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पकड़ में नहीं आ रहे 'ऑनलाइन' नेताजी

Sat, 29 Mar 2014 11:14 PM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 29 Mar 2014 11:14 PM IST
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social media effect in election

लोकसभा चुनाव में अहम भूमिका निभा रहा सोशल मीडिया कुछ राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा रहा है। ऑनलाइन पटखनी खा रही कांग्रेस चुनाव आयोग से नकेल कसने की गुहार तो लगा रही हैं, लेकिन आयोग भी सोशल मीडिया निगरानी के तरीके ढूंढ नहीं पा रहा है।

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दलों की चिंता
उत्तराखंड कांग्रेस ने चुनाव आयोग के सामने सोशल मीडिया पर लगाम कसने की मांग रखी है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस को सर्वाधिक निशाना बनाया जा रहा है।

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कांग्रेस का कहना है कि पार्टी के नेताओं को लेकर सोशल मीडिया पर होने वाली टिप्पणियां अन्य दलों से प्रेरित हैं तो पार्टी की छवि को धूमिल कर रही हैं।

गौरतलब है कि कई वेबसाइट्स कांग्रेस  की सोशल मीडिया पर सबसे कमजोर दिखा रही है, जिससे दल की चिंता बढ़ी है।

एप्स पर डाटा शेयरिंग पकड़ना नहीं आसान

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मोबाइल एसएमएस को आयोग खर्च में शामिल कर चुका है, लेकिन सोशल एप्स पर कोई पकड़ नहीं है। आनलाइन प्रचार को वेबसाइटों पर तो देखा जा सकता है, लेकिन वट्सएप, गूगल हैंगआउट्स और ब्लैकबैरी जैसी सर्विसेज का तो कोई तोड़ आयोग के पास भी नहीं है।

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आयोग ने हर प्रत्याशी के ट्वीटर, फेसबुक सहित अन्य सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी मांगी है, लेकिन यह पूरी तरह से कारगर नहीं है।

वट्सएप और बीबीएम बढ़ा रहा दिक्कत

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आयोग के लिए सबसे बढ़ी दिक्कत नेताओं की बैठकों या गोपनीय संबोधनों के आनलाइन प्रसारित होने वाले आडिया वीडियो पर नजर रखना है।

तेजी से सकुर्लेट होने वाले अधिकांश वीडियो वट्सएप और ब्लैकबेरी मेसेंजर के माध्यम से जाते हैं। सबसे बड़ी समस्या है कि वट्सएप पर एक साथ सैंकड़ों संदेश भेजे जा सकते हैं, लेकिन वह मुफ्त होने के साथ इतनी तेजी से प्रसारित होते हैं कि ट्रेक करना आसान नहीं है।

ऐसा ही हाल ब्लैकबेरी या फिर टेलीग्राम सर्विसेज का है, जिनसे भेजे संदेश ट्रेक नहीं हो सकते।

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आचार संहिता में नहीं आते ये तरीके

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कोई दूसरा अपने पसंदीदा नेता को लेकर संदेश दे रहा है तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं बनती। गूगल हैंगआउट्स पर कोई भी राजनीतिक गतिविधि पर होने वाली आनलाइन चर्चा आचार संहिता के दायरे में नहीं आती है।

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर राजनीतिक दलों के आईटी सेल हर दिन कई मुद्दों को अपडेट करते हैं जिनपर मिलने वाले शेयरस या लाइक्स यह तय करते हैं कि वह कितना पसंद किया जा रहा है।

आयोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर राजनीतिक दलों द्वारा विज्ञापनों पर नजर रख सकता है, लेकिन डाले जाने वाले संदेशों को चेक कर पाना संभव नहीं है।

ट्रेंड को दिखा रहे हैं टूल्स

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सोशल समोसा जैसी वेबसाइट किसी भी राजनीतिक दल के आनलाइन ट्रेंड की स्टडी कर रही है।

एमटीएस इलेक्शन ट्रेकर और कनेक्ट सोशल जैसे टूल्स से ट्वीटर, फेसबुक, यू ट्यूब सहित अन्य सोशल मीडिया साइट्स पर सभी राजनीतिक दलों के डाले जा रहे डाटा को स्टडी करती है।

ये टूल्स ये बताते हैं क‌ि किस पार्टी का डाटा सर्वाधिक प्रसारित हो रहा है। बेबसाइट पर प्रचार में आप सबसे आगे है और उसके बाद बीजेपी है।

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