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मन को झकझोर गया बुद्धूराम का संघर्ष
अमर उजाला, श्रीनगर
Updated Tue, 29 Jul 2014 09:37 PM IST
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उत्तराखंड के श्रीनगर में मां मुझे टैगोर बना दे नाटक की शानदार प्रस्तुति दर्शकों को झकझोर गई। जम्मू-कश्मीर के युवा रंगकर्मी लक्की गुप्ता के इस सोलो एक्ट ने संसाधनों के अभाव में दम तोड़ते हुनर की मजबूरी को बखूबी बयां किया।
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यूं तो यह सोलो एक्ट था लेकिन दर्शक भी कब नाटक के पात्र बन गए उन्हें खुद पता नहीं चला। युवा लक्की गुप्ता की इस प्रस्तुति ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरी।
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बीस राज्यों में किया जा चुका है मंचन
तस्वीर आर्ट्स ग्रुप के सहयोग से मां मुझे टैगोर बना दे नाटक का 522वां मंचन बिड़ला परिसर के एसीएल भवन प्रांगण में सोमवार शाम को किया गया। जम्मू-कश्मीर के युवा रंगकर्मी लक्की गुप्ता के इस नाटक का मंचन अब तक बीस राज्यों व 180 शहरों में किया जा चुका है।
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होनहार विद्यार्थी की मजबूरी की कहानी
नाटक एक होनहार विद्यार्थी की मजबूरी को दिखाता है। कथानक के अनुसार नाटक का मुख्य पात्र बुद्धूराम गरीब तबके से है। पढ़ाई-लिखाई में होशियार बुद्धूराम अपने आदर्श रविंद्रनाथ टैगोर की तरह कवि व साहित्यकार बनना चाहता है।
मगर पारिवारिक परिस्थितियों व आर्थिक कारणों से उसे पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है। इसके बावजूद उसके भीतर किसी कोने में टैगोर बनने की चाहत जिंदा है। समय के साथ जिम्मेदारियों के बोझ तले उसका हुनर और इच्छा कहीं दब जाते हैं।
नाटक के बीच में लक्की गुप्ता ने दर्शकों का भी पात्रों के रूप में बखूबी इस्तेमाल किया। उनके इस शानदार प्रयोग को दर्शकों की भरपूर सराहना मिली। अंत में उन्होंने हुनर को पहचानने और प्रतिभाशाली बच्चों की मदद करने की अपील की।