फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Scientists searching for ancestors of wildlife

‘माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम’ से की जा रही वन्यजीवों के पूर्वजाें की खोज

Wed, 28 Aug 2019 02:09 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Wed, 28 Aug 2019 02:09 AM IST
विज्ञापन
Scientists searching for ancestors of wildlife
भारतीय वन्यजीव संस्थान के फॉरेंसिक साइंस से जुडे़ वैज्ञानिक इन दिनों ‘माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम’ के जरिए वन्यजीवों के पूर्वजों के बारे में जानकारियां जुटा रहे हैं। फिलहाल संस्थान के वैज्ञानिकों ने पांडा, बार्किंग डीयर, सांभर व मिसमी शकिंग जैसे वन्यजीवों के पूर्वजों व उनमें पाई जाने वाली समानताओं का अध्ययन किया है।
विज्ञापन

भारतीय वन्यजीव संस्थान में आयोजित 33वें वार्षिक शोध कार्यशाला में संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक व फॉरेंसिक साइंस विशेषज्ञ डॉॅ. एसके गुप्ता ने बताया कि फिलहाल पांडा, बार्किंग डीयर, सांभर व मिसमी शकिंग जैसे वन्यजीवाें का अध्ययन किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि जिम कार्बेट पार्क, यूपी में लखीमपुरखीरी के दुधवा नेशनल पार्क व असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में पाए जाने वाले पांडा के अध्ययन में जेनेटिक समानताएं पाई गई हैं। लेकिन, मणिपुर के केबुलांजो नेशनल पार्क में पाए जाने वाले पांडा का जीन इन पार्कों के पांडा से अलग पाया गया। इस पांडा के जीन दक्षिण पूर्व एशिया में पाए जाने वाले पांडा से मिलते जुलते पाए गए हैं। केबुलांजो पार्क में पाए जाने वाले पांडा की संख्या बेहद कम बची है। ऐसे में विशेषज्ञों ने इनके संरक्षण को लेकर तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत बताई है।
विज्ञापन

346 वन्यजीवों की मौतों का हुआ खुलासा
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसके गुप्ता ने बताया कि पिछले एक साल के भीतर देशभर में 346 वन्यजीवों की मौतों के रहस्य का खुलासा फॉरेंसिक साइंस से किया गया है। इसमें सबसे ज्यादा शिकार के मामले सामने आए हैं। उन्होंने दावा किया कि हर साल औसतन 300 वन्यजीवों का शिकार हो रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

वन्यजीवों के संरक्षण पर दिया जोर
भारतीय वन्यजीव संस्थान में आयोजित दो दिवसीय 33वें एनुअल रिसर्च सेमिनार का मंगलवार को समापन हो गया। सेमिनार के अंतिम दिन संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विभास पांडव ने छत्तीसगढ़ के जंगलों में हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ते संघर्ष की घटनाओं को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए व्याख्यान दिया। वहीं, वन्यजीव विज्ञानी डॉ. दीपांजन नाहा ने हिमालयी क्षेत्रों खासकर पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में तेंदुओं की बढ़ती आबादी और इससे पढ़ने वाले प्रभावों पर शोध पत्र पढ़ा। सीनियर रिसर्च फेलो एस. पाल ने गंगा के मैदानों में हरिद्वार स्थित झिलमिल ताल से लेकर गढ़मुक्तेश्वर तक ‘स्वांप डियर’ के प्राकृतिक पर्यावास पर पड़ रहे असर और घटते प्राकृतिक पर्यावास को लेकर व्याख्यान दिया। मौके पर निदेशक डॉ. वीबी माथुर, डॉ. एचएस बापला, डॉ. बितापी सिन्हा, डॉ. एसके गुप्ता, डॉ. नितिन काकोडकर, निशांत वर्मा, डॉ. एल कृष्णमूर्ति, डॉ. वाईवी झाला, डॉ. रविकांत सिन्हा, डॉ. रवि किरण, संजय पाठक डॉ. पीके मलिक, केके श्रीवास्तव, इंद्रनील मंडल, निशांत कुमार, तीश्ता घोष, सृष्टि मोदी, जेहिदुल हुसैन, पल्लवी, सौगता साधुखान, जयंत कुमार बोरा, डॉ. विनीत दूबे आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed