काश, हर शिक्षक होता हुकुम, पढ़िए लगन की कहानी
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पुरानी कहावत है, जहां चाह हो वहां राह निकल ही आती है। प्रदेश में 4500 स्कूलों के बंदी के कगार पर जा पहुंचने का दर्द झेल रहे शिक्षा विभाग में कुछ ऐसी ही मिसाल कायम की है शिक्षक हुकुम सिंह उनियाल ने।
राजधानी देहरादून के राजपुर रोड स्थित राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय देहरा में तैनात इस शिक्षक ने सिर्फ सात साल में इस स्कूल को फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया है। कभी पांच छात्र संख्या वाले इस स्कूल में अब 170 बच्चों का भविष्य गढ़ा जा रहा है। यही नहीं, यह स्कूल 133 निराश्रित बच्चों का भी सहारा बना है।
बिना सरकारी इमदाद के इन बच्चों को स्कूल में आवासीय सुविधा भी मुहैया कराई जा रही है। इस स्कूल को शिक्षा की मुहिम से प्रदेश में जिस तरह अलग पहचान मिली है, उससे यही इच्छा जगती है कि काश प्रदेश का हर शिक्षक हुकुम सिंह हो।
ऐतिहासिक है यह स्कूल
राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय देहरा प्रदेश के सबसे पुराने विद्यालयों में से एक है। वर्ष 1816 में इसकी स्थापना तहसीली मिडिल स्कूल के नाम से पलटन बाजार में की गई, जहां अब कोतवाली है। वर्ष 1953 में यह स्कूल राजपुर रोड पर मौजूदा स्थान पर स्थानांतरित किया गया। इस वर्ष यह स्कूल अपनी स्थापना के दो सौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है।
2008 में शुरू हुई हुकुम सिंह की मुहिम
स्कूल के प्रधानाध्यापक हुकुम सिंह उनियाल वर्ष 2008 में कालसी से स्थानांतरित होकर यहां पहुंचे। उस वक्त यहां सिर्फ 16 बच्चे पंजीकृत थे, इनमें से भी सिर्फ पांच ही स्कूल आते थे। ऐसे में स्कूल बंदी के कगार पर जा पहुंचा था। हुकुम सिंह ने स्कूल को बचाने की मुहिम शुरू की।
वह बताते हैं कि शुरुआत में स्कूल न आने वाले बच्चों के घर जाकर अभिभावकों को समझाया। वे बच्चे स्कूल आने लगे तो फिर आसपास के दूसरे लोगों को भी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए जागरूक किया गया। वक्त के साथ संख्या बढ़ती गई और अब यहां 37 बच्चे आसपास के क्षेत्रों से पढ़ने आते हैं।
हुकुम बताते हैं कि एक दिन कुछ बच्चों को सड़क पर भटकते देखा तो निराश्रित बच्चों को पढ़ाने का संकल्प ले लिया। अब स्कूल में कुल 170 बच्चों में से 133 ऐसे हैं, जिनका दुनिया में कोई नहीं।
सरकार ने नहीं, जागरूक लोगों से मिली मदद
हुकुम सिंह ने निराश्रित बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने की शुरुआत तो की, लेकिन यह काम बिना मदद के संभव नहीं था। शिक्षा विभाग पहले ही बजट की कमी की बात कहता है तो सरकारी मदद की उम्मीद बेमानी थी। ऐसे में हुकुम ने कुछ लोगों और स्वयंसेवी संस्थाओं से संपर्क किया।
निराश्रित बच्चों को आवासीय सुविधा के साथ शिक्षा देने की अपनी कल्पना बताई तो हाथ जुड़ने लगे। पूर्व उपजिलाधिकारी रमेश चंद्र तिवाड़ी ने 40 बेडशीट दीं। आसरा ट्रस्ट स्कूल को हर माह 36 हजार रुपये बच्चों के भोजन, इलाज आदि के लिए दे रहा है। आसरा से जुड़े स्वयंसेवक स्कूल के बच्चों को निशुल्क कोचिंग भी देते हैं।
इनके अलावा डायट की शिक्षिका संगीता कुकरेती, सेना से सेवानिवृत्त अधिकारी तेजेंद्र सोढ़ी, टाइटन ज्वैलर्स, सेंट जोजफ्स एकेडमी, साईं कृपा समिति आदि संस्थाओं और लोगों से भी हुकुम को मदद मिलती है।
स्कूल ने दिए कई नामी छात्र
हुकुम सिंह बताते हैं कि स्कूल ने ऊंचे ओहदों तक पहुंचे कई छात्र दिए हैं। लॉ कालेज प्रेमनगर के डीन और प्राचार्य राजेश बहुगुणा, न्यू कैंट रोड निवासी पूर्व विधान परिषद सदस्य धनीराम सिंह नेगी, बैंक प्रबंधक राजकुमार, सहकारी समिति के अध्यक्ष वीरेंद्र पुंडीर, सिंचाई विभाग में ऑडिटर के पद से रिटायर चुन्नीराम केवट, सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व अधिकारी सोबन सिंह गुसाईं आदि स्कूल के छात्र रहे।
स्कूल की विरासत पर भूमाफिया की नजर
यह स्कूल भले ही प्रदेश की विरासत हो और यहां कई बेसहारा बच्चों का भविष्य संवारा जा रहा हो, लेकिन राजधानी की जमीनों पर नजर गड़ाए भूमाफिया को इससे कोई वास्ता नहीं। इस स्कूल की जमीन पर भी लंबे समय से कब्जे की कोशिशें की जा रही हैं।
कुछ समय पूर्व शिक्षा विभाग ने इस स्कूल को यहां से हटाने का प्रस्ताव निदेशालय को भेज दिया था। हालांकि, तीखे विरोध के बाद यह प्रस्ताव किनारे कर दिया गया।
अधिकारियों का कहना
वाकई शिक्षक हुकुम सिंह अन्य शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने बहुत मेहनत की है, पांच छात्र और चार शिक्षकों वाले इस स्कूल में अब डेढ़ सौ से अधिक छात्र हैं। प्रधानाध्यापक ने अपने प्रयासों से इस स्कूल को इस मुकाम तक पहुंचाया है। आवासीय विद्यालय के लिए सरकार की ओर से कोई मदद नहीं दी जाती।
-आरएस रावत, उप निदेशक बेसिक शिक्षा