफी नए हैं, यहां पर कुछ कमी हो सकती है। इसके बाद भी दून, सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज यूपी के बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज कर रहे हैं, जो हमारे संस्था के प्रति विश्वास को दर्शाते हैं। इसके अलावा जो कमियां है, उसे छह महीने के अंदर दूर कर लिया जाएगा।
- ओमप्रकाश, अपर मुख्य सचिव