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गया से भी अधिक फलदायी है यहां पर पिंडदान

Fri, 12 Sep 2014 09:51 PM IST
प्रमोद सेमवाल/अमर उजाला, गोपेश्वर
प्रमोद सेमवाल/अमर उजाला, गोपेश्वर Updated Fri, 12 Sep 2014 09:51 PM IST
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shradh in brahmakapal tirth in badrinath

पिंडदान के लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध भले ही गया हो लेकिन एक जगह ऐसी है जहां पर पिंडदान गया से आठ गुणा फलदायी है।

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चारों धामों में प्रमुख उत्तराखंड के बदरीधाम स्थित ब्रह्माकपाल के बारे में मान्यता है कि यहां पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को नरकलोक से मुक्ति मिल जाती है।

स्कंद पुराण में ब्रह्मकपाल को गया से आठ गुणा अधिक फलदायी पितरकारक तीर्थ कहा गया है। यही वह तीर्थ है जहां पर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए शिव जी को भी आना पड़ा था।
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पितर पक्ष शुरू होते ही बदरीनाथ धाम स्थित ब्रह्म कपाल में पितर तर्पण करने के लिए तीर्थयात्रियों के साथ ही स्थानीय श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है। बृहस्पतिवार को देश-विदेश के करीब 85 तीर्थयात्रियों और 42 स्थानीय श्रद्धालुओं ने अपने पितरों का तर्पण किया।

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ब्रह्म कपाल में पिंड दान से होती है वंश में वृद्धि

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बीते वर्ष की जलप्रलय के बाद से धाम में तीर्थयात्रियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन पितर पक्ष शुरू होते ही तीर्थयात्री धाम में अपने पितरों के उद्धार के लिए पहुंच रहे हैं।

मद्रास के जयशंकर और मधुश्री का कहना है कि उनके ब्राह्मण ने पितरों के तर्पण के लिए बदरीनाथ धाम जाने की सलाह दी। यहां पितर तर्पण कर मन को शांति मिल रही है। दिल्ली के धीरज चक्रवर्ती ने भी पितर तर्पण किया।

कहते हैं कि श्राद्ध पक्ष में ब्रह्मकपाल में पितर तर्पण करने से वंश वृद्धि होती है। बदरीनाथ के मुख्य धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल का कहना है कि यहां पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। तर्पण करने से पहले तप्तकुंड में स्नान करने के बाद तीर्थ पुरोहित के साथ ब्रह्मकपाली में पितरों का ध्यान किया जाता है।

यहीं पर गिरा था ब्रह्मा का कटा सिर

shradh in brahmakapal tirth in badrinath

सृष्टि की उत्पत्ति के समय जब तीन देवों में एक ब्रह्मा मां सरस्वती के रुप पर मोहित हो गए तो भोलेनाथ ने गुस्से में आकर ब्रह्मा के तीन सिरों में से एक को त्रिशूल के काट दिया तो सिर त्रिशूल पर ही चिपक गया।

ब्रह्मा की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब भोलेनाथ पृथ्वी लोक के भ्रमण पर गए तो बदरीनाथ से पांच सौ मीटर की दूरी पर त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर जमीन पर गिर गया तभी से यह स्थान ब्रह्मकपाल के रुप में प्रसिद्ध हुआ।

यही नहीं जब महाभारत के युद्ध में पांडवों ने अपने ही बंधु-बांधवों को मार कर विजय प्राप्त की थी तब उन पर गौत्र हत्या का पाप लगा था। गौत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्ग की ओर जा रहे पांडवों ने भी इसी स्थान पर अपने पितरों को तर्पण दिया था।

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