पैसा बहाने से क्या 'जिंदा' हो जाएंगी नदियां?
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देहरादून में रिस्पना, बिंदाल और छोटी बिंदाल नदियों की सफाई के नाम पर एक बार फिर लाखों रुपए फूंकने की तैयारी है।
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अस्थायी सफाई के लिए प्रस्ताव तो तैयार हो गया है, लेकिन इसके बाद क्या गारंटी है कि आसपास की मलिन बस्तियों द्वारा उसे गंदा नहीं किया जाएगा।
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यदि गंदा किया जाएगा तो फिर उसकी सफाई का क्या मतलब है? मलिन बस्तियों को वहां से विस्थापित करके ही नदियों को नया जीवन दिया जा सकता है। जिसके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है।
मुहाने पर बसी सैकडों मलिन बस्तियां
राजधानी में रिस्पना, बिंदाल और छोटी बिंदाल के मुहाने पर 100 से अधिक मलिन बस्तियां अवैध तरीके से बस चुकी हैं। इन बस्तियों की गंदगी को नदियों में ही बहाया जा रहा है।
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मुख्यमंत्री हरीश रावत के निर्देश पर बेशक सरकारी मशीनरी की ओर से इनकी सफाई कर दी जाए, लेकिन कुछ दिनों बाद ही इनकी हालत फिर पहले वाली ही हो जानी है।
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जब तक मलिन बस्तियों को नदियों के पाट से बाहर नहीं निकाला जाएगा तब तक नदियों की गंदगी बनी रहेगी। यही नहीं यदि बस्तियां नदी के पाट में बसी रहेंगी तो बरसात में वह बाढ़ की भी चपेट में आती रहेंगी। इससे धन और जन की हानि होती रहेगी।
मलिन बस्तियों को वैध करने का ऐलान
पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सरकार ने प्रदेश की सभी मलिन बस्तियों को वैध करने का ऐलान कर दिया है। इसके तहत दून की भी मलिन बस्तियां जहां हैं वहीं पर वैध कर दी जाएंगी।
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इसका मतलब यह है कि मलिन बस्तियों को नदियों के पाट से बाहर नहीं किया जाएगा। इस निर्णय के पीछे सरकार का मकसद चाहे जो हो लेकिन इससे शहर की नदियों की स्थिति सुधरने वाली नहीं है।
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अधिकतर मलिन बस्तियां नदियों में ही बसी हैं। जब तक इन बस्तियों को दूसरी जगह नहीं बसाया जाएगा तब तक नदियों का दम घुटता रहेगा और शहर भी बदसूरत बना रहेगा।
हाईकोर्ट के आदेश की भी अनदेखी
पिछले साल जून में आई आपदा के बाद हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि शहरों की आबादी को नदियों से दूर किया जाए। इसके लिए कोर्ट ने 200 मीटर की परिधि भी निर्धारित की है।
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लेकिन हाईकोर्ट के इस आदेश का भी पालन नहीं किया जा रहा है। पहले से ही अधिकतर बस्तियां नदियों के पाट में बसी हैं। यदि हाईकोर्ट के आदेश को माना जाए तो इन बस्तियों को दूसरी जगह बसाने की जरूरत है।
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जिसके लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है। उल्टा सरकार ने मलिन बस्तियों को वैध करने का ऐलान कर दिया है।
मलिन बस्तियों के विस्थापन की योजना नहीं
आजकल केंद्र सरकार टीवी चैनलों पर राजीव गांधी आवास योजना का विज्ञापन देकर अपनी उपलब्धियां गिना रही है। यह विज्ञापन ऐसे ही गरीब लोगों को मूलभूत सुविधाएं और आवास उपलब्ध कराने वाली योजना के बारे में है।
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लेकिन यह योजना उत्तराखंड में लागू नहीं है। जबकि यहां पर ऐसी योजना की सख्त जरूरत है। राज्य बनने के बाद से आज तक किसी भी सरकार ने मलिन बस्तियों में रहने वालों को पुनर्स्थापित करने के लिए कोई योजना नहीं बनाई।
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वर्तमान की रावत सरकार ने भी वर्ष 2014-15 का बजट पेश कर दिया है। लेकिन इसमें भी मलिन बस्तियों के विस्थापन के लिए कोई कार्ययोजना नहीं है।
पहले बनी योजनाएं धरातल पर नहीं उतरी
वर्ष 2006 और 2009 में मलिन बस्तियों के विस्थापन और शहर की नदियों के सुंदरीकरण के लिए योजनाएं बनाई गईं लेकिन उन्हें अमल में आज तक नहीं लाया गया।
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इन योजनाओं को बनाने से पहले एनडी तिवारी चीन गए थे तो भाजपा सरकार के समय कई अधिकारी गुजरात गए थे। वहां के मॉडल को देखने परखने के बाद यह योजनाएं बनाई गईं थी।
कांग्रेसियों ने लटकाया तिवारी का चाइना प्रोजेक्ट
उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी वर्ष 2006 में चीन गए थे। वहां शहर के बीच से गुजरने वाली एक नदी को देखा था, जिसे चीन की सरकार ने मलिन बस्तियों को पुनर्वास करके पुनर्जीवित किया था।
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चीन से आने के बाद एनडी तिवारी ने रिस्पना और बिंदाल नदियों की सूरत बदलने के लिए कहा था, लेकिन कांग्रेस के अंदर ही इस प्रोजेक्ट का विरोध होने लगा। इसके बाद तो मामला लटक ही गया।
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इस प्रोजेक्ट के तहत दून की मलिन बस्तियों को मल्टी स्टोरेज बिल्डिंग में शिफ्ट किया जाना था। दोनों नदियों के किनारे बड़े सीवर पाइप लाइन डाले जाने थे, ताकि सीवर नदियों में न गिरे। नदियों के किनारे ग्रीन बेल्ट बनाई जानी थी।
सिरे नहीं चढ़ा साबरमती डेवलेपमेंट फ्रंट
वर्ष 2009 में मेयर विनोद चमोली, तत्कालीन आयुक्त गढ़वाल उमाकांत पंवार और तत्कालीन एमडीडीए वीसी आरके सुधांशु अहमदाबाद गए थे। इन लोगों ने वहां पर साबरमती नदी के पुनर्वास प्रोजेक्ट को देखा था।
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उसी आधार पर शहर की नदियों के लिए प्रोजेक्ट बनाकर शासन में जमा किया था, जिस पर आज तक विचार नहीं किया गया। इस प्रोजेक्ट में प्रावधान था कि शहर की नदियों के किनारे रिंग रोड बनाई जाए।
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सीवर के पानी की निकासी के लिए नदियों के दोनों तरफ बड़े पाइप लाइन डाले जाएं। आधा-आधा किमी पर चक बंध बनाएं जाएं। ग्रीन बेल्ट के साथ में पार्क और फन पार्क बनाए जाएं।
नदियों की सफाई का कोई मतलब नहीं : मेयर
मेयर विनोद चमोली का कहना है कि प्रदेश सरकार नदियों की सफाई की बात कर रही है और उसके लिए करोड़ों रुपए खर्च भी करने वाली है। लेकिन नदियां तो साफ हैं।
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जरूरत तो उनमें गिरने वाले सीवर को हटाने की है। यह काम सरकार करना नहीं चाहती। ऐसे में सफाई पर करोड़ों खर्च करने का कोई मतलब नहीं रह जाता।
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मुख्यमंत्री हरीश रावत के निर्देश के क्रम में दो चरणों में रिस्पना, बिंदाल और छोटी बिंदाल के लिए विकास की योजना है। पहले चरण में सफाई और दूसरे चरण में नदी को गहरा करना। साथ ही नदी के मुहाने पर जाली लगाने का कार्य किया जाएगा। दूसरे चरण के कार्य के लिए जेएनएनयूआरएम या एडीबी से वित्तीय मदद ली जाएगी।
- आर मीनाक्षी सुंदरम, वीसी एमडीडीए
सरकार बनाए पुनर्वास योजना
रिस्पना और बिंदाल नदियों में 100 से अधिक बस्तियां बस गई हैं। इनकी आबादी को यहां से निकाल कर दूसरी जगह बसाना होगा। जब तक नदियों में बसी आबादी को बाहर नहीं निकाला जाएगा नदियों का कल्याण नहीं हो सकता।
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आबादी को नदियों के पाट से निकालने के लिए पुनर्वास योजना बनानी होगी। पहले लोगों को दूसरी जगह व्यवस्थित तरीके से बसाना होगा। इसके लिए प्रदेश सरकार केंद्र की राजीव गांधी आवास योजना की मदद ले सकती है।
मलिन बस्तियों को वैध करने से बेहतर होगा सरकार लोगों को सुरक्षित जगह पर फ्लैट बनाकर बसा दे। यह काम इंदिरा आवास योजना के तहत भी किया जा सकता है।
अरबन अधिकार संघर्ष परिषद का प्रस्ताव
अरबन अधिकार संघर्ष परिषद ने छह फरवरी को मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन दिया है। इसमें परिषद ने मांग की है कि दून दक्षिणी क्षेत्र के आवासहीन करीब 9000 लोगों के लिए राजीव गांधी आवास योजना के तहत सरकार भवन बनाकर दे।
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समिति यह भी सुझाव दिया है कि ग्राम कांवली में 48.025, मिटठी भेड़ी में 7.344, हरबंशवाला में 04.358, आरकेडिया ग्रांट में 375.344 बीघा जमीन को राज्य में निहित करके यहां पर आवासीय योजना बनाई जा सकती है।